Lancet Research : दुनिया की हर 10 में एक मातृ मृत्यु भारत में, एमपी, यूपी और बिहार में हालात चिंताजनक
Aman Vaishnav | Mar 30, 2026, 14:08 IST
india maternal deaths lancet report 2023 2026
लैंसेट की नई रिपोर्ट के अनुसार 2023 में भारत में 24 हजार 700 महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हुई। यह दुनिया की कुल मातृ मृत्यु का 10% है। यानी हर दस में से एक महिला भारत की रही…
लैंसेट ओब्स्टेट्रिक्स, गायनेकोलॉजी और वुमेन्स हेल्थ जर्नल में एक नई रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में भारत में लगभग 24 हजार 700 महिलाओं की मातृ मृत्यु हुई। इस आंकड़ों के साथ भारत उन देशों में शामिल है जहां प्रसव के दौरान सबसे ज्यादा महिलाओं की जान जाती है।
इस साल सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु नाइजीरिया, भारत, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, इथियोपिया और पाकिस्तान में हुई।
पाकिस्तान में 2023 में 10 हजार 300, इथियोपिया में 11 हजार 900 और नाइजीरिया में 32 हजार 900 मातृ मृत्यु दर्ज हुई थी। यह रिपोर्ट वाशिंगटन विश्वविद्यालय के IHME (Institute for Health Metrics and Evaluation) और दुनियाभर के शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार की है।
भारत की मातृ मृत्यु दर की यात्रा पर नजर डालें तो तस्वीर मिली-जुली है। 1990 में भारत में मातृ मृत्यु की संख्या करीब एक लाख 19 हजार थी। वहीं 2015 तक यह संख्या घटकर 36 हजार 900 हो गई। 2023 में यह और घटकर 24 हजार 700 रह गई।
इसके साथ ही मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) भी 1990 में 508 से घटकर 2023 में 116 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गया है।
2000 से 2015 के बीच मातृ मृत्यु दर हर साल करीब 3 प्रतिशत की दर से घटी है। देखा जाए तो 2015 के बाद यह रफ्तार काफी धीमी हो गई है। औसत गिरावट सिर्फ 0.5 प्रतिशत प्रति वर्ष रह गई है। यानी जो काम सबसे आसान था वह हो गया अब जो बचा है वह कहीं ज्यादा कठिन है।
सर गंगाराम हॉस्पिटल में IVF और मानव प्रजनन केंद्र की निदेशक डॉ. अभा मजूमदार ने इस रिपोर्ट पर कहा कि, 1990 के बाद बेहतर जागरूकता, अस्पतालों में प्रसव और सरकारी योजनाओं की वजह से मातृ मृत्यु दर में काफी कमी आई है।
यह बदलाव हर राज्य में समान नहीं है। केरल और तमिलनाडु वैश्विक लक्ष्य के करीब हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में अभी भी मातृ मृत्यु दर बहुत ज्यादा है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि मातृ मृत्यु के कारण अलग-अलग जगहों पर अलग होते हैं। दुनिया भर में सबसे बड़ी वजह अत्यधिक रक्तस्राव यानी हेमरेज और गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप है।
भारत में इसके अलावा संक्रमण और पहले से मौजूद बीमारियों की जटिलताएं भी एक बड़ा कारण हैं। समय पर इलाज न मिल पाना, सेवाओं की गुणवत्ता में कमी और इलाज तक असमान पहुंच भी मातृ मृत्यु के बड़े कारण हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इन मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है। बस इन बातों का ध्यान रखना होगा। प्रसव से पहले की देखभाल, सुरक्षित प्रसव सेवाएं, आपातकालीन प्रसूति देखभाल और प्रसव के बाद की निगरानी।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कोविड19 महामारी ने 2020 और 2021 में, टीकाकरण ज्यादा नहीं हुआ था। तब उन इलाकों में मातृ मृत्यु को अस्थायी रूप से बढ़ा दिया जहां कोविड से मृत्यु दर ज्यादा थी।
स्वास्थ्य सेवाओं में आई रुकावट और गर्भावस्था के दौरान संक्रमण का बढ़ा हुआ खतरा कई देशों में मातृ स्वास्थ्य पर बुरा असर डालने का कारण बना।
वैश्विक MMR 2023 में 190.5 प्रति एक लाख जीवित जन्म पर है, जो SDG (Sustainable Development Goals) के 70 से कम के लक्ष्य से अभी भी बहुत दूर है।
204 देशों और क्षेत्रों में से 104 अभी तक इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए हैं। 2030 तक यह लक्ष्य पाने के लिए दुनियाभर में नए सिरे से ठोस प्रयास और निवेश की जरूरत है।
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इस साल सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु नाइजीरिया, भारत, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, इथियोपिया और पाकिस्तान में हुई।
पाकिस्तान में 2023 में 10 हजार 300, इथियोपिया में 11 हजार 900 और नाइजीरिया में 32 हजार 900 मातृ मृत्यु दर्ज हुई थी। यह रिपोर्ट वाशिंगटन विश्वविद्यालय के IHME (Institute for Health Metrics and Evaluation) और दुनियाभर के शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार की है।
भारत में क्या बदला, क्या रहा?
इसके साथ ही मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) भी 1990 में 508 से घटकर 2023 में 116 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गया है।
2000 से 2015 के बीच मातृ मृत्यु दर हर साल करीब 3 प्रतिशत की दर से घटी है। देखा जाए तो 2015 के बाद यह रफ्तार काफी धीमी हो गई है। औसत गिरावट सिर्फ 0.5 प्रतिशत प्रति वर्ष रह गई है। यानी जो काम सबसे आसान था वह हो गया अब जो बचा है वह कहीं ज्यादा कठिन है।
डॉ. अभा मजूमदार का वर्जन
यह बदलाव हर राज्य में समान नहीं है। केरल और तमिलनाडु वैश्विक लक्ष्य के करीब हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में अभी भी मातृ मृत्यु दर बहुत ज्यादा है।
मौत की वजह रोकी जा सकती हैं
भारत में इसके अलावा संक्रमण और पहले से मौजूद बीमारियों की जटिलताएं भी एक बड़ा कारण हैं। समय पर इलाज न मिल पाना, सेवाओं की गुणवत्ता में कमी और इलाज तक असमान पहुंच भी मातृ मृत्यु के बड़े कारण हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इन मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है। बस इन बातों का ध्यान रखना होगा। प्रसव से पहले की देखभाल, सुरक्षित प्रसव सेवाएं, आपातकालीन प्रसूति देखभाल और प्रसव के बाद की निगरानी।
कोविड ने भी पहुंचाया नुकसान
स्वास्थ्य सेवाओं में आई रुकावट और गर्भावस्था के दौरान संक्रमण का बढ़ा हुआ खतरा कई देशों में मातृ स्वास्थ्य पर बुरा असर डालने का कारण बना।
खतरे में 2030 का लक्ष्य ?
204 देशों और क्षेत्रों में से 104 अभी तक इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए हैं। 2030 तक यह लक्ष्य पाने के लिए दुनियाभर में नए सिरे से ठोस प्रयास और निवेश की जरूरत है।
FAQ
- लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार 2023 में भारत में कितनी मातृ मृत्यु हुई?
लैंसेट की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2023 में भारत में 24 हजार 700 मातृ मृत्यु दर्ज हुई। यह दुनिया की कुल दो लाख 40 हजार मातृ मृत्यु का करीब 10 प्रतिशत है, यानी हर 10 में से एक मौत भारत में। भारत इस मामले में नाइजीरिया, इथियोपिया और पाकिस्तान के साथ सबसे ज्यादा बोझ वाले देशों में शामिल है। मातृ मृत्यु अनुपात MMR 116 प्रति एक लाख जीवित जन्म पर है। 1990 में यह 508 था, यानी लंबे समय में बड़ा सुधार हुआ है, लेकिन 2015 के बाद यह प्रगति धीमी पड़ गई है। - भारत में मातृ मृत्यु के मुख्य कारण क्या हैं और इन्हें कैसे रोका जा सकता है?
भारत में मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में अत्यधिक रक्तस्राव (हेमरेज), गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप, संक्रमण और पहले से मौजूद बीमारियों से जुड़ी जटिलताएं शामिल हैं। ये सभी कारण काफी हद तक रोके जा सकने वाले हैं। समय पर प्रसव पूर्व देखभाल, सुरक्षित संस्थागत प्रसव, आपातकालीन प्रसूति सेवाएं और प्रसव के बाद की निगरानी से इन मौतों को काफी कम किया जा सकता है। दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना सबसे जरूरी कदम है। - मातृ मृत्यु के मामले में भारत के किन राज्यों की स्थिति सबसे खराब और किनकी सबसे अच्छी है?
केरल और तमिलनाडु मातृ मृत्यु के मामले में वैश्विक लक्ष्य के करीब पहुंच चुके हैं और इन्हें देश के सबसे बेहतर राज्यों में गिना जाता है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में अभी भी MMR काफी ऊंचा है। विशेषज्ञों के अनुसार इन राज्यों में बेहतर जागरूकता, संस्थागत प्रसव की सुविधाएं और सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों को और मजबूत करने की जरूरत है।
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