चीन की सीमा से पाक की सरहद तक भगवा...
प्राचीन भारत में अश्वमेध यज्ञ केवल पूजा-पाठ का हिस्सा नहीं था, बल्कि शक्ति और विस्तार की खुली घोषणा था। राजा अपने सामर्थ्य पर इतना भरोसा करता था कि वह एक घोड़ा छोड़ देता...बिना रोक-टोक, बिना सीमा के। संदेश साफ होता था कि जो इस घोड़े को रोकेगा, वह युद्ध के लिए तैयार रहे। जो नहीं रोकेगा...मतलब- वह सम्राट की श्रेष्ठता स्वीकार करेगा। अब अश्वमेध यज्ञ के इस रूपक को आज के भारत के राजनीतिक नक्शे के संदर्भ में देखिए।
तीन गुना बढ़े भाजपा-एनडीए के राज्य
2014 में भारतीय जनता पार्टी जब केंद्र की सत्ता में आई, तब वह सीमित भौगोलिक दायरे में सिमटी हुई थी। यदि राज्यों की संख्या के हिसाब से बात करें तो 2014 में बीजेपी/ एनडीए शासित 7 ही राज्य थे, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय राजनीति के इतिहास में अलग अध्याय बन चुका है। अब पश्चिम बंगाल जीतने के साथ ही यानी 2026 तक बीजेपी/एनडीए शासित राज्यों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है। एक-एक करके राज्य जुड़ते गए। कहीं सीधे बहुमत, कहीं गठबंधन तो कहीं वैचारिक जमीन तैयार करके सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाया गया।
दूसरी ओर, कांग्रेस और उसके सहयोगी 14 से घटकर 6 राज्यों तक सिमट गए हैं, जबकि क्षेत्रीय और अन्य दलों की सरकारें 7 से घटकर केवल 3 रह गई हैं। अब स्थिति यह है कि आप उत्तर-पूर्व में चीन सीमा से लेकर पश्चिम में पाकिस्तान सीमा तक बिना भाजपा-एनडीए शासित क्षेत्र से बाहर निकले यात्रा कर सकते हैं। जनसंख्या के लिहाज से भी यह बदलाव बेहद बड़ा है। 2014 में एनडीए शासित राज्यों में करीब 27 करोड़ लोग रहते थे, जो 2026 में बढ़कर 110 करोड़ हो गए हैं, यानी देश की कुल आबादी का करीब 77.7 प्रतिशत। आसान शब्दों में कहें तो अब हर 10 में से लगभग 8 भारतीय ऐसे राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में रहते हैं, जहां भाजपा या एनडीए की सरकार है।
76 प्रतिशत भूभाग पर भाजपा-एनडीए का राज
भौगोलिक दृष्टि से भी भाजपा-एनडीए का विस्तार उतना ही प्रभावशाली है। 2014 में जहां एनडीए का नियंत्रण देश के 34 प्रतिशत क्षेत्र पर था, वह 2026 में बढ़कर 76 प्रतिशत हो गया है। वहीं, कांग्रेस का नक्शा इसके उलट सिमटता गया है। 2014 में कांग्रेस और उसके सहयोगियों की सरकारें 44.5 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करती थीं, जो अब घटकर 20.6 करोड़ रह गया है। सबसे ज्यादा असर क्षेत्रीय दलों पर पड़ा है, जिनकी हिस्सेदारी 35 प्रतिशत से गिरकर केवल 8 प्रतिशत रह गई है।
राज्यों की संख्या के हिसाब से देखें तो 2026 का भारत पूरी तरह से एनडीए के प्रभाव वाला नक्शा बनता नजर आ रहा है। इन 22 में शामिल प्रमुख राज्य-क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड और पुडुचेरी जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
भारतीय राजनीति में बदलाव का दौर
अब सबसे बड़ा सवाल और शोध का विषय ये है कि ऐसा हो क्यों रहा है? पार्टी विथ डिफरेंस का नारा देने वाली बीजेपी वैचारिक, संगठनात्मक और मैदानी स्तर पर ऐसा क्या कर रही है कि उसे चुनौती देना हाल-फिलहाल तो नामुमकिन ही दिख रहा है। असल में पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में स्पष्ट बदलाव दिखा है और वह है विचारधारा का केंद्रीकरण। जहां एक तरफ बीजेपी ने खुद को दक्षिणपंथ और हिंदुत्व की प्रमुख धुरी के रूप में स्थापित किया है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इस स्तर की वैचारिक स्पष्टता के साथ सामने नहीं आ पाया है।
बीजेपी की ताकत-हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान
बीजेपी की ताकत केवल चुनावी मशीनरी नहीं, बल्कि स्पष्ट नैरेटिव भी है। हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान...इन तीन स्तंभों पर उसने ऐसा राजनीतिक ढांचा खड़ा किया है, जिसमें उसका समर्थक वर्ग खुद को सीधे जुड़ा हुआ महसूस करता है। यह जुड़ाव भावनात्मक भी है और वैचारिक भी। इसके उलट, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी अलग दुविधा में फंसी हुई दिखती है। ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस ने खुद को सर्वसमावेशी पार्टी के रूप में पेश किया है, एक ऐसा मंच जो हर धर्म, हर वर्ग और हर पहचान को साथ लेकर चलता है। लेकिन मौजूदा
राजनीतिक माहौल में यही सर्वसमावेशिता कई बार उसकी कमजोरी बन जाती है। समस्या यह है कि कांग्रेस खुलकर खुद को हिंदुत्व का पैरोकार नहीं बता सकती, क्योंकि उसकी राजनीति का मूल ढांचा धर्म निरपेक्षता पर टिका है। वहीं, यदि वह केवल सबका प्रतिनिधि बनने की बात करती है तो एक बड़ा हिंदू वोटर यह महसूस कर सकता है कि उसकी विशेष पहचान को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। यहीं से बीजेपी को बढ़त मिलती है। बीजेपी के सामने यह दुविधा नहीं है। उसका संदेश स्पष्ट है और उसके समर्थकों के लिए यह किसी भ्रम की स्थिति पैदा नहीं करता।
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वैचारिक बिखराव का सामना कर रहा विपक्ष
दूसरी तरफ, विपक्षी दल चाहे कांग्रेस हो या क्षेत्रीय पार्टियां...अक्सर इस बात पर एकमत नहीं हो पाते कि उन्हें किस वैचारिक जमीन पर चुनाव लड़ना है।
यह बिखराव केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी राजनीति में भी दिखता है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रणनीतियां, विरोधाभासी गठबंधन और साझा एजेंडे की कमी...ये सभी कारक विपक्ष को एक मजबूत चुनौती बनने से रोकते हैं।
लेकिन यह तस्वीर पूरी तरह एकतरफा भी नहीं है। भारतीय वोटर्स बहुआयामी हैं। वह केवल धर्म या विचारधारा के आधार पर ही वोट नहीं करते, बल्कि विकास, स्थानीय मुद्दों, नेतृत्व और शासन के प्रदर्शन को भी उतनी ही अहमियत देते हैं। कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों की मजबूती इस बात का प्रमाण है कि वैचारिक एकरूपता के बावजूद चुनावी जीत की गारंटी नहीं होती।
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विपक्ष के पास पहचान का संकट
फिर भी, राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो बीजेपी को चुनौती देना इसलिए कठिन हो जाता है, क्योंकि उसके पास स्पष्ट पहचान है, जबकि विपक्ष अभी भी अपनी पहचान को लेकर संघर्ष कर रहा है। आखिरकार, राजनीति में सबसे बड़ी ताकत केवल संगठन या संसाधन नहीं, बल्कि स्पष्टता होती है। आप क्या हैं, किसके लिए खड़े हैं और किस दिशा में देश को ले जाना चाहते हैं?
और सिर्फ विचारधारा के स्तर पर ही नहीं, बल्कि गठबंधन के मसले पर भी कांग्रेस को स्पष्टता लानी ही होगी। उसे तय करना ही होगा कि उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में वो अपने कंधों पर बिठाकर क्षत्रिय दलों को पनपने देगी या खुद अपनी जमीन तैयार करेगी? जब तक विपक्ष इस स्पष्टता को हासिल नहीं करता, तब तक मुकाबला असमान ही बना रहेगा।
अश्वमेध के घोड़े को चलाने की ताकत जनता के हाथ
आखिर में फिर लौटते हैं अश्वमेध यज्ञ पर...। अगर इसे रूपक में कहें तो यह मानो एक ऐसा अश्वमेध का घोड़ा है, जो उत्तर-पूर्व की पहाड़ियों से निकलकर पश्चिम की सीमाओं तक दौड़ चुका है और उसके रास्ते में बहुत कम जगहें ऐसी बची हैं, जहां उसे रोका गया हो।
लेकिन यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह घोड़ा तलवारों से नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, संगठन की पकड़ और नेतृत्व की छवि के दम पर आगे बढ़ता है। जहां विरोध मजबूत रहा, वहां उसे चुनौती मिली...जहां विपक्ष बिखरा, वहां रास्ता आसान होता गया। फिर भी, लोकतंत्र और प्राचीन राजतंत्र में एक बुनियादी फर्क है। अश्वमेध में घोड़े को रोकना युद्ध का निमंत्रण था, लेकिन आज उसे रोकना केवल एक बटन दबाने जितना आसान है...मतदान का बटन। यही वजह है कि इस पूरे विस्तार को अश्वमेध यज्ञ कहना एक प्रभावशाली रूपक तो है, लेकिन साथ ही यह याद दिलाने वाला भी है कि असली ताकत आज भी जनता के हाथ में है। घोड़ा चाहे जितनी तेज दौड़े, उसकी दिशा और मंजिल आखिर में मतदाता ही तय करता है।