बोल हरि बोल: सत्ता के गलियारों में रौब, रोष और रील का रियलिटी शो!

Harish Divekar | Apr 26, 2026, 12:00 IST
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मध्यप्रदेश के सत्ता गलियारों में इन दिनों कई चर्चित घटनाएं सामने आई हैं। इनमें मंत्री की गालियां, अफसरों की बेचैनी, महंगे गिफ्ट, और किसानों के मुद्दे पर श्रेय की सियासत प्रमुख हैं। वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के कॉलम बोल हरि बोल में पढ़िए इन घटनाओं के बारे में विस्तार से...

BHOPAL. सत्ता और सिस्टम के बीच खिंची अदृश्य रेखाओं पर इन दिनों हलचल कुछ ज्यादा ही है। कभी मंत्रीजी आईएएस से गाली-गलौज करते हैं, तो कभी अफसर खुद अपनी पोस्टिंग के लिए बेचैन नजर आते हैं। कहीं एक गिफ्ट चर्चा का कारण बन जाता है, तो कहीं नियुक्तियों के फैसले सियासी समीकरणों को उलझा देते हैं। उधर, किसानों के मुद्दे पर श्रेय की सियासत गरमा रही है और इधर कलेक्टर साहब की रील नेताजी की पूरी रणनीति पर भारी पड़ रही है।



कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों हर दिन एक नई कहानी बन रही है। इसमें तड़क-भड़क भी है, तंज भी और ताज्जुब भी। आप तो सीधे नीचे उतर आइए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।



हमारे मंत्री ने ले ली आईएएस की क्लास

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कल तक राजशाही मानी जाने वाली आईएएस-आईपीएस की नौकरी का हाल इन दिनों बाबुओं से बुरा हो गया है। अब देखिए न, बीजेपी विधायक प्रीतम लोधी और आईपीएस आयुष जाखड़ का मामला ठंडा भी नहीं हुआ कि दूसरा मामला उबाल मारने की तैयारी में आता दिख रहा है।



एक कद्दावर मंत्रीजी के पीए लोगों में रौब झाड़कर कहते फिर रहे हैं कि साहब ने एक आईएएस अफसर की लू उतार दी है। पीए का कहना है कि मंत्रीजी ने जानबूझकर कलेक्टर-कमिश्नर के सामने युवा आईएएस अफसरों को गालियां दीं, ताकि दोनों ही अलर्ट रहें कि उन्हें हल्के में नहीं लेना है।



मजे की बात ये है कि मंत्रीजी गुस्सा उतरने के बाद इस मामले में चुप हैं। लेकिन चाय से ज्यादा गरम केतली का क्या करेंगे? पीए साहब मंत्रीजी की बहादुरी का गुणगान कर रहे हैं। शायद पीए समझ नहीं पा रहे कि यदि युवा आईएएस ने इस मामले में एसोसिएशन या मुख्यमंत्री को शिकायत कर दी तो मामला गरमा सकता है।



बहरहाल, मामला हमारे संज्ञान में आया है। तह तक जाना जरूरी है। जल्द ही हम पूरे मामले का खुलासा करेंगे कि आखिर मंत्रीजी ने युवा आईएएस को गालियां क्यों दीं!



पंडितजी कलेक्टरी के लिए बेचैन

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एक प्रमोटी आईएएस अफसर दूसरी बार कलेक्टर बनने के लिए बेचैन हैं। ये साहब जिले में जाने के लिए हर जगह हाथ-पैर मार रहे हैं। जैसे-तैसे सेटिंग करके पिछली लिस्ट में नाम जुड़वा भी लिया था, लेकिन बड़े साहब ने लाल पेन चला दिया।



दरअसल, इन साहब का दर्द है कि उनके बैच के साथियों ने एक से ज्यादा बार कलेक्टरी कर ली, लेकिन उन्हें एक जिले के बाद चलता कर दिया। तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह के करीबी होने के कारण इस प्रमोटी अफसर को मनपसंद का जिला मिला था।



मैदानी रिपोर्ट अच्छी न होने के बावजूद ये टिके रहे। डॉक्टर साहब के आते ही इन्हें हटाया गया। हालांकि इनके रिश्तेदार डॉक्टर साहब के करीबी हैं, इसलिए इन्हें एक संचालनालय की जिम्मेदारी मिल गई। लेकिन पंडितजी का मन तो कलेक्टरी में ही लगा हुआ है।



गिफ्ट लेकर फंसी महिला आईएएस

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महिला आईएएस महंगे गिफ्ट को लेकर चर्चा में हैं। जबकि महिला आईएएस ने न तो कुछ गलत किया ना ही गिफ्ट मांगा था। आदिवासी महकमे के एक अफसर की लापरवाही से महिला आईएएस चर्चा में आ गईं। दरअसल, मैडम का कलेक्टरी से तबादला हुआ तो जिले के अधिकारी-कर्मचारियों ने मैडम के सम्मान में विदाई समारोह का आयोजन किया।



इस आयोजन में मैडम को किसी ने गुलदस्ता दिया तो किसी ने छोटा-मोटा गिफ्ट देकर सम्मान किया। लेकिन आदिवासी महकमे के एक अफसर ने एप्पल का एक बड़ा बैग गिफ्ट में दे दिया। कहा जा रहा है कि इसमें महंगा वाला लैपटॉप और लेटेस्ट आईफोन था।



साहब यहीं नहीं रुके, उन्होंने मैडम को यह महंगा वाला गिफ्ट देते हुए फोटो खिंचवाकर अपने सोशल मीडिया पर डाल दी। बस यहीं से मैडम महंगा गिफ्ट लेने के नाम पर चर्चा में आ गईं। बेचारी अब किसी से कुछ कहे भी तो क्या कहे, क्योंकि सिविल सर्विस रूल में महंगे गिफ्ट लेने के भी अपने नियम हैं; उसकी जानकारी सरकार को देनी होती है। आदिवासी विभाग के साहब खुद तो फंसे ही, साथ में मैडम को भी उलझा दिया।



कैसे हो गई इनकी नियुक्ति?

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निगम-मंडल में नियुक्तियों की कवायद के बीच एक ऐसा फैसला भी सामने आया है, जिसने सियासी हलकों में बहस छेड़ दी है। इसे सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश माना जाए या जल्दबाजी में लिया गया फैसला, पर बीजेपी और सरकार दोनों की किरकिरी हो रही है।



दरअसल, यह मामला मछुआ कल्याण बोर्ड से जुड़ा है, जहां निवाड़ी जिले के महेश केवट को अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया है। कहानी यहीं से शुरू होती है। महेश केवट को वर्ष 2022 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में छह साल के लिए निष्कासित किया गया था।



इसका सीधा अर्थ है कि उनका निष्कासन काल अभी खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में उसी अवधि के भीतर उन्हें बोर्ड की जिम्मेदारी और राज्यमंत्री का दर्जा मिलना कई सवाल खड़े कर रहा है।



सबसे बड़ी बात यह है कि विरोध सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं है। पार्टी के भीतर भी इस फैसले को लेकर असहजता महसूस की जा रही है। संगठन के कुछ नेता इसे अनुशासन और निर्णय प्रक्रिया के मानकों के खिलाफ मान रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि जब निष्कासन की कार्रवाई अभी प्रभावी है, तो फिर यह नियुक्ति किस आधार पर की गई?



किसानों का मसीहा कौन?

सियासत में पूरा खेल जमावट, दिखावट और सजावट का होता है। अब देखिए ना, मध्यप्रदेश में एमएसपी पर गेहूं खरीदी को लेकर उठी हलचल के बीच पूरी कवायद श्रेय पर जा अटकी है। डॉक्टर साहब यानी सीएम डॉ. मोहन यादव ने केंद्र सरकार को गेहूं खरीदी का कोटा बढ़ाने के लिए पत्र लिखा। फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर वस्तु स्थिति बताई। वे यहीं नहीं रुके। इसके बाद सोशल मीडिया के जरिए मन की बात की।



इन सबके बीच मामा ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डाली। सोशल मीडिया के जरिए किसानों के संकट हरने की बात कही। दूसरी ओर मामा की सोशल मीडिया मशीनरी भी बारीकी से नैरेटिव गढ़ने में जुटी रही। पोस्टर तैयार हुए, संदेश गढ़े गए। पूरा जोर इस बात पर रहा कि तस्वीर के केंद्र में मामा ही समाधान के चेहरे के रूप में दिखें।



कुल मिलाकर एमएसपी पर मुद्दा मामा वर्सेज भैया हो गया है। अब किसान कह रहे हैं कि हमारा असल मसीहा कौन है? इधर, जानकारों का कहना है कि पार्टी में ही दो फाड़ हुआ पड़ा है, विपक्ष को तो कुछ करने की ही जरूरत नहीं है।



कलेक्टर साहब काम करते हैं...

प्रशासनिक हलकों में अक्सर यह बहस चलती रहती है कि मध्यप्रदेश के किस जिले में बेहतर काम हो रहा है। हर किसी के पास अपने-अपने उदाहरण हैं। लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया की अदालत में फैसला कुछ और ही है। यहां तो चर्चा चंबल अंचल के एक जिले की सबसे ज्यादा है।



यहां के कलेक्टर और कप्तान साहब की जोड़ी को परफेक्ट सिंक कहा जा रहा है। दोनों की जमीनी सक्रियता गजब की है। इसी के साथ डिजिटल मौजूदगी भी कम दिलचस्प नहीं है। फर्क बस इतना है कि यह काम फाइलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधा सोशल मीडिया पर पहुंच जाता है और यहीं से कहानी बनती है।



कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि कलेक्टर साहब की यह सक्रियता इस इलाके के नेताजी पर भी भारी पड़ रही है। पद न होने की वजह से नेताजी सोशल मीडिया पर मौजूदगी से अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन कलेक्टर साहब की एक रील उस पूरी कोशिश पर भारी पड़ जाती है।



अब कलेक्टर साहब का गांव में रात बिताने का एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है। वे चारपाई पर गहरी नींद में नजर आ रहे हैं। उनके चाहने वाले कह रहे हैं कि साहब वर्कहोलिक (Workaholic) हैं। आप बताएं, क्या विचार हैं आपके?



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