हिमालय से लुप्त हो रहीं च्यवनप्राश की जड़ी-बूटियां, संकट में आयुर्वेद
Anjali Dwivedi | May 12, 2026, 16:51 IST
himalayan-herbs-extinction
हिमालय में जलवायु परिवर्तन और अधिक दोहन से च्यवनप्राश की मुख्य जड़ी-बूटियां खत्म हो रही हैं। अष्टवर्ग की आठ दुर्लभ औषधियों पर विलुप्ति का खतरा है। वन विभाग अब इनके संरक्षण के लिए नर्सरी तैयार कर रहा है।
शॉर्ट में समझें क्या है पूरा मामला
- च्यवनप्राश में डलने वाली आठ खास जड़ी-बूटियां अब कम मिल रही हैं।
- पहाड़ों पर जलवायु परिवर्तन के कारण इन पर बुरा असर पड़ा है।
- काकोली, जीवक और ऋषभक जैसी औषधियां अब लुप्त होने वाली हैं।
- उत्तराखंड के साथ हिमाचल और कश्मीर में भी इनकी कमी हुई है।
- वन विभाग अब हर्षिल में नर्सरी बनाकर इन्हें बचाने में जुटा है।
किन दुर्लभ जड़ी-बूटियों पर मंडरा रहा खतरा?
पहाड़ों पर मौसम तेजी से बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन ने इन पौधों के उगने की जगह बदल दी है। लोग अपनी जरूरत के लिए इनका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। बिना सोचे-समझे पौधों को उखाड़ने से इनकी संख्या घट गई है। 2500 से 4500 मीटर की ऊंचाई पर अब सन्नाटा है।
पूरे हिमालयी क्षेत्र में औषधियों की भारी कमी
इन जड़ी-बूटियों के सेहत से जुड़े फायदे
खतरे को देखते हुए वन विभाग अब जाग गया है। हर्षिल में इन पौधों को बचाने के लिए नर्सरी बनी है। वहां वैज्ञानिक तरीके से नए पौधे तैयार हो रहे हैं। इन पौधों को फिर से उनके असली घर में लगाया जाएगा। यह कोशिश आयुर्वेद को बचाने के लिए बहुत जरूरी है।
बाजार में मिलने वाले डाबर च्यवनप्राश की शुद्धता अब खतरे में है। इन बूटियों की कमी से दवाओं का असर कम हो सकता है। टॉनिक और इम्युनिटी बढ़ाने वाली दवाओं में इनका उपयोग होता है। अगर ये नहीं मिलीं, तो असली च्यवनप्राश बनाना असंभव होगा।
इनका बचना भविष्य के लिए क्यों जरूरी है?
FAQ
- च्यवनप्राश में इस्तेमाल होने वाली अष्टवर्ग की जड़ी-बूटियां क्या हैं?
अष्टवर्ग आठ दुर्लभ जड़ी-बूटियों का एक समूह है, जिसमें जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीर काकोली, रिद्धि और वृद्धि शामिल हैं। आयुर्वेद में इन्हें 'कायाकल्प' औषधि माना जाता है, जो बुढ़ापे को रोकने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाने में मदद करती हैं। - हिमालयी जड़ी-बूटियों के लुप्त होने के पीछे मुख्य वैज्ञानिक कारण क्या हैं?
इन जड़ी-बूटियों के विलुप्त होने के दो मुख्य कारण हैं: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और अनियंत्रित दोहन। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे इन पौधों के उगने के लिए जरूरी पारिस्थितिकी तंत्र बदल रहा है। साथ ही, व्यावसायिक लाभ के लिए इन पौधों को जड़ों समेत उखाड़ने की प्रक्रिया ने इनकी प्राकृतिक पुनरुत्पादन क्षमता को खत्म कर दिया है।
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