बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, मिलेगी इतने हफ्ते की मैटरनिटी लीव
News In Short
- गोद लिए गए बच्चे की मां को भी अब 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलेगी।
- गोद लेने वाली और सरोगेसी से मां बनने वाली महिलाओं को मातृत्व लाभ मिलेगा।
- कोर्ट ने उम्र की शर्त को अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन मानकर रद्द किया है।
- केंद्र सरकार से पिता के लिए भी छुट्टी का कानून बनाने की सिफारिश की गई है।
- मातृत्व लाभ की गणना बच्चे के कानूनी रूप से मिलने की तारीख से की जाएगी।
News In Detail
सुप्रीम कोर्ट ने ममता और मातृत्व के अधिकार (Maternity) को उम्र की बेड़ियों से आजाद करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। मंगलवार, 17 मार्च को कोर्ट ने सोशल सिक्योरिटी कोड-2020 की उस गलती को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व लाभ सिर्फ तब दिया जाता था, जब बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो।
जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने स्पष्ट किया कि बच्चे की देखभाल पर उम्र की पाबंदियां नहीं थोपी जा सकती हैं। अब गोद लेने वाली हर मां (बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो) 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव की हकदार होगी।
क्या था वो नियम जिसे कोर्ट ने नकारा?
पुरानी व्यवस्था के मुताबिक, मातृत्व लाभ केवल उन महिलाओं को मिलता था जो 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती थीं। यदि बच्चा इससे बड़ा होता है, तो मां को छुट्टी नहीं मिलती थी।
जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इस नियम को असंवैधानिक घोषित किया है। कोर्ट ने माना कि यह भेदभाव न केवल बेतुका है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
अब बच्चे की उम्र नहीं, जिम्मेदारी होगी आधार
अदालत ने कहा कि एक मां की जिम्मेदारियां बच्चे की उम्र देखकर कम या ज्यादा नहीं होती है। चाहे बच्चा 3 महीने का हो या उससे बड़ा हो। उसे नई मां के साथ तालमेल बिठाने और इमोशनल सिक्योरिटी के लिए समय चाहिए होता है।
अब नियम यह होगा कि जिस तारीख से महिला को कानूनी रूप से बच्चा मिलेगा, उसी दिन से उसे 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव का अधिकार होगा। यह नियम सरोगेसी के जरिए मां बनने वाली महिलाओं पर भी समान रूप से लागू होगा।
जज ने इस पर क्या कहा
जस्टिस पारदीवाला ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि उम्र की सीमा तय करना कानून के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देता है। अगर कानून व्यावहारिक लाभ नहीं दे पा रहा, तो वह सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामाजिक सुरक्षा संहिता का मकसद सुरक्षा देना है, न कि मां और बच्चे के बीच उम्र के आधार पर दीवार खड़ी करना।
पिताओं के हक में भी सुप्रीम कोर्ट की पहल
इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि वे ऐसा कानून बनाने पर विचार करें जिसमें पिता को भी सामाजिक सुरक्षा के रूप में छुट्टी मिले।
कोर्ट का मानना है कि बच्चे की परवरिश सिर्फ मां की जिम्मेदारी नहीं है, इसलिए छुट्टी का समय ऐसा होना चाहिए जो माता और पिता दोनों की जरूरतों को पूरा कर सके।
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