सार्वजनिक जगहों से हटेंगे आवारा कुत्ते, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया है।
- डॉग लवर्स की ओर से दायर सभी याचिकाओं को कोर्ट ने खारिज कर दिया गया है।
- अस्पताल, स्कूल और स्टेशनों जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों को कुत्ता मुक्त किया जाएगा।
- अदालत ने कहा कि लोगों को बिना डर के जीने का पूरा कानूनी अधिकार है।
- लापरवाही बरतने वाले नगर निगम के अधिकारियों पर अब अवमानना की कार्रवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर सुनाया बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों पर सख्त रुख अपनाया गया है। कोर्ट ने मंगलवार को अपना एक पुराना फैसला बदलने से पूरी तरह इनकार कर दिया। नवंबर 2025 में कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों से कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया था।
अदालत ने कहा कि वे जमीनी हकीकत से अपनी आंखें बिल्कुल नहीं मूंद सकते। आवारा कुत्तों का आतंक अब आम लोगों के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। इसलिए अब स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों जैसी जगहों पर कुत्ते दिखाई नहीं देने चाहिए।
डॉग लवर्स को लगा बड़ा झटका
इस मामले में पशु प्रेमियों यानी डॉग लवर्स ने कोर्ट में कई याचिकाएं लगाई थीं। वे पिछले आदेश में कुछ ढील देने की मांग कर रहे थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी एक भी दलील को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने एनिमल वेलफेयर बोर्ड के नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी निरस्त कर दी हैं। बेंच ने साफ कहा कि बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा दांव पर नहीं लगाई जा सकती है। सरकारों की यह पहली जिम्मेदारी है कि वे इंसानी जीवन की रक्षा करें।
डॉग बाइट के बढ़ते मामलों पर कोर्ट चिंतित
अदालत ने सुनवाई के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से आए डरावने आंकड़े रखे। रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक महीने में 1 हजार मामले आए हैं। वहीं तमिलनाडु में शुरुआती चार महीनों में करीब दो लाख लोगों को कुत्तों ने काटा।
इतना ही नहीं, दिल्ली के व्यस्त इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भी हमले हुए हैं। यहां तक कि एक विदेशी पर्यटक को भी आवारा कुत्ते ने अपना शिकार बनाया है। इन घटनाओं से प्रशासन के दावों की कलई पूरी तरह खुल गई है।
नसबंदी अभियानों की नाकामी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साल 2001 में एनिमल बर्थ कंट्रोल नियम बने थे। इसके बावजूद आज तक आवारा कुत्तों की आबादी पर काबू नहीं पाया जा सका। राज्यों ने इस दिशा में कभी कोई ठोस और गंभीर योजना नहीं बनाई है।
नसबंदी और टीकाकरण के अभियान बिना किसी सही रणनीति के चलाए जाते रहे। प्रशासन की इसी भारी लापरवाही के कारण आज यह समस्या इतनी विकराल हो चुकी है। अब इसे ठीक करने के लिए कड़े कदम उठाने ही पड़ेंगे।
जीने के अधिकार में शामिल है बिना डर के घूमना
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए एक बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि सम्मान से जीने के अधिकार में सुरक्षा भी शामिल है। देश का हर नागरिक बिना किसी डर के सड़कों पर घूमने का हकदार है।
राज्य सरकारें इस गंभीर मुद्दे पर चुपचाप मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकती हैं। समाज के कमजोर तबके को इस जानलेवा खतरे के भरोसे अकेले नहीं छोड़ा जा सकता। तंत्र को इस समस्या का स्थाई समाधान खोजना ही होगा।
बीमार कुत्तों को यूथेनेशिया देने पर विचार
सर्वोच्च अदालत ने समस्या से निपटने के लिए कई जरूरी दिशा-निर्देश भी दिए हैं। जिन इलाकों में कुत्तों का आतंक ज्यादा है, वहां विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। संबंधित कर्मचारियों को सही ट्रेनिंग और वैक्सीन उपलब्ध करानी होगी।
यदि कोई कुत्ता गंभीर रूप से बीमार है और समाज के लिए खतरा है तो क्या होगा? ऐसे मामलों में नियमों के अनुसार उसे सम्मानजनक मौत यानी यूथेनेशिया दी जा सकती है। इसके अलावा हाईवे से आवारा मवेशी हटाने के भी निर्देश दिए गए हैं।
हाईकोर्ट रखेंगे नजर
अब इस पूरे आदेश की निगरानी देश के सभी राज्यों के हाईकोर्ट करेंगे। सभी हाई कोर्ट इस मामले को रजिस्टर कर लगातार रिपोर्ट मांगेंगे। राज्यों के मुख्य सचिवों को 7 अगस्त तक अपनी अनुपालन रिपोर्ट सौंपनी होगी।
अगर कोई अधिकारी काम में लापरवाही बरतता है तो उस पर सख्त एक्शन होगा। कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने पर अवमानना का मुकदमा भी चलाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट अब 17 नवंबर को सभी रिपोर्ट की अंतिम समीक्षा करेगा।
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