ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन: क्या भारत के बनेई मेनाशे को इजराइल में मिलेगी असली मंजिल

Jinesh Jain | Apr 24, 2026, 17:39 IST
Photograph: (the sootr)
देश के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर और मिजोरम के जंगलों में रहने वाले बनेई मेनाशे जनजाति के लोग चर्चा में हैं। ये लोग एक हिंसाग्रस्त इलाके को छोड़कर दूसरे युद्धग्रस्त देश की ओर निकल पड़े हैं। ये खुद को इजराइली मानते हैं। इनका दावा है कि वे अब घर वापसी कर रहे है

मणिपुर का दूरदराज का एक कोना। चारों तरफ हरियाली। यहां एक छोटी सी बांस की झोपड़ी है। दरवाजे पर एक 'मेज़ुज़ा' लगा है-यह यहूदी धर्म का पवित्र आवरण है। अंदर शिमोन न्गामथेनलाल अपनी किताबों को सहेज रहे हैं। ये किताबें हिब्रू और अंग्रेजी में हैं।



किचन से खुशबू आ रही है। महिलाएं जंगल से लाई सब्जियां काट रही हैं। खाना दक्षिण-पूर्व एशियाई है, लेकिन बनाने का तरीका 'कोषेर' (यहूदी नियमों के अनुसार शुद्ध) है। यह नजारा किसी फिल्म जैसा लगता है, लेकिन यह हकीकत है। ये लोग बनेई मेनाशे समुदाय के हैं। ये खुद को इजराइल की 10 खोई हुई जनजातियों में से एक मानते हैं।





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राजा मनस्से की संतानें

लगभग 2,800 साल पहले इजराइल के राजा मनस्से की संतानों को निर्वासित कर दिया गया था। लोककथाएं कहती हैं कि ये लोग भटकते हुए मध्य पूर्व से एशिया आए। फिर म्यांमार और भारत के जंगलों में शरण ली।



सदियों तक ये लोग कुकी और मिजो जनजातियों के बीच रहे। लेकिन इनके दिल में एक बात पक्की थी-हम इजराइली हैं। 1970 के दशक में कुछ इजराइली विद्वान यहां आए। वे दंग रह गए। कुकी लोगों के कुछ रीति-रिवाज यहूदियों से हूबहू मिलते थे। आपदा के समय वे 'मनस्से' पुकारते थे। तभी से इनका नाम पड़ा- बनेई मेनाशे।





ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन

शिमोन के चेहरे पर लंबी 'पयोट' (यहूदी साइडलॉक) है। वे कहते हैं, हमें तोराह पर भरोसा है। उनकी आंखों में एक सपना चमक रहा है। उनका पासपोर्ट तैयार है। इजरायल सरकार ने वादा किया है कि 2030 तक सभी बनेई मेनाशे वहां आ जाएंगे।



अभी एक बड़ा कदम उठाया गया। इजराइल सरकार के ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन के तहत 250 लोगों को दिल्ली के रास्ते तेल अवीव ले जाया जा रहा है। अब तक आधी जनजाति इजरायल जा चुकी है। बाकी बचे 5,800 लोगों को भी जल्द ले जाने की तैयारी है।





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संकट से संकट की ओर

यह सफर आसान नहीं है। ये लोग एक हिंसाग्रस्त इलाके से निकलकर दूसरे संकटग्रस्त इलाके में जा रहे हैं। मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच संघर्ष जारी है। हिंसा की वजह से कई परिवार बेघर हो गए हैं। बेंजामिन हाओकिप भी भीड़ की हिंसा से बचकर यहां आए थे।



दूसरी तरफ इजराइल भी हमास और हिजबुल्लाह के साथ युद्ध में है। लेकिन ये लोग डरे हुए नहीं हैं। डैनियल हैंगशिंग कहते हैं, हमें युद्ध की परवाह नहीं। भारत हमारी जन्मभूमि है, लेकिन इजराइल हमारा भाग्य है। हमें वहीं मरना है।



आर्थिक और धार्मिक मजबूरी

पलायन की वजह केवल धर्म नहीं है। मणिपुर देश के गरीब राज्यों में से है। यहां की प्रति व्यक्ति आय करीब 1,200 डॉलर है। वहीं इजराइल में यह 55,000 डॉलर से अधिक है।



धर्म का पालन यहां कठिन है। यहूदी धर्म में कुछ प्रार्थनाओं के लिए 'मिन्यान' (10 पुरुषों का समूह) चाहिए। पहाड़ों में यह जुटाना मुश्किल है। इजराइल में वे अपने साथियों के बीच खुलकर पूजा कर सकेंगे। शिमोन कहते हैं, 90 प्रतिशत कारण धर्म है, लेकिन वहां शिक्षा भी बेहतर है।





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डीएनए बनाम ईश्वर का करिश्मा

वैज्ञानिकों के पास इनके यहूदी होने के पुख्ता प्रमाण नहीं हैं। डीएनए टेस्ट भी कुछ खास साबित नहीं कर पाए। लेकिन डब्ल्यूएल हैंगशिंग का तर्क अलग है। वे कहते हैं, खोया हुआ मतलब खोया हुआ ही होता है। इतने सालों में डीएनए के निशान मिट चुके हैं। इसे केवल ईश्वर ही साबित कर सकते हैं।



इनकी श्रद्धा इतनी मजबूत है कि बच्चे 'डुओलिंगो' ऐप पर हिब्रू सीख रहे हैं। वे इजराइल के आधुनिक वातावरण में ढलने के लिए तैयार हैं।





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भविष्य की डगर

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस आप्रवास को 'जायोनिस्ट निर्णय' मानते हैं। इजरायल को अपने कार्यबल (Workforce) की जरूरत है। युद्ध के कारण वहां श्रमिकों की कमी हो गई है। बनेई मेनाशे के लोग वहां जाकर खेती, कारखानों और ट्रक ड्राइविंग जैसे काम कर रहे हैं।



मणिपुर की पहाड़ियों से निकलकर तेल अवीव की चकाचौंध में जाना एक बड़ा बदलाव है। जेसिका थांगजोम, जो पहले ही वहां जा चुकी हैं, कहती हैं, यह सफर आसान नहीं है। कृषि जीवन से तकनीकी दुनिया में जाना मुश्किल है।





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