The sootr Explainer : आपने ये खबर पढ़ ली तो बन जाएंगे Electoral bonds के एक्सपर्ट!

लोकसभा चुनाव से ऐन पहले देश में इलेक्टोरल बॉन्ड पर बहस छिड़ी है। द सूत्र इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में आपके हर सवाल का जवाब लेकर आया है। आइए आपको इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में वह सबकुछ बताते हैं, जिससे आप औरों से आगे रहेंगे...

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Marut raj
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 Electoral bonds : देश में लोकसभा चुनाव से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड ( Electoral bonds ) पर घमासान मचा है।  लंबी बहस जारी है। मामला बेहद पेचीदा है। आम आदमी को पूरा मसला समझ ही नहीं आ रहा है कि आखिर हो क्या रहा है?

'द सूत्र' की इन्वेस्टिगेशन (Investigation) टीम पाठकों के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड की A,B,C,D आसान भाषा में लेकर आई है। आइए, इस रिपोर्ट में हम आपको इलेक्टोरल बॉन्ड के जन्म से लेकर अब तक की पूरी कहानी समझाते हैं।  

क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड?

आपको ये तो पता ही है कि चुनाव में राजनीतिक पार्टियां करोड़ों, अरबों रुपए खर्च करती हैं। अब ये पैसा आता कहां से है? तो पार्टियों को दो तरह से चंदा मिलता है। एक तो पार्टियां सीधे आम जन और अपने नेताओं से चंदा लेती हैं। इसे क्राउड फंडिंग भी कह सकते हैं। अमूमन इसमें चंदे की रकम कम होती है। जैसे आपने देखा होगा कि बीजेपी ने हाल ही में डोनेशन लिया था। कांग्रेस भी ऐसा कर चुकी है। दूसरी पार्टियां भी यह तरीका अपनाती हैं। अब आपके मन में सवाल होगा कि हजार, दो हजार रुपए से क्या होगा? तो राजनीतिक पार्टियों लाखों, करोड़ों वाला चंदा इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिलता है। दरअसल, इलेक्टोरल बॉन्ड पार्टियों को चंदा (डोनेशन) देने का एक सिस्टम है। यह एक तरह से वचन पत्र की तरह होता है। 

कब चलन में आया यह बॉन्ड? 

चुनावी या इलेक्टोरल बॉन्ड ( Electoral bonds )स्कीम सबसे पहले देश के सामने 2017 में आई थी। 2017 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे पेश करते हुए पूरा ब्यौरा दिया था। इसके बाद भारत सरकार ने जनवरी 2018 में इसे कानूनन लागू कर दिया। आपको बता दें कि इलेक्टोरल बॉन्ड एक तरह का प्रॉमिसरी नोट होता है। इसे बैंक नोट भी कहा जाता है। इस बॉन्ड को कोई भी भारतीय नागरिक या कंपनी खरीद सकती है।

इलेक्टोरल बॉन्ड मिलता कहां है?

फिलहाल तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रोक लगा दी है। इसके पहले चुनावी बॉन्ड स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चुनी हुई शाखाओं में मिल रहे थे। खरीदने वाला इस बॉन्ड को अपनी पसंद की पार्टी को डोनेट कर सकता है। चंदा देने के इच्छुक लोग 1 हजार रुपए से लेकर 1 करोड़ रुपए तक के बॉन्ड खरीद सकते हैं। इसके लिए उन्हें बैंक को अपनी KYC देनी होती थी। जिस भी राजनीतिक पार्टी को ये बॉन्ड डोनेट किए जाते हैं, उसे पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम 1 प्रतिशत वोट मिलना जरूरी होता है। 

पार्टियों को रुपए कैसे मिल जाते हैं?

दानदाता जब किसी पार्टी को बॉन्ड देता है तो उसके 15 दिन के भीतर संबंधित पार्टी को इसे चुनाव आयोग से वैरीफाई कराना होता है। इसके बाद बॉन्ड को बैंक अकाउंट से कैश करवा लिया जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाती है। इसे खरीदने वाले व्यक्ति को टैक्स में छूट भी मिलती है।  

इसे कब खरीदा जा सकता है?

इलेक्टोरल बॉन्ड ( Electoral bonds ) जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के महीने में जारी किए जाते हैं। यानी साल में चार बार 10 दिनों के लिए ये बॉन्ड खरीदने के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। इसे भारतीय नागरिक ही खरीद सकते हैं। साथ ही दूसरी खास बात यह है कि कोई व्यक्ति या संस्था कितनी भी राशि के बॉन्ड कितनी भी बार खरीद सकती है। 

इलेक्टोरल बॉन्ड पर विवाद क्या है?

इसे समझने के लिए आपको थोड़ा पीछे जाना होगा। दरअसल, 2017 में अरुण जेटली ने बॉन्ड स्कीम पेश करते वक्त यह दावा किया था कि इससे राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाली फंडिंग और चुनाव व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी। काले धन पर रोक लगेगी। वहीं, आलोचकों का कहना था कि इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान जाहिर नहीं की जाती है, ऐसे में ये देश में चुनावों में काले धन के इस्तेमाल का जरिया भी बन सकते हैं।

कब-कब कोर्ट पहुंचा मामला?

बॉन्ड स्कीम को 2017 में चुनौती दी गई, लेकिन अदालत में सुनवाई 2019 में शुरू हुई। 12 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया कि वे 30 मई 2019 तक चुनावी बॉन्ड से जुड़ी जानकारी बंद लिफाफे में चुनाव आयोग को सौंपे। हालांकि, तब कोर्ट ने इस स्कीम पर कोई रोक नहीं लगाई थी। बाद में दिसंबर 2019 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने इस योजना पर रोक लगाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसमें दावा किया गया कि बॉन्ड योजना पर चुनाव आयोग और रिजर्व बैंक की चिंताओं को केंद्र सरकार ने दरकिनार किया है। अब एक बार फिर इस बॉन्ड पर विवाद खड़ा हुआ है। 

अब ताजा विवाद क्या है?

देश में लोकसभा चुनाव से ऐन पहले सुप्रीम कोर्ट ने करीब 6 साल पुरानी इलेक्टोरल बॉन्ड योजना पर रोक लगा दी है। अदालत का तर्क है कि यह योजना असंवैधानिक है। इलेक्टोरल बॉन्ड की गोपनीयता बनाए रखना असंवैधानिक है। यह योजना सूचना के अधिकार का भी उल्लंघन है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से 13 मार्च तक अपनी ऑफिशियल वेबसाइट पर इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम की जानकारी सार्वजनिक करने को कहा, जो आयोग ने कर दी है। 

किस पार्टी को कितना चंदा मिला?

आईए, अब आपको बताते हैं कि किस पार्टी को कितना चंदा मिला है। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जारी रिपोर्ट की मानें तो भाजपा सबसे ज्यादा चंदा लेने वाली पार्टी है। आंकड़ों के अनुसार, 12 अप्रैल 2019 से 11 जनवरी 2024 तक बीजेपी को सबसे ज्यादा 6,060 करोड़ रुपए चंदे के रूप में मिले हैं। तृणमूल कांग्रेस दूसरे पायदान पर है। उसे 1,609 करोड़ का चंदा मिला है। वहीं, तीसरे नंबर पर कांग्रेस है, जिसने कुल 1,421 करोड़ का चंदा पाया है। यहां खास यह है कि किस कंपनी ने किस पार्टी को कितना चंदा दिया है, इसका सूची में जिक्र नहीं किया गया है।  

किसने किस पार्टी को चंदा दिया है?

अब ताजा विवाद में एक और बहस छिड़ गई है। याचिकाकर्ता ADR के वकील प्रशांत भूषण का तर्क है कि एसबीआई ने वह यूनिक कोड नहीं बताया है, जिससे यह साफ हो सके कि किस व्यक्ति अथवा संस्था ने किस पार्टी को चंदा दिया है। उधर, कांग्रेस के नेताओं ने भी बॉन्ड के डेटा पर निशाना साधा है। पार्टी का कहना है कि दानदाताओं और इसे लेने वालों के आंकड़ों में अंतर है। कहा जा रहा है कि दानदाताओं में 18,871 एंट्री है, जबकि लेने वालों में 20,421 की एंट्री है। इन सबके जवाब में चुनाव आयोग का कहना है कि उसे यह जानकारी एसबीआई ( SBI ) से ऐसी ही मिली है। 2019 से 2024 के बीच 1334 कंपनियों-लोगों ने कुल 16,518 करोड़ रुपए के बॉन्ड खरीदे हैं और 27 पार्टियों ने इन्हें भुनाया है।

आखिरी सवाल...सबसे बड़ा दानदाता कौन?

इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेस कंपनी ने सबसे बड़ा चंदा दिया है। रिपोर्ट कहती है कि कंपनी ने 21 अक्टूबर 2020 से जनवरी 24 के बीच 1,368 करोड़ रुपए का चंदा दिया है, जो पूरे देश में सबसे ज्यादा है। आपको बता दें कि यह कंपनी देश में लॉटरी टिकट बेचती है और इसे लॉटरी किंग मार्टिन सेंटियागो चलाते हैं। यह भी सवाल है कि सेंटियागो मा​र्टिन कौन हैं। यहां यह भी खास है कि सेंटियागो बड़े बेटे चार्ल्स ने वर्ष 2015 में बीजेपी का दामन थामा था। 

और कौन-कौन से बड़े नाम हैं?

मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रा ने 980 करोड़ रुपए का चंदा दिया है। इसमें ग्रुप की कंपनी प.यूपी पावर कॉरपोरेशन के 220 करोड़ रुपए अलग से हैं। ग्रुप पर तेलंगाना की कालेश्वरम लिफ्ट प्रोजेक्ट में 38 हजार करोड़ की अनियमितताओं का आरोप लगा है। वहीं, उद्यमी पवन अहलुवालिया की कंपनी केजेएस सीमेंट ने 14 करोड़ रुपए के बॉन्ड खरीदे हैं। देश के सबसे अमीर लोगों में शुमार उद्यमी मुकेश अंबानी के समधी अजय पीरामल की दो कंपनियों ने 62 करोड़ रुपए के बॉन्ड खरीदे हैं।

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