सूचना की लड़ाईः लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई बन चुकी है

Pawan Modiya | Jul 14, 2026, 17:46 IST
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नोबेल विजेता रेसा की चेतावनी
नोबेल विजेता रेसा की चेतावनी

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया रेसा ने मीडिया एंड डेमोक्रेसी समिट में कहा कि सूचना की लड़ाई अब लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई बन चुकी है। उन्होंने झूठ, दुष्प्रचार, तकनीक और पत्रकारिता के भविष्य पर चिंता जताई।

मैं वर्षों से पत्रकार हूं और मैंने अपनी आंखों के सामने सूचना की दुनिया को बदलते देखा है। कभी पत्रकारिता का सबसे बड़ा काम सत्ता से सवाल पूछना था। आज उससे भी बड़ा काम यह साबित करना हो गया है कि सच अभी भी मौजूद है। मुझे सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि हम सूचना के ऐसे दौर में पहुंच चुके है, जहां झूठ को सच से अधिक ताकत मिल रही है। यह केवल किसी व्यक्ति के झूठ बोलने की समस्या नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था की समस्या है, जो झूठ को तेजी से फैलाने के लिए बनाई गई है।

लोकतंत्र का संकट केवल राजनीतिक नहीं

डिजिटल मंचों का आर्थिक मॉडल लोगों को सही जानकारी देने पर नहीं, बल्कि उनका ध्यान अधिक से अधिक समय तक बांधे रखने पर आधारित है। यदि गुस्सा, डर, सनसनी और नफरत लोगों को अधिक देर तक स्क्रीन पर रोकते हैं, तो एल्गोरिदम उसी सामग्री को आगे बढ़ाते हैं। इसीलिए मैं बार-बार कहती हूं कि आज लोकतंत्र का संकट केवल राजनीतिक नहीं है, यह सूचना-तंत्र का संकट है। एक प्रसिद्ध शोध बताता है कि झूठ, सच की तुलना में कई गुना तेजी से फैलता है। में इसे केवल आंकड़ों में नहीं, अपने अनुभव में भी देख चुकी हूं। जब झूठ इतनी गति से फैलता है कि सत्य उसके पीछे छूट जाए, तब नागरिक सही निर्णय कैसे लेंगे? लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था इसी पर तो टिकी है कि लोग तथ्य जानकर निर्णय लें।

सवाल पूछो तो मुकदमे दायर किए जाते हैं

मैंने अपने देश फिलीपींस में इसका परिणाम भुगता है। हमारे समाचार मंच रैप्लर ने सत्ता से प्रश्न पूछे, भ्रष्टाचार और दुष्प्रचार का दस्तावेजीकरण किया, तो हमें चुप कराने के लिए अनेक कानूनी मुकदमे दायर किए गए। कर कानूनों का इस्तेमाल हुआ, विदेशी स्वामित्व के आरोप लगाए गए, तरह-तरह की कानूनी प्रक्रियाओं में हमें उलझाया गया। उ‌द्देश्य केवल अदालत में जीतना नहीं था। उद्देश्य हमें इतना थका देना था कि हम स्वयं ही प्रश्न पूछना छोड़ दें। यही आधुनिक दौर का नया सेंसरशिप मॉडल है। अब हमेशा समाचार पत्र बंद नहीं किए जाते, पत्रकारों को जेल नहीं भेजा जाता। उन्हें मुकदमों, आर्थिक दबाव, ऑनलाइन हिंसा और दुष्प्रचार के ऐसे जाल में फंसा दिया जाता है कि वे स्वयं चुप हो जाएं। लेकिन मैंने एक बात सीखी है, ऐसी लड़ाई कोई अकेला पत्रकार नहीं जीत सकता। हमें नागरिक, समाज, वकीलों, पत्रकार संगठनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साझी ताकत की आवश्यकता होती है। यदि हम एक-दूसरे का साथ छोड़ देंगे तो सच की रक्षा करना असंभव हो जाएगा।

इंटरनेट झूठ, षड्यंत्र और दुष्प्रचार से भरा

आज मेरी चिंता एआई को लेकर भी है। यदि आज का इंटरनेट झूठ, षड्यंत्र और दुष्प्रचार से भर चुका है, तो उसी सामग्री पर प्रशिक्षित एआई भविष्य में कैसी दुनिया बनाएगा? हम ऐसी मशीनों से सत्य की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं, जिन्हें असत्य से प्रशिक्षित किया गया हो? इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी जुड़ा है। समाचार संस्थानों और पत्रकारों ने वर्षों की मेहनत से विश्वसनीय सामग्री तैयार की। अब वही सामग्री एआई मॉडल बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। लेकिन जिन लोगों ने वह सामग्री तैयार की, उनसे न तो अनुमति ली गई और न ही उचित प्रतिफल दिया गया। यदि स्वतंत्र पत्रकारिता का आर्थिक आधार ही समाप्त कर दिया जाएगा तो भविष्य में सत्य का स्रोत कहां बचेगा?

तकनीक का मकसद समाज के हित में होना चाहिए

मैं तकनीक के विरुद्ध नहीं हूं। तकनीक अपने आप में न लोकतांत्रिक होती है और न तानाशाही। प्रश्न यह है कि उसे नियंत्रित कौन कर रहा है और किस उद्देश्य से कर रहा है। यदि एल्गोरिदम का लक्ष्य केवल लाभ कमाना होगा, तो वे समाज के हित में काम नहीं करेंगे। मेरे लिए इस पूरे संकट का सार बहुत सरल है। यदि तथ्य नहीं होंगे, तो सत्य नहीं होगा। यदि सत्य नहीं होगा, तो विश्वास नहीं होगा। यदि विश्वास नहीं होगा, तो हमारे बीच कोई साझा वास्तविकता नहीं बचेगी। और यदि साझा वास्तविकता नहीं बचेगी, तो लोकतंत्र भी नहीं बचेगा।

सत्य की रक्षा करती है स्वतंत्र पत्रकारिता

इसीलिए में मानती हूं कि स्वतंत्र पत्रकारिता किसी उद्योग का नाम नहीं है। यह लोकतंत्र की आधारभूत संरचना है। जिस तरह न्यायपालिका कानून की रक्षा करती है, उसी तरह स्वतंत्र पत्रकारिता सत्य की रक्षा करती है। यदि हम इसे खो देंगे तो केवल समाचार संस्थान नहीं खोएंगे, बल्कि एक-दूसरे पर भरोसा करने की क्षमता भी खो देंगे। मुझे अब भी उम्मीद है। दुनिया भर में ऐसे पत्रकार हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी सच लिख रहे हैं। ऐसे नागरिक है जो दुष्प्रचार के विरुद्ध खड़े हैं। ऐसे समाज हैं जो लोकतंत्र को केवल मतदान नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचने के अधिकार के रूप में देखते हैं। लेकिन यह उम्मीद तभी सार्थक होगी, जब हम सब यह स्वीकार करें कि सूचना की लड़ाई अब लोकतंत्र सबसे बड़ी लड़ाई बन चुकी है।

(हाल ही पेरिस में आयोजित 'मीडिया एंड डेमोक्रेसी समिट' में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया रेसा के संबोधन के प्रमुख अंश, पत्रिका से साभार)

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