बुजुर्ग की चिता की आग समाज के लिए छोड़ गई सवाल...

Pawan Modiya | Aug 17, 2026, 17:45 IST
पिता की चिता
सोनीपत के एक बुजुर्ग की मौत के बाद अंतिम संस्कार का वीडियो चर्चा में है। बेटियां अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुंचीं। ऐसी ही कई घटनाओं ने बुजुर्गों, परिवार और बदलते रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि घर की सबसे बड़ी दौलत आंगन में बैठी पीढ़ियां होती हैं। दादा-दादी की कहानियां, माता-पिता, बच्चों की किलकारियां और भाई-बहनों का साथ इन्हीं से परिवार बनता था। किसी के बीमार पड़ने पर पूरा परिवार उसके सिरहाने बैठता था। लेकिन आज, जब हमारे पास दुनिया के हर कोने से जुड़ने के लिए मोबाइल है, तब सवाल यह है कि क्या हम अपने ही परिवार से दूर होते जा रहे है?



सोनीपत की घटना ने झकझोर दिया

हाल ही हरियाणा के सोनीपत का वायरल वीडियो रिश्तों की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मुंबई के कारोबारी ने अपने जीवन का अंतिम पड़ाव वृद्धाश्रम में बिताया। उनकी पत्नी भी कुछ समय पहले उनका साथ छोड़ चुकी थीं। तीन बेटियां है, एक नेपाल में, दूसरी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में और तीसरी मुंबई में। जिस पिता ने उन्हें नाजों से पाला, पढ़ाया और उनके घर बसाए, वही जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपनों के सहारे से वंचित रह गए।



उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटियां अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं पहुंचीं। वृद्धाश्रम संचालकों ने बेटियों से संपर्क कर पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह किया, लेकिन कोई भी बेटी नहीं आई। एक बेटी ने ऑनलाइन कुछ पैसे अंतिम संस्कार के लिए भेज दिए और अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली। झकझोरने वाली बात यह भी रही कि पिता की चिता जल रही थी तो वीडियो कॉल पर एक बेटी ने पूछा कि इसमें कितना समय लगेगा?



क्या पैसे मौजूदगी की जगह ले सकते हैं?

हमने कोरोना का वो दौर देखा था, जब खून के रिश्तों की हकीकत सामने आई थी पर उस समय स्थिति ही कुछ ऐसी थी कि कई लोग चाहकर भी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभा नहीं सकते थे। पर अब वो समय बीत चुका है। सोनीपत की घटना एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि वह आईना है, जिसमें हम सभी को अपने रिश्तों का चेहरा देखना चाहिए।



ऐसी घटनाएं हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर रिश्तों में ऐसी दरार कहां से आई? क्या ऑनलाइन पैसे भेज देना उस बेटे या बेटी की मौजूदगी की भरपाई कर सकता है, जिसकी जरूरत अंतिम समय में होती है?



लालच और स्वार्थ में आखिर कितना गिरेगा इंसान?

यह घटना पूरे समाज की तस्वीर नहीं है और न ही हर बेटा-बेटी ऐसा है। आज भी देश में असंख्य बच्चे अपने माता-पिता की सेवा को अपना सौभाग्य मानते हैं, लेकिन कुछ घटनाएं समाज की उस दरार को जरूर सामने लाती हैं, जिसे समय रहते भरना जरूरी है। जयपुर में भी ऐसी घटनाएं सामने आई है। कुछ समय पहले जयपुर के सांगानेर में 67 वर्षीय एक बुजुर्ग के बेटे ने उन्हें बुरी तरह मारा था, जिसका वीडियो वायरल हुआ था। इसी तरह जयपुर के प्रताप नगर में संपत्ति और सरकारी नौकरी से जुड़े लालच में एक बेटी ने अपनी मां की हत्या करवा डाली।



जीवन की पहली पाठशाला हैं माता-पिता

आखिर वह कौनसी मानसिकता है जिसमें कभी जिन माता-पिता को भगवान का रूप माना जाता था, वही स्वार्थ और संपत्ति के सामने बोझ लगने लगते है? भारतीय संस्कृति में 'मातृदेवो भवः पितृदेवो भवः' केवल कहने के लिए नहीं था। माता-पिता हमारे जीवन की पहली पाठशाला है। उन्होंने हमें बोलना सिखाया, चलना सिखाया, गिरकर उठना सिखाया और जीवन की कठिनाइयों से लड़ना सिखाया। वही माता पिता वृद्ध होते हैं तब उन्हें हमारी अंगुली और हमारे साथ की जरूरत होती है। अफसोस यह है कि कई बार हम उनके लिए समय निकालना भी कठिन समझने लगते हैं।



मोबाइल ने दूरी कम की, रिश्ते नहीं

कभी संयुक्त परिवार समाज की ताकत हुआ करते थे। दादा-दादी बच्चों को संस्कार देते थे, माता-पिता जिम्मेदारियां निभाते थे। घर में सुख होता तो सबका होता और दुख आत्ता तो पूरा परिवार उसके सामने खड़ा होता। धीरे-धीरे शहरों की ओर पलायन, बदलती जीवनशैली, कैरियर की मजबूरिया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आर्थिक परिस्थितियों ने परिवार की संरचना बदली। हमने सुख-सुविधाएं तो बढ़ा लीं, लेकिन रिश्तों की पूंजी घटा दी। हमारे पास महंगे फोन हैं, लेकिन मां-बाप से बात करने का समय नहीं। हमारे पास शानदार घर हैं, लेकिन उनमें बुजुर्गों के लिए जगह और धैर्य कम होता जा रहा है। हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए सपने देखते हैं, लेकिन क्या उन्हें यह नैतिक मूल्य भी सिखाते हैं कि अपने माता-पिता के प्रति उनकी जिम्मेदारी क्या होगी?



संयुक्त परिवारों से अकेलेपन तक

हमारी संस्कृति तो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' अर्थात 'संपूर्ण विश्व एक परिवार है' जैसी विचारधारा में विश्वास करती है। जिस सभ्यता ने पूरी पृथ्वी को परिवार मानने की सीख दी, उसी समाज में अगर अपने ही माता-पिता अकेले पड़ जाएं तो वह हमारे लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।



आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को सफल होने के साथ संवेदनशील होना भी सिखाएं। बल्कि उन्हें यह भी बताएं कि जीवन की सबसे बड़ी सफलता अपने रिश्तों को बचाए रखना है। हमें यह भी समझना होगा कि जो व्यवहार हम आज अपने माता-पिता के साथ करेंगे, वही हमारी अगली पीढ़ी देखेगी और वही सीखेगी।



बच्चे हमारी बातें कम और हमारे व्यवहार को ज्यादा याद रखते हैं। यदि वे देखेंगे कि हमने अपने बुजुर्गों को सम्मान दिया, उनके लिए समय निकाला और कठिन समय में उनका हाथ थामा तो उनके भीतर भी यही संस्कार विकसित होंगे।



संस्कार और संवेदना है हमारी असली ताकत

सोनीपत के उस बुजुर्ग की चिता अब बुझ चुकी है। शायद समय के साथ वह घटना भी समाचारों की भीड़ में कहीं पीछे छूट जाएगी, लेकिन उस चिता की आग हमारे समाज के लिए एक सवाल छोड़ गई है, क्या हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि पिता की चिता जलने तक भी हमारे पास समय नहीं है? किसी भी समाज की असली ताकत उसकी ऊंची इमारतें, बड़ी गाड़ियां या आर्थिक समृद्धि नहीं होती। उसकी असली ताकत उसके संस्कार और संवेदनाएं होती हैं।



रिश्तों की विरासत को जिंदा रखिए

रिश्ते विरासत में मिलते जरूर हैं, लेकिन उन्हें जीवित रखने के लिए हर पीढ़ी को प्रयास करना पड़ता है। इसलिए आधुनिक बनिए, आगे बढ़िए, दुनिया जीतिए, अपने सपने पूरे कीजिए, लेकिन उस घर को मत हारिए जहां से आपने जीवन की पहली शुरुआत की थी। माता-पता के साथ बैठिए, उनकी बातें सुनिए, उनके पुराने किस्से सुनकर मुस्कुराइए, उनके हाथ थामिए। क्योंकि जिंदगी में सब कुछ दोबारा मिल सकता है, लेकिन मां-बाप का साथ और उनके साथ बिताया समय दोबारा नहीं मिलता।



लेखक- राजेंद्र राठौड़राजस्थान विधानसभा केपूर्व नेता प्रतिपक्ष हैं



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