पर्सनैलिटी कल्ट: नेहरू और अंबेडकर की चेतावनी आज भी क्यों जरूरी है

Amresh Kushwaha | Aug 11, 2026, 14:35 IST
पर्सनैलिटी कल्ट
1937 में नेहरू ने खुद अपनी बढ़ती लोकप्रियता को देश के लिए खतरा बताया था। अम्बेडकर ने भक्ति को राजनीति से बाहर रखने की चेतावनी दी थी। यह लेख बताता है कि पर्सनैलिटी कल्ट कैसे लोकतंत्र और संस्थाओं को धीरे-धीरे कमजोर करते हैं।

नेहरू ने खुद अपनी लोकप्रियता को खतरा क्यों बताया?

1937 में, जब देश गुलामी और आजादी के पक्के वादे के बीच फंसा हुआ था, द मॉडर्न रिव्यू में राष्ट्रपति नाम का एक लेख छपा। इस पर अजीब तरह से चाणक्य का साइन था।



आज हम जानते हैं कि इसके लेखक जवाहरलाल नेहरू थे, लेकिन उस समय पढ़ने वाले को यह पता नहीं था। यह लेख आज के इतिहास में राजनीतिक खुद को परखने के सबसे अजीब कामों में से एक है- अपनी लोकप्रियता के चरम पर एक नेता बिना नाम बताए उन खतरों के बारे में लिख रहा है जो उसकी अपनी लोकप्रियता देश के लिए पैदा कर रही है।



तब तक नेहरू एक पॉलिटिशियन से कहीं ज्यादा बन चुके थे। लाखों लोगों के लिए, वे भारत की उम्मीदों और आजादी की चाहत की निशानी थे। उनके लिए तारीफें उमड़ पड़ीं और, जैसा कि लेख के लेखक ने माना, यह परेशान करने वाला भी था।



नेहरू ने मुसोलिनी के इटली और हिटलर के जर्मनी की छाया में लिखा, लेकिन तानाशाही को लेकर चिंता उनके अपने जमाने से कहीं ज्यादा थी। जैसा कि वे समझते थे, डेमोक्रेसी के लिए सबसे बड़ा खतरा हमेशा ऊपर से थोपा गया जुल्म नहीं होता। कभी-कभी यह नीचे से भी उभरता है- आम लोगों की नागरिकता का बोझ किसी ऐसे इंसान को सौंपने की चाहत से जो जिंदगी से भी बड़ा लगता है।



भक्ति को राजनीति से बाहर क्यों रखना चाहिए?

राजनीति मिथक बनाने के लिए एक उपजाऊ जगह है। देश अपने बारे में कहानियां सुनाते हैं- कहानियां जो लोगों के आस-पास बनती हैं, जैसे वाशिंगटन का डेलावेयर पार करना, माओ का 1966 में यांग्त्जी नदी पार करना और ऐसी ही दूसरी कहानियां।



एक समाज अपनी उम्मीदें और डर एक मसीहा के रूप में देखे जाने वाले व्यक्ति के ऊपर डाल देता है। लेकिन नेताओं को पूजा की चीज बना देना लोकतंत्र के लिए शायद ही कभी अच्छा साबित होता है।



नेहरू यह बात समझते थे। द प्रेसिडेंट से जो बात निकलती है, वह निरंकुशता (Despotism) नहीं बल्कि स्टंटेड यानी बाधित विकास है। ऐसा इसलिए नहीं था कि भारत सत्तावादी (Authoritarian) बन जाएगा, बल्कि इसलिए था कि भारत का बढ़ना बंद हो जाएगा।



जो लोग एक ही इंसान में मुक्ति ढूंढने के आदी हो जाते हैं, वे वे आदतें खो देंगे जो रिपब्लिकन जीवन को बनाए रखतीहैं- संदेह, बहस, भागीदारी और जिम्मेदारी। आजादी कभी भी सिर्फ ब्रिटिश हाथों से भारतीय हाथों में पावर का ट्रांसफर नहीं थी। यह नागरिक के मन की आजादी थी।



अंबेडकर ने संविधान सभा में क्या चेतावनी दी थी?

करीब एक दशक बाद, भारत के रिपब्लिक बनने से एक दिन पहले, डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर उसी बात पर वापस आए। हालांकि ज्यादा सख्त भाषा में। 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए, उन्होंने भारतीय पॉलिटिकल सोच की सबसे गहरी चेतावनियों में से एक दी।



भारतीय सभ्यता की गहरी समझ ने इन शब्दों को प्रेरित किया। भक्ति हमारी आध्यात्मिक परंपराओं में एक पवित्र स्थान रखती है। लेकिन अम्बेडकर ने जोर देकर कहा कि राजनीति एक अलग क्षेत्र से जुड़ी है। जांच भक्ति की जगह ले लेती है और जवाबदेही हार मानने को मना कर देती है।



तानाशाही (Dictatorship) के पुराने रूप से ज्यादा, अम्बेडकर को डेमोक्रेटिक कल्चर के धीरे-धीरे खत्म होने का डर था।



उन्होंने कहा- संविधान बनाए जा सकते हैं और चुनाव होंगे, लेकिन रिपब्लिक आखिरकार मन की आदतों पर निर्भर करते हैं। वे उन नागरिकों पर निर्भर करते हैं जो मुश्किल सवाल पूछने को तैयार हों, पावर के जमावड़े पर भरोसा न करें और देश के प्रति वफादारी व नेता के प्रति वफादारी के बीच फर्क करने को तैयार हों।



पर्सनैलिटी कल्ट की त्रासदी यह है कि वे हमें अपने फैसले दूसरों को सौंपने और तारीफ को देशभक्ति समझने के लिए बढ़ावा देते हैं।



आज के दौर में मसीहा बनाने का चलन क्यों बढ़ा है?

यह चिंता सदियों पुरानी है, लेकिन आज भी उतनी ही सच है। हाल ही में एज्रा क्लेन ने क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म 'द ओडिसी' और एलन मस्क-डोनाल्ड ट्रंप के दौर पर बात करते हुए एक दिलचस्प फर्क बताया। एक तरफ वो लोग हैं जो संयम रखते हैं। दूसरों के साथ मिलकर काम करते हैं और समाज से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं। दूसरी तरफ वो लोग हैं जो टूट-फूट और जीत को पसंद करते हैं।



आज चाहे राजनीति हो या टेक्नोलॉजी, ताकतवर लोगों का आकर्षण एक ही वादे में छिपा है- आगे बढ़ने का वादा। कोई एंटरप्रेन्योर कहता है कि वह मंगल ग्रह पर बस्ती बसाएगा। कोई बाहरी नेता कहता है कि वह भ्रष्टाचार और नाकामी को जड़ से खत्म कर देगा।



सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसी कहानियां लगभग महाकाव्य जैसी बन जाती हैं। राजनीति एक तमाशा बन जाती है, और नागरिक सिर्फ दर्शक रह जाते हैं।



होमर को शायद यह बात पसंद आती। क्योंकि ओडीसियस सिर्फ एक जीतने वाला हीरो नहीं था। वह कमजोर भी था, चालाक भी, बेचैन भी- और अक्सर अपनी ही कहानी में उलझा हुआ। ओडिसी की असली खूबी बहादुरी दिखाने में नहीं, बल्कि बहादुरी की सीमाएं समझने में है।



यह कहानी जीत पर नहीं, बल्कि घर लौटने पर खत्म होती है। और इसका सबक साफ है- कोई भी इंसान, चाहे कितना भी काबिल क्यों न हो, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता।



तो लोकतंत्र की असली परीक्षा क्या है?

यही सबक नेहरू और अम्बेडकर अपने- अपने तरीके से भारत को सिखाने की कोशिश कर रहे थे। लोकतंत्र- जरूरी इंसान के विचार के खिलाफ एक तर्क है। यह तर्क देता है कि पर्सनैलिटी से ज्यादा इंस्टीट्यूशन मायने रखती हैं और पावर को खुद से बड़ी किसी चीज के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए। डेमोक्रेसी में विजनरी की जरूरत होती है, लेकिन उन्हें शक करने वालों की भी जरूरत होती है।



पर्सनैलिटी कल्ट की त्रासदी यह है कि वे हमें अपने फैसले दूसरों पर डालने और तारीफ को देशभक्ति समझने के लिए बढ़ावा देते हैं। वे हमें यह यकीन दिलाने के लिए लुभाते हैं कि इतिहास लाखों आम आदमियों और औरतों की अक्सर दिखाई न देने वाली मेहनत से नहीं, बल्कि अकेले हीरो बनाते हैं।



किसी लोकतंत्र का असली पैमाना यह नहीं है कि वह असाधारण लीडर पैदा कर सकता है या नहीं। बल्कि यह है कि क्या वह उन पर निर्भर हुए बिना खुद को नया कर सकता है।



लेखिका:निरुपमा राव, पूर्व राजनयिक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनकी निजी राय है।



FAQ

  1. पर्सनैलिटी कल्ट क्या है और यह लोकतंत्र को कैसे नुकसान पहुंचाता है?
    पर्सनैलिटी कल्ट का मतलब है किसी एक नेता को इतना महिमामंडित करना कि वह संस्थाओं से ऊपर दिखने लगे। इससे नागरिक सवाल पूछना बंद कर देते हैं और अपनी जिम्मेदारी नेता को सौंप देते हैं।
  2. नेहरू ने 1937 में गुमनाम लेख क्यों लिखा था?
    नेहरू ने चाणक्य नाम से द मॉडर्न रिव्यू में लेख लिखकर खुद अपनी बढ़ती लोकप्रियता के खतरों की चेतावनी दी थी, ताकि वे तानाशाह न बन जाएं।
  3. अम्बेडकर ने भक्ति को लेकर क्या कहा था?
    25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अम्बेडकर ने कहा कि धर्म में भक्ति मुक्ति का रास्ता है, लेकिन राजनीति में भक्ति या हीरो-वरशिप तानाशाही की ओर ले जाती है।

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