महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट का फैसला- शिंदे सरकार बरकरार रहेगी, उद्धव ने स्वेच्छा से इस्तीफा दिया, हम इसे रद्द नहीं कर सकते

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Atul Tiwari
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महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट का फैसला- शिंदे सरकार बरकरार रहेगी, उद्धव ने स्वेच्छा से इस्तीफा दिया, हम इसे रद्द नहीं कर सकते

NEW DELHI. महाराष्ट्र में पिछले एक साल से चल रही सियासी उठापठक 11 मई को थम गई। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने रहेंगे। उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं किया, उन्होंने अपनी इच्छा से इस्तीफा दिया था। ऐसे में कोर्ट इस्तीफा को रद्द तो नहीं कर सकता। हम पुरानी सरकार को बहाल नहीं कर सकते।



शीर्ष कोर्ट ने राज्यपाल के फ्लोर टेस्ट को गलत भी ठहराया। कोर्ट ने कहा कि सदन के स्पीकर द्वारा शिंदे गुट की ओर से प्रस्तावित स्पीकर गोगावले को चीफ व्हिप नियुक्त करना अवैध फैसला था। कोर्ट ने कहा कि स्पीकर को सिर्फ राजनीतिक दल की ओर से नियुक्त व्हिप को ही मान्यता देनी चाहिए थी। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एमआर शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच ने फैसला सुनाया।



राज्यपाल पर कोर्ट ने क्या कहा




  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के पास विधानसभा में फ्लोर टेस्ट बुलाने के लिए कोई पुख्ता आधार नहीं था। फ्लोर टेस्ट को किसी पार्टी के आंतरिक विवाद को सुलझाने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते।


  • सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि राज्यपाल के पास ऐसा कोई संचार नहीं था जिससे यह संकेत मिले कि असंतुष्ट विधायक सरकार से समर्थन वापस लेना चाहते हैं। राज्यपाल ने शिवसेना के विधायकों के एक गुट के प्रस्ताव पर भरोसा करके यह निष्कर्ष निकाला कि उद्धव ठाकरे अधिकांश विधायकों का समर्थन खो चुके है।



  • महाराष्ट्र में ये हुआ था



    उद्धव गुट ने शिंदे की बगावत और उनकी सरकार के गठन को गैरकानूनी बताया था। इस राजनीतिक उठापटक के बाद सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गईं। शिंदे गुट के 16 विधायकों ने सदस्यता रद्द करने के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था तो वहीं उद्धव गुट ने डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर, राज्यपाल के एकनाथ शिंदे को सीएम बनने का न्योता देने और फ्लोर टेस्ट कराने के फैसले के खिलाफ याचिकाएं दाखिल कीं। वहीं, उद्धव गुट ने शिंदे गुट को विधानसभा और लोकसभा  में मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी थी।



    सुनवाई के आखिरी दिन सुप्रीम कोर्ट ये बोला था



    शीर्ष अदालत ने सुनवाई के अंतिम दिन आश्चर्य व्यक्त किया था कि वह उद्धव ठाकरे की सरकार को कैसे बहाल कर सकती है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ने सदन में बहुमत परीक्षण का सामना करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। ठाकरे गुट ने सुनवाई के दौरान कोर्ट से अपील की थी कि वह 2016 के अपने उसी फैसले की तरह उनकी सरकार बहाल कर दे, जैसे अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री नबाम तुकी की सरकार बहाल की थी।



    किस पक्ष से किसने लड़ा केस?



    ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और देवदत्त कामत के साथ वकील अमित आनंद तिवारी ने शीर्ष अदालत के समक्ष पक्ष रखा था। दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे गुट का की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल, हरीश साल्वे, महेश जेठमलानी और अधिवक्ता अभिकल्प प्रताप सिंह ने पैरवी की थी। वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता राज्य के राज्यपाल की ओर से पेश हुए। शीर्ष अदालत ने 17 फरवरी को महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से संबंधित याचिकाओं को सात-सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपने का आग्रह ठुकरा दिया था।



    6 पॉइंट्स में समझें, ये था मामला




    • 1. जून 2022 में शिवसेना में बगावत हो गई और एकनाथ शिंदे गुट के 'बागी विधायकों' ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर असंतोष जताया। 16 विधायक 'लापता' हो गए और विधायक दल की बैठक में शामिल नहीं हुए।


  • 2. पार्टी के मुख्य सचेतक, जिन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे द्वारा नामित किया गया था, उन्होंने तत्कालीन डिप्टी स्पीकर द्वारा 'बागी' विधायकों को नोटिस जारी करने के साथ अयोग्यता की कार्रवाई की। 

  • 3. उसी समय, 'बागी विधायकों' ने डिप्टी स्पीकर के खिलाफ 'अविश्वास का प्रस्ताव रखने के लिए एक पत्र भेजा, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि इस प्रस्ताव को प्रॉपर चैनल के माध्यम से नहीं भेजा गया। 

  • 4. अयोग्यता की कार्रवाई के खिलाफ बागी विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां कोर्ट की 3 जजों की पीठ ने नोटिसों का जवाब देने के लिए बागियों को और वक्त दे दिया। 

  • 5. इस बीच, 'शिंदे खेमे' के विधायकों ने महाराष्ट्र छोड़ दिया और अपनी जान-संपत्ति पर गंभीर खतरे का आरोप लगाते हुए राज्यपाल से संपर्क किया।

  • 6. राज्यपाल ने तत्कालीन सीएम उद्धव ठाकरे से विश्वास मत हासिल करने को कहा। उद्धव ने विश्वास मत से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया और राज्यपाल की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट चले गए।

     


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