इंडिया में अब टकीला बूम की गूंज, बना दुनिया का नंबर 1 टकीला मार्केट, 2031 तक खपत होगी दोगुनी
CHAKRESH | Apr 29, 2026, 12:49 IST
india fastest growing tequila market 2025
भारत 2024-25 में दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता टकीला बाजार बन गया है। IWSR के अनुसार वॉल्यूम में 31% और वैल्यू में 40% का इजाफा हुआ है। वहीं 2031 तक खपत दोगुनी होने का अनुमान है। इसके मुख्य कारण कॉकटेल कल्चर और प्रीमियमाइजेशन हैं।
समझें क्या है पूरा मामला
2024-25 में वॉल्यूम में 31% और वैल्यू में 40% की बढ़त दर्ज हुई है। 2031 तक भारत में टकीला की खपत दोगुनी होने का अनुमान है। इस उछाल की बड़ी वजह शहरी युवाओं में बढ़ता कॉकटेल कल्चर और देसी एगेव ब्रांड है।
भारत में टकीला की उड़ान
वॉल्यूम में 31% और वैल्यू में 40% की बढ़त किसी भी बाजार विश्लेषक के लिए चौंकाने वाली संख्या है। यहां वॉल्यूम का मतलब है कि लोगों ने ज्यादा टकीला खरीदना शुरू कर दिया है। इसी तरह वैल्यू का अर्थ ज्यादा खर्च करने से है।
IWSR के सीनियर कंसल्टेंट जेसन होलवे का कहना है कि टकीला की खास बात इसकी अलग-अलग तरह से इस्तेमाल होने की क्षमता है। उन्होंने बताया कि टकीला कई मशहूर कॉकटेल का बेस बनता है, लेकिन इसे सीधा भी पिया जा सकता है, खासकर जब वह अल्ट्रा-प्रीमियम कैटेगरी का हो।
2031 तक होगी खपत दोगुनी
यह आंकड़े प्रीमियमाइजेशन यानी महंगे और उच्च गुणवत्ता वाले ब्रांडों की बढ़ती मांग की ओर इशारा करते हैं। शहरी भारत में उपभोक्ताओं की पसंद तेजी से बदल रही है।
कॉकटेल से आ रही है असली ग्रोथ
दिलचस्प बात यह है कि अब टकीला को सिर्फ मौज-मस्ती की चीज नहीं माना जाता है। युवा पीढ़ी इसे एक परिपक्व और समझ के साथ पीने वाला पेय मानने लगी है।
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देसी एगेव स्पिरिट्स की अपनी दुनिया
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डेक्कन प्लेटो से आ रहा नया ब्रांड
इस क्षेत्र में एक और बड़ी हलचल है। डी'यावोल स्पिरिट्स एक अनेजो टकीला लॉन्च करने की तैयारी कर रही है। इसकी कीमत 20 हजार से 30 हजार रुपए के बीच होगी। यह बताता है कि भारत का अल्ट्रा-प्रीमियम टकीला सेगमेंट भी मजबूत हो रहा है।
सिपिंग कल्चर भी आ रहा है आगे
यह बदलाव बताता है कि भारतीय उपभोक्ता न केवल अधिक टकीला पी रहे हैं, बल्कि अधिक समझदारी से पी रहे हैं। बाजार की यह परिपक्वता लंबे समय तक टिकी रहने वाली ग्रोथ की निशानी है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
दूसरी बात भारतीय कंपनियों का देसी एगेव स्पिरिट्स तैयार करना आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम है। इससे स्थानीय कृषि, विशेषकर दक्कन के पठार के एगेव किसानों को फायदा होगा।
तीसरी बात 2031 तक दोगुनी होने वाली खपत का मतलब है कि यह एक तेजी से उभरता व्यापार क्षेत्र है जो रोजगार और निवेश दोनों के लिए अवसर लाएगा।
FAQ
- टकीला और एगेव स्पिरिट्स में क्या फर्क है?
टकीला एगेव स्पिरिट्स की एक खास कैटेगरी है। टकीला केवल मेक्सिको के कुछ निर्धारित इलाकों में ब्लू एगेव पौधे से बनाई जाती है। जबकि एगेव स्पिरिट्स किसी भी एगेव पौधे से बनी शराब के तहत आती है, चाहे वह दुनिया में कहीं भी बनाई गई हो। भारत में जो देसी एगेव ड्रिंक बन रहे हैं वे दक्कन के पठार के एगेव से तैयार होते हैं और उन्हें टकीला नहीं कहा जा सकता। वे एक अलग और नई श्रेणी हैं। - भारत में टकीला की खपत इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?
इसके कई कारण हैं। शहरी भारत में कॉकटेल कल्चर तेजी से पनपा है और पिकांटेस व पालोमास जैसे कॉकटेल युवाओं को टकीला से जोड़ रहे हैं। प्रीमियमाइजेशन यानी बेहतर और महंगे पेय की मांग बढ़ी है। बढ़ती क्रय शक्ति और सोशल मीडिया पर पेय संस्कृति के प्रचार ने भी इसमें भूमिका निभाई है। इसके अलावा टकीला को सिर्फ पार्टी शॉट नहीं बल्कि एक परिपक्व पेय के रूप में देखा जाने लगा है।
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