आयुर्वेदिक दवाएं सोने-चांदी के कारण हुई महंगी, 7000 तक बढ़े रेट
News in short
- सोने और चांदी की बढ़ी हुई कीमतों से आयुर्वेदिक दवाओं की कीमतें भी बढ़ गई हैं।
- डायबिटीज की दवाएं और च्यवनप्राश में 10-40% तक महंगाई आई है।
- आयुर्वेदिक दवाओं में सोने और चांदी के नैनो पार्टिकल्स का इस्तेमाल होता है।
- राजस्थान में इन दवाओं का कारोबार 100 से 150 करोड़ रुपए का है।
- इस महंगाई का असर रिसर्च और दवा व्यापार पर पड़ रहा है।
News in detail
आयुर्वेदिक दवाओं पर महंगाई की मार आयुर्वेदिक दवाओं में सोने और चांदी का इस्तेमाल बहुत आम है। लेकिन इनकी कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। पिछले एक साल में सोने और चांदी के दामों में 75% और 167% का इजाफा हुआ है।
सोने-चांदी के रेट बढ़ने से आयुर्वेदिक दवाओं की कीमतें भी बढ़ गई हैं। विशेषकर डायबिटीज, च्यवनप्राश और कमजोरियों को दूर करने वाली दवाइयां अब ज्यादा महंगी हो गई हैं।
दवाओं में कीमती धातुओं का यूज
आयुर्वेदिक दवाओं में सोने और चांदी के नैनो पार्टिकल्स का उपयोग होता है। सोने का इस्तेमाल आमतौर पर इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में किया जाता है, जबकि चांदी से ब्रेन फंक्शन को बेहतर किया जाता है।
ये दोनों मेटल्स दवाओं में शामिल होते हैं ताकि रोगों का इलाज बेहतर तरीके से हो सके। चांदी का उपयोग बैक्टीरिया से लड़ने के लिए भी किया जाता है, और यही कारण है कि आयुर्वेदिक दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो रही है।
50% तक महंगी हुईं दवाइयां
राजस्थान में आयुर्वेदिक दवाओं का व्यापार सालाना 100 से 150 करोड़ रुपए के आसपास है। इससे जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि चांदी से बनी दवाइयां 20-25% तक महंगी हो गई हैं।
जबकि सोने से बनी दवाइयों की कीमतों में 40-50% तक का इजाफा हुआ है। इस बढ़ी हुई महंगाई से आयुर्वेदिक दवाओं के व्यापारी परेशान हैं, क्योंकि लोग अब इन दवाइयों को खरीदने से कतराने लगे हैं।
शोध और रिसर्च कार्य पर संकट
सोने और चांदी के महंगे होने से रिसर्च कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। आयुर्वेदिक दवाओं के शोध में सोने और चांदी की भस्म का इस्तेमाल होता है।
जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में पीएचडी और एमडी छात्र इन भस्मों का इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब उनके लिए यह खर्च बहुत बढ़ चुका है। ऐसे में कई छात्रों को अपने शोध कार्य के लिए अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं।
डॉक्टरों और कंपनियों की बढ़ती चिंता
आयुर्वेद (आयुर्वेदिक दवाओं की कमी) में सोने और चांदी को 'नोबल मेटल' माना जाता है। इनका उपयोग दवाओं (डाबर च्यवनप्राश) में ज्यादा होता है और इनकी बढ़ी हुई कीमतों का असर दवाओं के निर्माण और उनके उपयोग पर भी पड़ा है।
आयुर्वेदिक डॉक्टरों का कहना है कि अब इन दवाओं को लिखने से पहले कई बार सोचना पड़ेगा, क्योंकि मरीज इनकी कीमतें नहीं उठा पाएंगे। इसके अलावा दवा कंपनियां भी अब इन महंगे इंग्रीडियंट्स का इस्तेमाल कम करने पर विचार कर सकती हैं।
Sootr Knowledge
आयुर्वेद क्या है
आयुर्वेद (Ayurvedic education)दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में से एक है, जिसका अर्थ है जीवन का विज्ञान (आयु + वेद)। यह केवल बीमारियों के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की एक कला है। आयुर्वेद के अनुसार, हमारा शरीर पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है और स्वास्थ्य का संतुलन तीन प्रमुख दोषों-वात, पित्त और कफ-पर टिका होता है।
इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को शुद्ध करना और रोगों को जड़ से मिटाना है। इसमें जड़ी-बूटियों, आहार, योग, और पंचकर्म जैसी शोधन प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहने की शिक्षा देता है।
FAQ
- आयुर्वेदिक दवाओं में सोने और चांदी का इस्तेमाल क्यों होता है?
सोने और चांदी का आयुर्वेद में इस्तेमाल इम्यूनिटी बढ़ाने और ब्रेन फंक्शन को सुधारने के लिए किया जाता है। - क्या आयुर्वेदिक दवाएं महंगी हो गई हैं?
हां, सोने और चांदी की बढ़ी हुई कीमतों के कारण आयुर्वेदिक दवाओं की कीमतें 10 से 40 फीसदी तक बढ़ गई हैं। - क्या महंगी दवाओं का असर रिसर्च पर पड़ा है?
हां, महंगी दवाओं के कारण आयुर्वेदिक रिसर्च प्रभावित हो रहा है, क्योंकि शोधकर्ताओं को अब सोने और चांदी की भस्म के लिए अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं।
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