हाईवे की हवा खराब: टोल से भर रहा खजाना, लेकिन भ्रष्टाचार की दरारें छीन रही हैं रफ्तार
Jaipur: सोचिए, आप देश के सबसे आधुनिक दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर अपनी गाड़ी 120 की रफ्तार से दौड़ा रहे हैं। अचानक सड़क धंस जाए या गड्ढा आ जाए तो आपकी जान का क्या होगा? यह कोई डरावना सपना नहीं, बल्कि देश के चमकते राजमार्गों की कड़वी सच्चाई है।
आज देश का सरकारी खजाना टोल टैक्स से मालामाल हो रहा है, लेकिन उन्हीं पैसों से बनी सड़कों पर भ्रष्टाचार की दरारें साफ दिखने लगी हैं। राजस्थान से लेकर छत्तीसगढ़ तक हाईवे अब कमाई का जरिया तो बन गए हैं, मगर सुरक्षा के मोर्चे पर ये मौत के जाल साबित हो रहे हैं।
राजस्थान: टोल में सुपर स्टेट, क्वालिटी में फेल
राजस्थान के हाईवे आज सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन चुके हैं। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि पिछले 5 साल में राजस्थान के टोल कलेक्शन में 88% की भारी वृद्धि हुई है।
2020-21 की कमाई: 3,330.39 करोड़ रुपये
2024-25 की कमाई: 6,289.22 करोड़ रुपये
आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश के बाद राजस्थान वह राज्य है, जहां से दिल्ली के खजाने में सबसे ज्यादा पैसा जा रहा है। लेकिन, जब बात निर्माण की आती है तो स्थिति शर्मनाक है।
शो-पीस एक्सप्रेसवे की खुली पोल
देश का गौरव कहा जाने वाला दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे (NE-4) निर्माण की घटिया क्वालिटी का अड्डा बन गया है। इसके पैकेज 6, 7, 8 और 9 के निर्माण में काफी खामियां मिली हैं। हालत यह है कि सरकार को ठेकेदार पर 50 लाख रुपये का जुर्माना ठोकना पड़ा है।
इसी तरह पैकेज 4 और 5 में सड़क धंसने और रटिंग (सड़क पर पहियों के निशान बन जाना) की समस्या के लिए क्रमशः 1.06 करोड़ और 88.32 लाख रुपये के हर्जाने की वसूली की गई है।
अमृतसर-जामनगर इकोनॉमिक कॉरिडोर (NH-754K) के निर्माण में राजस्थान के हिस्से में खराब निगरानी के चलते दो प्रमुख विशेषज्ञों की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। वहीं, एक अन्य पैकेज में पुल लॉन्चिंग के दौरान नोज स्ट्रक्चर गिरने के कारण ठेकेदार पर 1 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया गया। फैब्रिकेशन और डिजाइनर टीम को 2 साल के लिए डिबार (प्रतिबंधित) कर दिया गया है।
जोधपुर-अजमेर रोड (NH-65) पर बन रहे एक आरओबी की गुणवत्ता इतनी घटिया पाई गई कि सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट ही रद्द कर दिया। ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
एमपी और छत्तीसगढ़: रफ़्तार के साथ बढ़ता खतरा
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी टोल कलेक्शन की रफ़्तार बुलेट ट्रेन जैसी है। एमपी में 2020-21 में 2,178 करोड़ रुपये टोल वसूला गया, जो 2024-25 बढ़कर 4,188 करोड़ हो चुका है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में तो कमाई तिगुनी हो गई है। इस प्रदेश में 2020-21 में 384 करोड़ रुपये का टोल वसूला गया। यह राशि 2024-25 में सीधे बढ़कर 1,146 करोड़ रुपये हो गई।
भ्रष्टाचार का भोपाल-ब्यावरा मॉडल
मध्य प्रदेश के भोपाल-ब्यावरा खंड (NH-46) पर तो भ्रष्टाचार ने सारी हदें पार कर दीं। सड़क पूरी होने से पहले ही टूटने लगी। गाड़ियां हिचकोले खाने लगीं। जब पानी सिर से ऊपर निकल गया तो सरकार ने ठेकेदार पर 119 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक जुर्माना लगाया। वर्तमान में ठेकेदार के खर्च पर ही सड़क को सुधारने का काम जारी है।
छत्तीसगढ़ में सड़क और पुल में दरारें
छत्तीसगढ़ में भी स्थिति चिंताजनक है, जहां सड़कों के साथ-साथ पुल भी जवाब दे रहे हैं। कहीं आरओबी का स्लैब गिर रहा है, तो कहीं गर्डर। एनएच-200 (नया NH-130) के सिमगा-सारगांव खंड पर सीमेंट कंक्रीट पैनल में दरारें देखी गई। यह प्रोजेक्ट 4 लेनिंग से जुड़ी है। शिकायत होने के बाद अब ठेकेदार के खर्च पर इसमें सुधार किया जा रहा है। एनएच-49 के बिलासपुर-उरदावल खंड में एक माइनर ब्रिज के स्लैब के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। यह 2 लेन अपग्रेडेशन का हिस्सा है। इसमें भी ठेकेदार के खर्च पर सुधार कराया जा रहा है।
आखिर कहां जाता है आपका टोल का पैसा?
हर व्यक्ति के मन में यह सवाल आता है कि राजस्थान, एमपी या छत्तीसगढ़ की सड़कों से वसूला गया पैसा क्या उसी राज्य में लगता है?
सच यह है कि आपका दिया हुआ एक-एक रुपया भारत की संचित निधि में जमा होता है। सरकार का तर्क है कि वहां से यह पैसा बजट के जरिए पूरे देश के हाईवे के रखरखाव और नए निर्माण में बांटा जाता है।
सरकार अब टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (TOT) मॉडल के जरिए अगले 5 साल में 3,35,500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रख रही है। यानी हाईवे को निजी हाथों में सौंपकर एकमुश्त मोटी रकम ली जाएगी।
क्या अब ड्रोन और AI बचाएंगे आपकी जान?
संसद में जब इन दरारों और भ्रष्टाचार पर सवाल उठे तो केंद्रीय मंत्री ने बताया कि अब हाईवे की निगरानी पारंपरिक तरीके से नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक से होगी। निर्माण की हर इंच की निगरानी ड्रोन से होगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बताएगा कि कहां गड़बड़ी हो रही है। आम जनता भी खराब सड़क की फोटो खींचकर ऐप पर डाल सकेगी। जो ठेकेदार घटिया काम करेगा, उसे भविष्य में काम मिलना बंद हो जाएगा।
सफर महंगा, पर सुरक्षित कब?
सड़कों पर बढ़ता टोल जनता पर आर्थिक बोझ है। लोग यह बोझ उठाने को तैयार हैं, बशर्ते उन्हें मक्खन जैसी सड़कें और सुरक्षा मिले। लेकिन जब करोड़ों का टोल देने के बाद भी हाईवे पर मौत के गड्ढे मिलें तो समझ आता है कि सिस्टम की दरारें सड़कों से कहीं ज्यादा गहरी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने जुर्माने तो लगाए हैं, लेकिन क्या यह काफी है? जब तक ठेकेदारों और अधिकारियों का अपवित्र गठबंधन नहीं टूटेगा, तब तक विकास की गाड़ी करप्शन के गड्ढों में गिरती रहेगी। सवाल साफ है, हमारा पैसा तिजोरी में, और हमारी जान जोखिम में... आखिर कब तक?
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