20 मई का इतिहास: Vasco da Gama, यूरोप से भारत के नए समुद्री रास्ते की खोज की पूरी कहानी
आज के दिन की कहानी: यह कहानी साल 1498 की है जब दुनिया का इतिहास पूरी तरह बदलने वाला था। पुर्तगाल का एक साहसी नाविक समुद्र की लहरों को चीरते हुए आगे बढ़ रहा था। उसका नाम वास्को डी गामा था।
वह कई महीनों के लंबे और थका देने वाले सफर के बाद भारत के करीब पहुंच रहा था। 20 मई 1498 को उसका जहाज केरल के कालीकट तट पर आकर रुका। कालीकट को आज के समय में हम कोझिकोड के नाम से जानते हैं।
यह कोई आम यात्रा नहीं थी बल्कि एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक खोज थी। वास्को डी गामा ने यूरोप से भारत तक का सीधा समुद्री रास्ता खोज निकाला था। इस रास्ते ने पूरी दुनिया के व्यापार को हमेशा के लिए बदल दिया।
वास्को डी गामा कौन थे
वास्को डी गामा (Vasco da Gama) पुर्तगाल का एक महान नाविक और खोजकर्ता थे। उनका जन्म 1460 में पुर्तगाल में हुआ था। इतिहास में उनका नाम इसलिए अमर है क्योंकि उन्होंने यूरोप से भारत तक का सीधा समुद्री रास्ता खोजा था।
साल 1497 में पुर्तगाल के राजा ने उन्हें भारत का रास्ता खोजने की जिम्मेदारी दी। वे 4 जहाजों और 170 नाविकों के साथ लिस्बन से निकला। अटलांटिक महासागर और अफ्रीका के खतरनाक केप ऑफ गुड होप को पार करते हुए, वे 20 मई 1498 को केरल के कालीकट तट पर पहुंचे। वहां के राजा जमोरिन ने उनका स्वागत किया।
इस खोज का मकसद भारतीय मसालों का व्यापार करना था। जब वे भारत से काली मिर्च लेकर वापस पुर्तगाल लौटे, तो उन्हें अपनी यात्रा की लागत से 60 गुना ज्यादा मुनाफा हुआ। इस रास्ते की खोज ने दुनिया का इतिहास बदल दिया। आगे चलकर ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय कंपनियों के भारत आने का रास्ता साफ हुआ। 1524 में कोच्चि (भारत) में ही उसकी मृत्यु हुई।
आखिर क्यों भारत आना चाहता था वास्को डी गामा
उस दौर में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। भारतीय मसालों की मांग पूरी दुनिया में बहुत ज्यादा थी। यूरोप के लोग भारतीय काली मिर्च और दालचीनी के दीवाने थे।
उस समय भारत से यूरोप तक माल केवल जमीन के रास्ते से जाता था। इस पुराने बिजनेस रास्ते पर अरब के व्यापारियों का पूरा नियंत्रण था। वे यूरोपीय देशों से मनमाना टैक्स वसूल करते थे।
पुर्तगाल के राजा मैनुअल प्रथम इस अरब नियंत्रण को पूरी तरह खत्म करना चाहते थे। वे सीधे भारत से मसालों का व्यापार शुरू करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने वास्को डी गामा को यह बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी।
चार जहाजों के साथ शुरू हुआ भारत का सफर
वास्को डी गामा 8 जुलाई 1497 को पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन से रवाना हुआ था। उसके साथ इस सफर पर चार बड़े समुद्री जहाज और 170 नाविक थे। यह सफर बेहद खतरनाक और अनजाना था।
वे अटलांटिक महासागर को पार करते हुए अफ्रीका के दक्षिणी कोने तक पहुंचे। इस इलाके को 'केप ऑफ गुड होप' कहा जाता है। यहां समुद्र की लहरें बहुत ऊंची और जानलेवा होती हैं।
इस मुश्किल रास्ते को पार करने में उन्हें कई महीनों का समय लगा। सफर के दौरान कई नाविकों की बीमारी और थकावट के कारण मौत भी हो गई थी। लेकिन वास्को डी गामा ने अपनी हिम्मत नहीं हारी।
कालीकट में जमोरिन और वास्को की मुलाकात
अफ्रीका का चक्कर लगाने के बाद वे हिंद महासागर में दाखिल हुए। यहां उन्हें एक गुजराती नाविक मिला जिसने भारत का रास्ता दिखाने में मदद की। आखिरकार उनका बेड़ा केरल के कालीकट तट पर पहुंच गया।
वहां के स्थानीय राजा को जमोरिन की उपाधि दी गई थी। राजा जमोरिन ने विदेशी मेहमान वास्को डी गामा का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। पुर्तगाली नाविकों को भारत की संस्कृति देखकर बहुत हैरानी हुई।
वास्को डी गामा ने राजा से व्यापार करने की अनुमति मांगी। हालांकि वहां पहले से मौजूद अरब व्यापारी पुर्तगालियों के आने से बिल्कुल खुश नहीं थे। उन्होंने राजा को भड़काने की काफी कोशिश भी की थी।
भारतीय मसालों से पुर्तगालियों को हुआ मुनाफा
तमाम विरोधों के बावजूद वास्को डी गामा भारत से मसाले खरीदने में सफल रहा। वह अपने जहाजों में भारी मात्रा में कीमती काली मिर्च और जड़ी-बूटियां लेकर वापस लौटा। पुर्तगाल वापसी का सफर भी बहुत लंबा था।
जब वह पुर्तगाल पहुंचा तो वहां उसका स्वागत एक नायक की तरह किया गया। भारत से लाए गए मसालों को जब यूरोप के बाजार में बेचा गया तो सब हैरान रह गए। पुर्तगालियों को इस यात्रा की कुल लागत से साठ गुना ज्यादा मुनाफा हुआ।
इस भारी मुनाफे ने यूरोप के बाकी देशों की आंखें भी खोल दीं। इसके बाद डच, फ्रेंच और ब्रिटिश व्यापारी भी इसी रास्ते से भारत आने लगे। इस तरह व्यापार के बहाने भारत में विदेशी ताकतों का आना शुरू हुआ।
व्यापार के बहाने भारत पहुंचे विदेशी
वास्को डी गामा की खोज ने भारत के लिए एक नए और बेहद कठिन दौर की शुरुआत की थी। इसके दूरगामी परिणाम अच्छे से ज्यादा बुरे साबित हुए। चलिए समझते हैं यह पूरी क्रोनोलॉजी।
पुर्तगालियों का गोवा और दमन-दीव पर कब्जा
भारत पहुंचने के बाद पुर्तगालियों ने धीरे-धीरे अपने इरादे बदले। उन्होंने केवल व्यापार नहीं किया, बल्कि भारतीय इलाकों पर सैन्य नियंत्रण शुरू कर दिया।
साल 1510 में अल्बुकर्क नाम के पुर्तगाली गवर्नर ने बीजापुर के सुल्तान से गोवा छीन लिया। इसके बाद दमन और दीव जैसे महत्वपूर्ण तटीय इलाकों पर भी पुर्तगालियों ने मजबूत किले बना लिए और अपना शासन स्थापित कर लिया।
भारतीय राजाओं की आपसी फूट का उठाया फायदा
पुर्तगालियों की इस भारी कामयाबी और मसालों के व्यापार में अंधा मुनाफा देखकर यूरोप के बाकी देश भी जाग गए। डच, फ्रेंच और सबसे आखिर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी इसी समुद्री रास्ते से भारत पहुंची।
उस समय भारत के राजा आपस में ही लड़ रहे थे। इन यूरोपीय ताकतों ने 'फूट डालो और राज करो' (Divide and Rule) की नीति अपनाई। उन्होंने एक राजा के खिलाफ दूसरे राजा की मदद की और बदले में व्यापारिक छूट और जमीनें हड़पना शुरू कर दिया।
अनजाने में खुला भारत की गुलामी का रास्ता
मसालों और कपड़ों के व्यापार से शुरू हुआ यह सिलसिला धीरे-धीरे टैक्स वसूलने और राजनीतिक नियंत्रण में बदल गया। अंग्रेजों ने 1757 के प्लासी के युद्ध और 1764 के बक्सर के युद्ध के बाद पूरे बंगाल पर कब्जा कर लिया।
इसके बाद अगली कुछ सदियों में पूरा हिंदुस्तान ब्रिटिश हुकूमत का गुलाम बन गया। यही वजह है कि 1498 में वास्को डी गामा का कालीकट आना भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है। इसने अनजाने में देश को सदियों की गुलामी में धकेल दिया था।
वास्को डी गामा द्वारा खोजा गया यह नया समुद्री रास्ता भारत के लिए व्यापार से बढ़कर गुलामी का एक बड़ा कारण बना। यूरोपीय ताकतों ने भारतीय राजाओं की आपसी फूट का फायदा उठाकर व्यापार के बहाने धीरे-धीरे पूरे देश पर अपना राजनीतिक नियंत्रण कर लिया। यही वजह है कि साल 1498 की यह ऐतिहासिक घटना भारत के इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट मानी जाती है, जिसने देश को सदियों की गुलामी में धकेला। आज की तारीख का इतिहास आज की तारीख का इतिहास आज की यादगार घटनाएं
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