दिल्ली में प्रदर्शन से ठप न हो कामकाज, पत्रकारों और वकीलों को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी राहत!

Neel Tiwari | Oct 11, 2026, 19:56 IST
दिल्ली में लगातार विरोध-प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई की।
दिल्ली में जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई की जानकारी सामने आई है। इसमें पत्रकारों और वकीलों के अधिकारों का मुद्दा उठने की बात कही गई है। करीब 7 हजार लोगों की कथित हिरासत पर भी सवाल उठे है। सुनवाई में यातायात और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी परेशानियों पर चर्चा का दावा है।

रविवार को खुला सुप्रीम कोर्ट

दिल्ली में लगातार विरोध-प्रदर्शनों और उनसे पैदा हुई परेशानियों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई की है। जस्टिस जोयमाल्या बागची ( Justice Joymalya Bagchi) और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने पत्रकारों, वकीलों और आम नागरिकों के अधिकारों का मुद्दा उठा। सुनवाई में इस बात पर जोर दिया गया कि CJP और विपक्ष के विरोध-प्रदर्शनों के कारण लोगों के पेशेवर कामकाज और सामान्य आवाजाही पर अनुचित रोक नहीं लगनी चाहिए।



दिल्ली में जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई हुई है।

पत्रकारों-वकीलों के काम में बाधा पर सख्त रुख

सुनवाई के दौरान पत्रकारों और कानूनी पेशेवरों की गिरफ्तारी, हिरासत और उनके कामकाज में कथित बाधाओं को लेकर चिंता जताई गई। अदालत ने निर्देश दिया कि पत्रकारों, वकीलों और अन्य पेशेवरों को अपने कर्तव्यों का पालन करने से नहीं रोका जाए। साथ ही, किसी व्यक्ति को कानून में तय प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में नहीं लेने की बात कही गई।



7 हजार लोगों की हिरासत का मुद्दा उठा

वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका के जरिए कथित गैरकानूनी हिरासत का मुद्दा उठाया। उन्होंने करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने का मामला अदालत के सामने रखा। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गई हैं और बंद किए गए मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हिरासत में लिए गए अधिकांश लोगों को रिहा किया जा चुका है।



प्रदर्शन से अदालत पहुंचना मुश्किल

वकीलों के संगठन लॉयर्स वॉयस ने भी मामले में हस्तक्षेप याचिका दाखिल की। संगठन ने बताया कि लगातार प्रदर्शनों, सड़कों पर बैरिकेडिंग और मेट्रो सेवाओं के प्रभावित होने से वकीलों, याचिकाकर्ताओं और अदालत के कर्मचारियों को परेशानी हो रही है। इससे वकीलों के नियमित कामकाज और आजीविका पर असर पड़ने की बात भी उठाई गई। संगठन ने कहा कि विरोध करना मौलिक अधिकार है, लेकिन इसके कारण पूरी राजधानी का जनजीवन ठप नहीं होना चाहिए।



पुलिस-मेट्रो अधिकारियों को संतुलित कदम उठाने के निर्देश

सुनवाई के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन का मुद्दा प्रमुख रहा। अदालत के सामने यह बात रखी गई कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं। लेकिन उनके कारण जरूरी सेवाओं और आम लोगों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं लगनी चाहिए। दिल्ली पुलिस, मेट्रो और रेलवे अधिकारियों को भविष्य में ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए संतुलित रुख अपनाने के निर्देश दिए गए।



चार दिन में अनुपालन रिपोर्ट देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट परिसर के आसपास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लगाए गए निषेधाज्ञा संबंधी बोर्ड हटाने का निर्देश भी सुनवाई के दौरान दिया गया। इसका उद्देश्य अदालत आने वाले वकीलों और आम नागरिकों की आशंकाएं दूर करना बताया गया। पीठ ने संबंधित अधिकारियों को आदेशों का पालन सुनिश्चित करने और चार दिनों के भीतर विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को कहा।

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