केतन मर्डर केस: क्या पॉलीग्राफ टेस्ट खोल पाएगा सिया और चेतन के दिमाग के राज?
पुणे पुलिस ने इस हफ्ते अदालत से चर्चित केतन अग्रवाल मर्डर केस में आरोपी सिया गोयल का पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की अनुमति मांगी है।
सिया पर अपने मंगेतर और पुणे के बिल्डर केतन अग्रवाल की हत्या का आरोप है। पुलिस ने इस मामले के सह-आरोपी चेतन चौधरी का भी यही टेस्ट कराने की इजाजत मांगी है।
हालांकि, वैज्ञानिक जगत में पॉलीग्राफ टेस्ट को झूठ पकड़ने का एक अविश्वसनीय तरीका माना जाता है। अमेरिकी अदालतों में भी इसके इस्तेमाल पर लंबे समय से कड़े प्रतिबंध हैं।
भारत की बात करें तो यह टेस्ट केवल उसी व्यक्ति की सहमति से किया जा सकता है, जिसका टेस्ट होना है। अगर कोई आरोपी इस टेस्ट के लिए मना कर देता है तो इसे अदालत में उसके खिलाफ सबूत या दोष की स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता।
क्या होते हैं पॉलीग्राफ और नार्को एनालिसिस टेस्ट?
1. पॉलीग्राफ टेस्ट (Polygraph Test)
यह टेस्ट इस धारणा पर काम करता है कि जब कोई इंसान झूठ बोलता है तो उसके शरीर की शारीरिक प्रतिक्रियाएं सामान्य से अलग हो जाती हैं।
काम करने का तरीका: टेस्ट के दौरान व्यक्ति के शरीर पर कार्डियो-कफ और संवेदनशील इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं। जब उससे सवाल पूछे जाते हैं तो उसके ब्लड प्रेशर, पल्स (धड़कन), सांस की गति, पसीने की ग्रंथियों की सक्रियता और रक्त प्रवाह में होने वाले बदलावों को मापा जाता है।
नतीजा: हर प्रतिक्रिया को एक संख्या (numerical value) दी जाती है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि व्यक्ति सच बोल रहा है, झूठ बोल रहा है या फिर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
माना जाता है कि 19वीं सदी में इटली के अपराध वैज्ञानिक सेसरे लोमब्रोसो ने पूछताछ के दौरान संदिग्धों के ब्लड प्रेशर में बदलाव मापने के लिए पहली बार ऐसी मशीन का इस्तेमाल किया था।
इसके बाद 1914 में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक विलियम मार्स्टन और 1921 में कैलिफोर्निया के पुलिस अधिकारी जॉन लार्सन ने इस तरह के आधुनिक उपकरण बनाए।
2. नार्को एनालिसिस (Narcoanalysis)
पॉलीग्राफ के उलट इस टेस्ट में व्यक्ति को सोडियम पेंटोथल नामक दवा का इंजेक्शन दिया जाता है।
इससे व्यक्ति एक कृत्रिम निद्रा या सम्मोहन की स्थिति में चला जाता है, जहां उसकी कल्पनाशीलता खत्म हो जाती है। माना जाता है कि इस हालत में वह झूठ नहीं गढ़ पाता और सच उगल देता है।
इस दवा को ट्रुथ सीरम (Truth Serum) भी कहा जाता है। पहले सर्जरी के दौरान एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) के रूप में इसका भारी मात्रा में इस्तेमाल होता था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान खुफिया अभियानों में भी इसका प्रयोग किया गया था।
क्या पॉलीग्राफ टेस्ट को चकमा दिया जा सकता है?
आजकल जांच एजेंसियां सच उगलवाने के लिए टॉर्चर के नरम विकल्प के रूप में इन टेस्ट्स का सहारा लेती हैं। हालांकि, वैज्ञानिक रूप से इनमें से किसी भी तरीके का 100% सफलता दर साबित नहीं हुआ है। चिकित्सा जगत में ये हमेशा विवादों में रहे हैं।
सिक्का उछालने जैसा सच: साल 2003 में अमेरिका की नेशनल रिसर्च काउंसिल ने व्यापक समीक्षा के बाद निष्कर्ष निकाला था। इसमें कहा गया कि स्क्रीनिंग के लिए पॉलीग्राफ की सटीकता एक सिक्का उछालने से थोड़ी ही बेहतर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलीग्राफ टेस्ट को आसानी से धोखा दिया जा सकता है। लोग अपनी शारीरिक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने वाले काउंटर-मेजर्स अपना लेते हैं। इसके जरिए टेस्ट के नतीजों को गलत साबित कर सकते हैं।
टेस्ट की सटीकता इस बात पर निर्भर करती है कि जांच करने वाला कितना कुशल है। टेस्ट का फॉर्मेट क्या है और हर व्यक्ति के शरीर की बनावट व प्रतिक्रियाएं कितनी अलग हैं। इसी विश्वसनीयता की कमी के कारण अमेरिकी अदालतों में पॉलीग्राफ के सबूत मान्य नहीं होते।
भारतीय कानून और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
साल 2010 के सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ फैसला सुनाया था। इसमें कहा गया कि किसी भी आरोपी पर उसकी सहमति के बिना कोई भी लाई-डिटेक्टर टेस्ट नहीं आजमाया जा सकता।
अदालत के दिशा-निर्देशों के अनुसार:
वकील और कानूनी समझ: टेस्ट के लिए तैयार होने वाले व्यक्ति को वकील की सुविधा मिलनी चाहिए। पुलिस और वकील दोनों को उसे इस टेस्ट के शारीरिक, भावनात्मक और कानूनी प्रभावों को समझाना होगा।
NHRC गाइडलाइंस: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा साल 2000 में जारी गाइडलाइंस का कड़ाई से पालन होना चाहिए।
मजिस्ट्रेट के सामने सहमति: आरोपी की सहमति को एक न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड किया जाना अनिवार्य है।
बयान बनाम सबूत: इन टेस्ट के नतीजों को इकबालिया बयान नहीं माना जा सकता। वजह है कि दवा के असर में व्यक्ति के पास सवालों के जवाब न देने का विकल्प (चॉइस) नहीं होता।
एक बड़ा अपवाद
भले ही टेस्ट में दिया गया बयान अदालत में सबूत न बने, लेकिन उस टेस्ट की मदद से बाद में खोजी गई कोई भी सामग्री या जानकारी सबूत के तौर पर मान्य होगी।
उदाहरण के लिए: अगर कोई आरोपी टेस्ट के दौरान बताता है कि उसने मर्डर वेपन कहां छुपाया है। पुलिस उस जगह से हथियार बरामद कर लेती है तो आरोपी का वह बयान तो कोर्ट में मान्य नहीं होगा। लेकिन बरामद हुआ हथियार कोर्ट में पुख्ता सबूत माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकारों, निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 20(3) को ध्यान में रखकर यह फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि किसी के दिमाग में जबरन घुसना मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता पर हमला है।
क्या गवाहों या पीड़ितों का भी यह टेस्ट हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी भी व्यक्ति को जबरन इन तकनीकों से नहीं गुजारा जा सकता। चाहे वह आपराधिक जांच का मामला हो या कोई और संदर्भ। यह नियम गवाहों और पीड़ितों पर भी लागू होता है।
गवाहों के लिए: भले ही अनुच्छेद 20(3) मुख्य रूप से आरोपी को सुरक्षा देता है, लेकिन क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) के अन्य प्रावधान इस सुरक्षा का दायरा गवाहों तक भी बढ़ाते हैं।
पीड़ितों के लिए: खासकर यौन अपराधों के मामलों में, कोर्ट ने कहा कि जांच को तेज करने के नाम पर भी किसी पीड़िता को इस टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह उनकी मानसिक निजता का उल्लंघन होगा। समाज में उनके लिए और अधिक कलंक का कारण बन सकता है।
अब आइए कुछ चर्चित मामले पर
आमतौर पर जांच एजेंसियां आरोपियों या संदिग्धों पर ही यह टेस्ट करने की अनुमति मांगती हैं। पीड़ितों या गवाहों पर शायद ही कभी। कोर्ट में किसी का सहमति देना या मना करना उसकी बेगुनाही या गुनाह का सबूत नहीं होता। आइए देखें हाल के कुछ बड़े मामले:
अभिषेक घोसालकर हत्याकांड (2024): मुंबई में एक फेसबुक लाइव के दौरान पूर्व पार्षद अभिषेक घोसालकर की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में सीबीआई ने तीन लोगों के पॉलीग्राफ टेस्ट की मांग की थी। दो ने सहमति दी, जबकि एक आरोपी ने मना कर दिया। कोर्ट ने सहमति देने वाले दो लोगों को कानूनी और शारीरिक प्रभाव समझाकर टेस्ट की अनुमति दी।
आर जी कर मेडिकल कॉलेज मामला (अगस्त 2024): कोलकाता के इस चर्चित बलात्कार और हत्या मामले में दोषी संजय रॉय और कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष का पॉलीग्राफ टेस्ट कराया गया था।
हाथरस और उन्नाव कांड (2020): उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 वर्षीय लड़की के गैंगरेप और उसके बाद हत्या कर दी गई थी। इस मामले में सीबीआई की याचिका पर चारों आरोपियों ने टेस्ट के लिए सहमति दी थी। उसी साल उन्नाव रेप पीड़िता की कार को टक्कर मारने वाले ट्रक के ड्राइवर और हेल्पर का भी टेस्ट कराया गया था।
पीएनबी धोखाधड़ी मामला (2019): पंजाब नेशनल बैंक घोटाले के एक मामले में सीबीआई एक आरोपी का टेस्ट करना चाहती थी, लेकिन कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। क्योंकि, 63 वर्षीय सेवानिवृत्त डिप्टी मैनेजर ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया और टेस्ट के लिए सहमति देने से मना कर दिया था।
इंद्राणी मुखर्जी (2017): अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या में आईएनएक्स मीडिया की संस्थापक इंद्राणी मुखर्जी ने खुद लाई-डिटेक्टर टेस्ट कराने की पेशकश की थी। लेकिन सीबीआई ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उनके पास पहले से ही पर्याप्त सबूत हैं।
आरुषि तलवार हत्याकांड: नोएडा के इस बहुचर्चित मामले में डॉक्टर राजेश तलवार और नुपुर तलवार का पॉलीग्राफ टेस्ट हुआ था। इस दौरान उनके कंपाउंडर कृष्णा के नार्को टेस्ट का वीडियो मीडिया में लीक हो गया था। इसे सुप्रीम कोर्ट ने बेहद चिंताजनक चलन बताते हुए सख्त चेतावनी दी थी।
ये भी पढ़ें:-
पुजारी, महंत या सरकार? जानिए किसके हाथ में होती है मंदिर की तिजोरी की चाबी
अगर पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है तो फिर क्या है? जानिए पूरी कानूनी तस्वीर
क्या बीयर पीने वालों को ज्यादा काटते हैं मच्छर, वैज्ञानिकों ने खोला राज
यूपीएससी 2025: EWS कोटे में एलीट क्लास की सेंध, जानिए चयनितों का पूरा सच