विश्लेषण: बीजेपी के लिए बहुत कठिन है महाराष्ट्र की डगर, फूंक-फूंककर कदम रखने की जरूरत
Jitendra Shrivastava | Jul 23, 2024, 16:40 IST
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देश-दुनिया। महाराष्ट्र देश का इकलौता ऐसा राज्य है, जहां पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा राजनीतिक प्रयोग हुए हैं। यहीं बीजेपी, शिवसेना का गठबंधन टूटा। फिर अचानक सुबह 5 बजे शपथ ग्रहण समारोह हुआ। फिर 24 घंटे में सरकार गिर गई...
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संदीप सोनवलकर
वरिष्ठ पत्रकार
कई बार महाराष्ट्र ( Maharashtra ) के लोग कहते हैं कि महाराष्ट्र से राष्ट्र चलता है। इस बार के विधानसभा चुनाव सही मायनों में ऐसे ही साबित होंगे, क्योंकि ये लोकसभा में बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद होने वाले पहले चुनाव हैं। इन चुनावों में तय होगा कि 'किसके घर दिया जलेगा या कहां अंधियारा होगा।' बहरहाल यहां बीजेपी की साख दांव पर है, क्योंकि यही इकलौता राज्य है, जहां से बीजेपी का उदय 1980 में पहली बार हुआ और उसी समय से उसकी सहयोगी रही बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना को अब बीजेपी ने छोड़ दिया है।
सबसे ज्यादा राजनीतिक प्रयोग वाला राज्य
सीट बंटवारा सबसे बड़ी चुनौती
क्यों है सीटों की चुनौती?
अजित पवार बोझ या मददगार?
बीजेपी की आपसी खींचतान
एम फैक्टर का असर
ओबीसी ही सहारा
क्षेत्रीय और छत्रप की चुनौती...
- बात विदर्भ से करते हैं। विदर्भ की 11 लोकसभा सीटों में से बीजेपी को इस बार केवल एक सीट मिल पाई, वो भी इसलिए कि नागपुर से नितिन गड़करी चुनाव मैदान में थे और उनके सामने कांग्रेस का प्रत्याशी कमजोर था। विदर्भ में मुस्लिम और कुनबी बड़ी संख्या में हैं। कुनबी तो करीब 26 फीसदी है, जो नाना पटोले के कारण और बीजेपी की बेरुखी से कांग्रेस के साथ चला गए। उसके अलावा दूसरी बड़ी जाति हलबा कोष्टी भी चंद्रपुर में बीजेपी के खिलाफ गई। बीजेपी के साथ केवल चार फीसदी वाली कोमटी समाज की गई। बीजेपी को पिछले चुनाव में विदर्भ की 62 सीटें में से 29 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस के हाथ 15 सीट आई थी। इस बार ये मामला उलट सकता है।
- मराठवाड़ा की बात करें तो बीजेपी ने यहां अपनी जड़ें जमाने में कामयाबी हासिल की थी, लेकिन लोकसभा में मराठा आरक्षण के सवाल और देवेंद्र फणनवीस के ब्राह्मण विलेन बनने से बीजेपी का पत्ता साफ हो गया। यहां तक कि अशोक चव्हाण जैसे दिग्गज नेता के आने के बाद भी कांग्रेस कमजोर नहीं हुई। चव्हाण की नांदेड़ सीट पर भी कांग्रेस जीत गई। अब बीजेपी को यहां संभलना होगा। वैसे ये कांग्रेस और एनसीपी का गढ़ रहा है, पर विधानसभा चनाव में यहां की 46 सीटों में से बीजेपी को 16 और तब की शिवसेना को 12 सीट मिल गई थीं। कांग्रेस तब यहां 8 पर सिमट गई थी।
- पश्चिम महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण और मुस्लिम सबसे बड़े फैक्टर हैं। मराठा आरक्षण के कारण बीजेपी के खिलाफ विरोध दिख रहा है। ज्यादातर मराठा शरद पवार के साथ हैं। यहां तक कि अजित पवार की पत्नी भी इसलिए हार गईं और अब अजित की साख दांव पर है। अजित पवार हारे तो बीजेपी महायुति को उतनी सीटों का भी नुकसान होगा।
- उत्तर महाराष्ट्र में बीजेपी ने कांग्रेस के बड़े नेता विखे पाटिल को तोड़ा, लेकिन मराठा आरक्षण और किसानों की नाराजगी के चलते खुद पाटिल के बेटे लोकसभा का चुनाव हार गए। शिकायत है कि बीजेपी ने खुद बाहर से आए मराठा नेताओं को कमजोर किया। अब बीजेपी को प्याज के किसानों की नाराजगी और बारिश के कारण फसल के नुकसान का मुद्दा भी देखना होगा। यहां बीजेपी अब भी ओबीसी वोट साधकर खुद को बचाकर रख सकती है।
- मुंबई कोंकण में बीजेपी को चुनौती है कि ये शिवसेना और बाल ठाकरे का गढ़ है। आम मराठी मतदाता की सहानुभूति उद्धव ठाकरे के साथ है। यहां पर बीजेपी सबसे ज्यादा विधायक वाली पार्टी है, लेकिन अब लोकसभा में उसका एक उम्मीदवार जीत पाया और स्कोर 6 सीट में 4 और 2 का रहा। ऐसे में बीजेपी को मुंबई की 36 और ठाणे की 24 विधानसभा सीटों में ज्यादा से ज्यादा जीतनी होंगी, लेकिन यहां बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना की आपसी खींचतान को संभालना होगा।
पीएम नरेंद्र मोदी का कोई फैक्टर नहीं
आज की स्थिति में कौन कितना मजबूत...
- बीजेपी- 58 से 72 पर
- एकनाथ शिंदे शिवसेना- 22 से 30 पर
- अजित पवार एनसीपी- 12 से 17 पर
- कांग्रेस- 52 से 62 पर
- उद्धव ठाकरे- 48 से 55 पर
- शरद पवार एनसीपी- 22 से 32 पर
- निर्दलीय- कम से कम 18 पर
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