NEET पेपर लीक से शुरू हुआ आंदोलन, मंत्री की कुर्सी तक पहुंचा
Manya Jain | Aug 07, 2026, 15:41 IST
shashi tharoor cockroach andolan
शशि थरूर लिखते हैं कि NEET पेपर लीक से शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन कैसे युवाओं की सामूहिक ताकत बना, जिसके दबाव में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा और लोकतंत्र में जनता की असली ताकत का सबूत बना।
जो लोग भारत के लोकतंत्र को महज चुनावी मुकाबलों या संस्थाओं के कमजोर पड़ने की चेतावनियों के चश्मे से ही देखने के आदी हैं, उनके लिए हाल के सप्ताहों ने एक ताजगी भरा नजारा पेश किया होगा।
एक ऑनलाइन-कटाक्ष के रूप में शुरू हुआ घटनाक्रम आधुनिक भारतीय इतिहास में सबसे उल्लेखनीय और सफल युवा नेतृत्व वाले राजनीतिक आंदोलनों में से एक में बदल गया।
कॉकरोच जनता पार्टी की व्यंग्यात्मक टैगलाइन 'आलसियों और बेरोजगारों की आवाज' थी। लेकिन कुछ ही दिनों में यह सोशल मीडिया पर एक जबरदस्त ताकत के रूप में उभरी और देखते ही देखते उसने भाजपा से भी ज्यादा फॉलोअर्स जुटा लिए।
लेकिन इस मजाक की सच्चाई उन वास्तविक शिकायतों में निहित थी, जिन्हें इसने उजागर किया। विश्वविद्यालय स्नातकों में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की समस्या होने के बावजूद युवा अभी भी उच्च शिक्षा को ही सामाजिक उन्नति की अपनी एकमात्र आशा के रूप में देखते हैं।
वे प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिताते हैं। लेकिन पेपर-लीक, ग्रेडिंग में अनियमितताएं और परिणामों को अचानक रद्द किए जाने से उनके स्वप्नों पर कुठाराघात हो जाता है।
इस साल भी पेपर-लीक के कारण लगभग 22 लाख छात्रों को कठोर मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) फिर से देने को मजबूर होना पड़ा।
![cjp jantar mantar protest]()
जब उन्हें पता चला कि 3 मई की परीक्षा रद्द कर दी गई है, तो उनमें से कुछ छात्रों ने आत्महत्या कर ली। ऐसी त्रासदियों ने ही आर्थिक चिंताओं को व्यापक नैतिक आक्रोश में बदला था।
कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन इसी गुस्से की आवाज बना। इससे कोई राजनीतिक पार्टी नहीं जुड़ी थी और इसे सिविल-सोसायटी के वैचारिक रूप से विविधतापूर्ण वर्गों का समर्थन प्राप्त था। यह आंदोलन पारंपरिक राजनीतिक श्रेणीकरण को चुनौती देने वाला था।
जून तक यह स्क्रीनों से निकलकर सड़कों पर आ गया। शिक्षा-व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर राजधानी और प्रमुख शहरों में हजारों की संख्या में छात्र, सिविल सेवा के उम्मीदवार और चिंतित नागरिक इकट्ठा हुए।
इस आंदोलन की विकेंद्रीकृत प्रकृति, शिक्षा सम्बंधी चिंताओं की प्रामाणिकता और संस्थागत जवाबदेही की मांगों की नैतिक स्पष्टता जाहिर थी। प्रदर्शनकारी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए और उन्होंने संसद तक मार्च का आह्वान किया, जो प्रदर्शन स्थल से मुश्किल से दस मिनट की पैदल दूरी पर था।
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर हमले किए, कई लोगों को सड़कों पर पीटा और वॉटर कैनन व कथित रूप से पेलेट गन का भी इस्तेमाल किया गया। दिल्ली पुलिस के अनुसार करीब 180 लोग घायल हुए।
लेकिन इसने आंदोलन को दबाने के बजाय जनाक्रोश को और बढ़ा दिया और विरोध प्रदर्शन कई शहरों और कस्बों में फैल गया।
2019 के नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन और किसानों के 2020-21 के आंदोलन के विपरीत, इस छात्र आंदोलन को महज अल्पसंख्यक अधिकारों या संकीर्ण हितों पर केंद्रित आंदोलन के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता था।
मुद्दा यह है कि ये 'कॉकरोच' जिस आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे मतदाताओं का लगभग आधा हिस्सा हैं और इनमें से अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवारों से आते हैं। इनमें वे परिवार भी शामिल हैं, जो पारंपरिक रूप से भाजपा को वोट देते रहे हैं।
सत्तारूढ़ पार्टी के लिए इस समूह को अपने खिलाफ कर लेना चुनावी विफलता को आमंत्रित करने जैसा होता। यही कारण था कि सरकार को पीछे हटना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लिया गया।
भारत के युवाओं ने अपने नेताओं को याद दिलाया है कि राजनीतिक प्रतिष्ठान चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, वह जनता की सामूहिक इच्छा को अनिश्चितकाल तक अनदेखा नहीं कर सकता।
उन्होंने यह भी दिखाया कि संस्थानों को कमजोर किया जा सकता है और राजनीतिक विपक्ष को भी दबाया जा सकता है, लेकिन उस अराजक ऊर्जा पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता, जो युवाओं के प्रोटेस्ट्स को प्रेरित करती है।
लोकतंत्र केवल विधायी कक्षों, अदालतों या चुनाव आयोगों में ही निहित नहीं है। यह नागरिकों पर भी निर्भर करता है। और भारत के नागरिकों ने दिखाया है कि उनकी लोकतांत्रिक-भावना दमन से परे है।
कॉकरोच आंदोलन सत्ता-तंत्र के लिए एक अल्पकालिक राजनीतिक सिरदर्द से कहीं बढ़कर है। क्योंकि वह इस धारणा की एक बार फिर से पुष्टि करता है कि केंद्रीकरण और कार्यकारी-प्रभुत्व के अनेक वर्षों के बाद भी भारतीय लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास ही रहती है।
और न तो भारत की जनता कहीं जाने वाली है, न ही हमारा लोकतंत्र।
युवाओं के प्रोटेस्ट्स को प्रेरित करने वाली ऊर्जा पर अंकुश लगाना सरल नहीं है। भारत के नागरिकों ने यही दिखाया है।
(लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद हैं। यह लेख प्रोजेक्ट सिंडिकेट के लिए लिखा गया है।)
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एक ऑनलाइन-कटाक्ष के रूप में शुरू हुआ घटनाक्रम आधुनिक भारतीय इतिहास में सबसे उल्लेखनीय और सफल युवा नेतृत्व वाले राजनीतिक आंदोलनों में से एक में बदल गया।
कॉकरोच जनता पार्टी की व्यंग्यात्मक टैगलाइन 'आलसियों और बेरोजगारों की आवाज' थी। लेकिन कुछ ही दिनों में यह सोशल मीडिया पर एक जबरदस्त ताकत के रूप में उभरी और देखते ही देखते उसने भाजपा से भी ज्यादा फॉलोअर्स जुटा लिए।
लेकिन इस मजाक की सच्चाई उन वास्तविक शिकायतों में निहित थी, जिन्हें इसने उजागर किया। विश्वविद्यालय स्नातकों में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की समस्या होने के बावजूद युवा अभी भी उच्च शिक्षा को ही सामाजिक उन्नति की अपनी एकमात्र आशा के रूप में देखते हैं।
पेपर लीक से टूटा भरोसा
इस साल भी पेपर-लीक के कारण लगभग 22 लाख छात्रों को कठोर मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) फिर से देने को मजबूर होना पड़ा।
cjp jantar mantar protest
जब उन्हें पता चला कि 3 मई की परीक्षा रद्द कर दी गई है, तो उनमें से कुछ छात्रों ने आत्महत्या कर ली। ऐसी त्रासदियों ने ही आर्थिक चिंताओं को व्यापक नैतिक आक्रोश में बदला था।
सड़कों तक पहुंचा आंदोलन
जून तक यह स्क्रीनों से निकलकर सड़कों पर आ गया। शिक्षा-व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर राजधानी और प्रमुख शहरों में हजारों की संख्या में छात्र, सिविल सेवा के उम्मीदवार और चिंतित नागरिक इकट्ठा हुए।
इस आंदोलन की विकेंद्रीकृत प्रकृति, शिक्षा सम्बंधी चिंताओं की प्रामाणिकता और संस्थागत जवाबदेही की मांगों की नैतिक स्पष्टता जाहिर थी। प्रदर्शनकारी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए और उन्होंने संसद तक मार्च का आह्वान किया, जो प्रदर्शन स्थल से मुश्किल से दस मिनट की पैदल दूरी पर था।
पुलिस की सख्ती और बढ़ता जनाक्रोश
लेकिन इसने आंदोलन को दबाने के बजाय जनाक्रोश को और बढ़ा दिया और विरोध प्रदर्शन कई शहरों और कस्बों में फैल गया।
2019 के नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन और किसानों के 2020-21 के आंदोलन के विपरीत, इस छात्र आंदोलन को महज अल्पसंख्यक अधिकारों या संकीर्ण हितों पर केंद्रित आंदोलन के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता था।
मध्यमवर्ग की नाराजगी क्यों बनी सरकार की मुसीबत?
सत्तारूढ़ पार्टी के लिए इस समूह को अपने खिलाफ कर लेना चुनावी विफलता को आमंत्रित करने जैसा होता। यही कारण था कि सरकार को पीछे हटना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लिया गया।
सत्ता जनता की, सीमाएं सरकार की
उन्होंने यह भी दिखाया कि संस्थानों को कमजोर किया जा सकता है और राजनीतिक विपक्ष को भी दबाया जा सकता है, लेकिन उस अराजक ऊर्जा पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता, जो युवाओं के प्रोटेस्ट्स को प्रेरित करती है।
लोकतंत्र केवल विधायी कक्षों, अदालतों या चुनाव आयोगों में ही निहित नहीं है। यह नागरिकों पर भी निर्भर करता है। और भारत के नागरिकों ने दिखाया है कि उनकी लोकतांत्रिक-भावना दमन से परे है।
एक अल्पकालिक सिरदर्द से कहीं ज्यादा
और न तो भारत की जनता कहीं जाने वाली है, न ही हमारा लोकतंत्र।
युवाओं के प्रोटेस्ट्स को प्रेरित करने वाली ऊर्जा पर अंकुश लगाना सरल नहीं है। भारत के नागरिकों ने यही दिखाया है।
(लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद हैं। यह लेख प्रोजेक्ट सिंडिकेट के लिए लिखा गया है।)
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