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BHOPAL. बीजेपी लगातार कांग्रेस पर सनातन और गोरक्षा को लेकर आरोप लगाती आई है। कांग्रेस को इन दोनों मुद्दों पर घेरा जाता रहा है, लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि कभी बैल जोड़ी और गाय और बछड़ा भी कांग्रेस के चुनाव चिन्ह रह चुके हैं।
कमलनाथ ने कहा था- ये हमारी पहचान
कमलनाथ ने शनिवार (16 सितंबर) को प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीसीसी चीफ कमलनाथ ने कहा कि पहले कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह 'बैल जोड़ी' हुआ करता था, बाद में चुनाव आयोग के निर्देश पर इसे बदला गया। कांग्रेस पार्टी ने अपना चुनाव चिन्ह 'बैल जोड़ी' को बदलकर अपना नया चुनाव चिन्ह 'गाय और बछड़ा' चुना था। ये हमारी पहचान है।
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सबसे पहले बैल जोड़ी चुनाव चिन्ह
आजादी के बाद कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी था। इसमें नेता और कार्यकर्ता प्रचार में बैल लेकर जाते थे। बैल भीड़ में बिदक ना जाएं इसलिए किसानों की ड्यूटी लगाई जाती थी। 1952 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिह्न 'दो बैलों की जोड़ी' था। ये चुनाव तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस ने लड़ा था। 1969 में पार्टी में टूट गई और इंदिरा गांधी ने इंडियन नेशनल कांग्रेस (आर) बनाई और पार्टी का चुनाव चिन्ह 'गाय-बछड़ा' हो गया।
कांग्रेस को क्यों बदलना पड़ा चुनाव चिन्ह
पार्टी टूटने के साथ पार्टी के चिन्ह पर कब्जे को लेकर लड़ाई शुरू हुई। कांग्रेस (ओ) यानी कांग्रेस ओरिजनल और कांग्रेस (आर) दोनों बैलों की जोड़ी के चुनाव चिन्ह पर अपना दावा जता रहे थे। देखते ही देखते ये मामला भारतीय चुनाव आयोग के पास पहुंच गया। चुनाव आयोग ने बैलों की जोड़ी का कांग्रेस का सिंबल कांग्रेस (ओ) को दिया। इसके बाद इंदिरा ने अपनी कांग्रेस के लिए गाय-बछड़ा का चुनाव चिन्ह लिया। 1971 के चुनावों में इंदिरा की कांग्रेस (आर) गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह के साथ लोकसभा चुनाव लड़े और इसमें उन्होंने जीत हासिल की। 1971 से लेकर 1977 के चुनावों तक कांग्रेस ने इसी चुनाव चिन्ह से चुनाव लड़े। जनवरी 1978 में इंदिरा ने कांग्रेस को फिर तोड़ते हुए नई पार्टी बनाई। इंदिरा ने कांग्रेस को 1978 में जब तोड़ा, तो चुनाव आयोग ने इस सिंबल को फ्रीज कर दिया था।
तो बसपा की जगह कांग्रेस का होता हाथी
वहीं कांग्रेस के चुनाव चिन्ह हाथ का पंजा बनने में इंदिरा के जीवन की एक दिलचस्प कहानी जुड़ी है। बसपा का चुनाव चिन्ह हाथी कभी कांग्रेस के सामने चुनाव आयोग ने एक विकल्प के रूप में रखा गया था। टेलीफोन लाइन में गड़बड़ी के चलते ऐसा हो नहीं पाया था, वरना शायद गफलत में हाथी कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बन जाता। चुनाव आयोग ने जो चुनाव चिन्ह के विकल्प कांग्रेस को दिए वे आज उसकी बेहद करीबी पार्टियों बसपा और सपा के चुनाव चिन्ह हैं।
कैसे मिला कांग्रेस को हाथ का पंजा ?
अगर कोई पार्टी अपना चुनाव चिह्न बदलती है तो उसे इसका साफ कारण बताना होता है। चुनाव आयोग सिर्फ पार्टी में दो फाड़ होने पर ही चुनाव चिह्न बदलने की अनुमति देता है। साल 1980 में कांग्रेस नेताओं ने हाथी और हाथ का पंजा 2 चिह्न चुने थे। इंदिरा गांधी को लगा कि कांग्रेस के लिए 'हाथी' निशान शुभ नहीं होगा और उन्होंने हाथ के पंजे का चुनाव किया।
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इंदिरा गांधी को हाथ की जगह हाथी सुनाई दिया ?
इंदिरा गांधी, कांग्रेस का सबसे पुराना चिन्ह 'दो बैलों की जोड़ी' फिर से वापस चाहती थीं। हालांकि उसे चुनाव आयोग ने फ्रीज कर दिया था। नए चुनाव चिन्ह के लिए कांग्रेस (आई) के महासचिव बूटा सिंह ने चुनाव आयोग में अर्जी दी। उन्हें चुनाव निशान के तौर पर हाथी, साइकिल और हाथ के पंजे में से किसी एक को चुनने का विकल्प मिला। बूटा सिंह ने इंदिरा गांधी को फोन लगाया। इंदिरा गांधी से साथ उस वक्त पीवी नरसिम्हा राव भी मौजूद थे। फोन पर बूटा सिंह जब इंदिरा गांधी को तीसरे विकल्प 'हाथ' के बारे में बता रहे थे तो उन्हें हाथ की जगह 'हाथी' सुनाई दिया। इंदिरा इसके लिए लगातार इनकार करती रहीं और फिर उन्होंने फोन का रिसीवर नरसिम्हा राव को दे दिया। राव समझ गए कि बूटा सिंह क्या कहना चाहते हैं। इंदिरा ने तब हाथ के पंजे के चिह्न का फैसला किया। तब से लेकर अब तक हाथ का पंजा ही कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है।
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