साठ की उम्र में भी क्यों नहीं रुकती गिग वर्कर की दौड़?
58 साल की उम्र में अब्दुल अफसर की छाती में अचानक दर्द उठा। वो हैदराबाद में कैब चला रहे थे। दिल का दौरा था। लेकिन असली सवाल कुछ और है, अगर उनकी उम्र में आराम करना चाहिए था, तो वो सड़क पर क्यों थे?
देश में 55 से 60 साल के बीच के लोग अब कैब चलाने और डिलीवरी करने लगे हैं। यह कोई शौक नहीं, मजबूरी है। नौकरी छूटी, पेंशन नहीं मिली, बचत खत्म हो गई। अब यही लोग जवान लड़कों के साथ ऐप के टारगेट पूरे कर रहे हैं। सरकार ने पिछले साल गिग वर्करों के लिए सामाजिक सुरक्षा का ऐलान किया, लेकिन साठ के बाद फायदे रुक जाते हैं।
यह आपसे क्यों जुड़ा है
अगर आपके घर में भी कोई 55 पार का सदस्य है, जो अभी नौकरी की तलाश में है, तो यह खबर सीधे आपके परिवार से जुड़ी है। फैक्ट्री में छंटनी हो सकती है, अचानक बीमारी सारी बचत खा सकती है। ऐसे में सहारा बनता है ऐप बेस्ड काम, जहां न उम्र पूछी जाती है, न सर्टिफिकेट। लेकिन दूसरा पहलू भी है, वहां न पेंशन है, न बीमा।
पहले क्या था
दो घटनाओं ने इस बदलाव को तेज किया। पहला, नोटबंदी। दूसरा, कोविड लॉकडाउन। दोनों के बाद हजारों छोटी नौकरियां हमेशा के लिए गईं। जो लोग 50 पार कर चुके थे, उन्हें दोबारा नौकरी मिलना लगभग नामुमकिन हो गया। कंपनियां जवान स्टाफ को प्राथमिकता देती हैं, यह किसी से छुपा नहीं है।
क्या हुआ और क्यों
इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के राष्ट्रीय महासचिव शेख सलाउद्दीन बताते हैं कि 55 से 60 साल के बीच के वर्करों की संख्या गिग इकॉनमी में लगातार बढ़ रही है। उनके मुताबिक यह किसी स्वस्थ रोजगार व्यवस्था का संकेत नहीं है, बल्कि आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा की कमी का नतीजा है (टाइम्स ऑफ इंडिया रिपोर्ट)।
इसे ऐसे समझिए, गिग इकॉनमी एक दौड़ जैसी है जहां फिनिश लाइन सबके लिए एक जैसी है, लेकिन शुरुआत की लाइन अलग अलग जगह से है। पच्चीस साल का लड़का दौड़ता है क्योंकि रफ्तार में उसका फायदा है। अठावन साल का आदमी दौड़ता है क्योंकि रुकने का मतलब भूखे पेट सोना है।
मध्य प्रदेश में भी यही तस्वीर उभर रही है। भोपाल में रामनिवास वर्मा (काल्पनिक उदाहरण, असली नाम नहीं) जैसे मामले अब आम होते जा रहे हैं। एक निजी सुरक्षा एजेंसी में सुपरवाइजर रहे रामनिवास की नौकरी 55 की उम्र में चली गई। अब वो कैब चलाते हैं, रात ग्यारह बजे तक। महीने की कमाई मुश्किल से बीस हजार रुपए तक पहुंचती है।
और उम्र के इस मोड़ पर दोबारा शुरुआत करना, यह किसी के लिए आसान नहीं होता।
इंदौर में कमला बाई (नाम बदला हुआ, काल्पनिक उदाहरण) का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है। दर्जी का काम बंद होने के बाद उन्होंने घर बैठे ऐप पर हाउसकीपिंग और ब्यूटी सर्विस बुक करना शुरू किया। पैंतालीस की उम्र के बाद यह उनका इकलौता जरिया बन गया है।
गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन के राष्ट्रीय समन्वयक निर्मल गोराना कहते हैं कि नोटबंदी और कोविड महामारी ने बड़ी संख्या में उम्रदराज वर्करों को औपचारिक नौकरियों से बाहर कर दिया। उनके अनुसार 54-55 की उम्र में अचानक बेरोजगार हुए ये लोग अब जवान वर्करों के साथ इंसेंटिव और टारगेट की होड़ में शामिल हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया रिपोर्ट)।
कौन-कौन शामिल है
इस पूरी तस्वीर में कई किरदार हैं। बुजुर्ग वर्कर खुद, जो जीविका के लिए मैदान में हैं। ऐप कंपनियां, जिन्हें सस्ता और भरोसेमंद वर्कफोर्स चाहिए। श्रम मंत्रालय, जिसने नई सामाजिक सुरक्षा संहिता लागू कर दी है। और राज्य सरकारें, जिन्हें इस कानून के तहत नियम बनाने हैं, मध्य प्रदेश समेत हर राज्य को यह काम अभी बाकी है।
दोनों पक्षों की बात
एक तरफ गिग वर्क को नए मौके की तरह देखा जाता है। बिना डिग्री, बिना उम्र सीमा के कोई भी काम शुरू कर सकता है, ऐप कंपनियां यही तर्क देती हैं। दूसरी तरफ मजदूर संगठन कहते हैं कि यह मौका नहीं, मजबूरी का बाजार है, जहां न तय तनख्वाह है, न आराम का समय। सच्चाई इन दोनों नजरियों के बीच कहीं खड़ी है।
मध्य प्रदेश कनेक्शन
मध्य प्रदेश की तस्वीर भी राष्ट्रीय ट्रेंड से अलग नहीं है। भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में कैब और डिलीवरी सेवाएं तेजी से बढ़ी हैं, और इनमें उम्रदराज गिग वर्कर्स की मौजूदगी लगातार दिख रही है। हालांकि 55 पार वर्करों की सही संख्या बताने वाला कोई सरकारी आंकड़ा फिलहाल सार्वजनिक नहीं है (यह आंकड़ा अभी confirm नहीं हुआ है)।
राज्य के श्रम विभाग ने श्रम सेवा पोर्टल के जरिए भवन और निर्माण मजदूरों का पंजीयन अनिवार्य किया है, लेकिन गिग वर्करों के लिए अलग राज्य कल्याण बोर्ड अभी नहीं बना है। राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों ने गिग वर्करों के लिए अलग कानून बनाना शुरू कर दिया है, मध्य प्रदेश अभी इस मामले में पीछे है।
आगे क्या होगा
आने वाले महीनों में राज्यों को केंद्र की नई श्रम संहिता के तहत नियम बनाने हैं। इसमें स्वास्थ्य बीमा और पेंशन जैसी सुविधाएं शामिल होंगी। लेकिन बड़ा सवाल यही रहेगा, क्या साठ पार करने के बाद भी इन वर्करों को कोई सहारा मिलेगा? फिलहाल इसका जवाब साफ नहीं है।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि ई श्रम पोर्टल का कार्ड बनते ही सारी सुविधाएं अपने आप मिल जाती हैं। सच यह है कि यह कार्ड सिर्फ पहचान और डेटाबेस के लिए है। असली फायदा तभी मिलता है जब सरकार कोई खास योजना नोटिफाई करे और वर्कर उसमें अलग से रजिस्टर करे।
अब आप क्या करें
- अब आप क्या करें: परिवार में कोई गिग वर्कर है तो आज ही e-Shram पोर्टल पर उसका पंजीयन कराएं
- क्यों अभी: पंजीयन के बिना कोई भी नई सरकारी योजना का फायदा नहीं मिल पाएगा
- आगे देखें: मध्य प्रदेश के नए श्रम नियमों और गिग वर्कर कल्याण बोर्ड के ऐलान पर नजर रखें
यह खबर क्यों जरूरी है
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41 राज्य को बुढ़ापे और बेरोजगारी में सुरक्षा देने का निर्देश देता है। जब उम्रदराज नागरिक बिना सामाजिक सुरक्षा के गिग इकॉनमी में धकेले जाते हैं, तो यह संवैधानिक भावना पर सवाल खड़ा करता है।
डिजिटल श्रम बाजार में उम्र, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट कानून जरूरी है। यह सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक न्याय का भी मामला है, और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के लिए नीति बनाने का सही समय अभी है।
FAQ
- e-Shram पर रजिस्ट्रेशन क्यों जरूरी है?
e-Shram पंजीयन से वर्कर को पहचान पत्र और UAN नंबर मिलता है। यह नंबर आगे स्वास्थ्य बीमा और पेंशन योजनाओं से जुड़ने के लिए जरूरी होता है। बिना पंजीयन किसी भी नई सरकारी सुविधा का फायदा नहीं मिलता। - क्या 60 साल के बाद गिग वर्कर को सरकारी फायदे मिलते रहते हैं?
फिलहाल कई सामाजिक सुरक्षा प्रावधान 60 साल की उम्र के बाद सीमित हो जाते हैं। स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं इसी उम्र सीमा के बाद रुक सकती हैं। नई श्रम संहिता के तहत राज्यों को इस पर स्पष्ट नियम बनाने हैं। - क्या मध्य प्रदेश में गिग वर्करों के लिए अलग कल्याण बोर्ड है?
अभी मध्य प्रदेश में गिग वर्करों के लिए अलग राज्य कल्याण बोर्ड नहीं बना है। राज्य का श्रम सेवा पोर्टल फिलहाल निर्माण मजदूरों के पंजीयन तक सीमित है। राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों ने इस दिशा में पहले कदम उठा लिए हैं।
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