VRS को रोकने की कोशिश गलत, ये अधिकारियों-कर्मचारियों का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने VRS (Voluntary Retirement Scheme) यानी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को लेकर मंगलवार, 07 अप्रैल को बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि VRS सिर्फ नौकरी छोड़ना नहीं है। यह एक कर्मचारी का अलग और स्वतंत्र अधिकार है। यह अधिकार तब मिलता है जब कर्मचारी तय सालों की सेवा पूरी कर लेता है।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने यह फैसला सुनाया है। यह मामला एक बैंक की अपील पर सामने आया था। बैंक ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 2019 के दो अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी थी।
नोटिस अवधि में चुप्पी मतलब मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी 20 साल की सेवा के बाद तीन महीने का नोटिस देता है, तो वह VRS का हकदार है। वहीं, नियोक्ता उस नोटिस अवधि के दौरान आवेदन को रद्द नहीं करता, तो सेवानिवृत्ति अपने आप लागू हो जाती है। नोटिस अवधि खत्म होने के बाद की गई कोई भी अस्वीकृति अमान्य मानी जाएगी। यह व्यवस्था कर्मचारियों को मनमाने तरीके से रोके जाने से बचाती है।
क्या है पूरा मामला
छत्तीसगढ़ के UCO बैंक ने हाईकोर्ट के एक आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने बैंक पूर्व मैनेजर एसके श्रीवास्तव को सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश दिया था। साथ ही, उनकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया था।
एसके श्रीवास्तव ने 1983 में UCO बैंक में क्लर्क-गोडाउन कीपर के रूप में काम शुरू किया था। 2007 में उन्हें मैनेजर के पद पर प्रमोट किया गया था।
जुलाई 2010 में बैंक ने उनके शाखा में संदिग्ध लेन-देन देखा। इसके बाद श्रीवास्तव ने 4 अक्टूबर 2010 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का नोटिस दे दिया था। बैंक ने 11 नवंबर 2010 को उन्हें शो-कॉज नोटिस जारी किया था।
बैंक ने 8 महीने बाद लगाए आरोप
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की नोटिस की तीन महीने की अवधि 4 जनवरी 2011 को समाप्त हो गई थी। इसके बाद भी श्रीवास्तव काम करते रहे और 16 मई 2011 के बाद काम पर नहीं आए। 29 जून 2011 को बैंक ने उन्हें बताया कि उनका स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति आवेदन स्वीकार नहीं किया गया था। इसके आठ महीने बाद, 5 मार्च 2012 को बैंक ने उन्हें आरोप पत्र जारी कर बर्खास्त कर दिया था।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मामले में कर्मचारी के पक्ष में फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा कि बैंक ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति रद्द नहीं की, इसलिए श्रीवास्तव को सेवानिवृत्त माना गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही माना है। पीठ ने कहा कि कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद के सभी परिणामी लाभों का हकदार है। बैंक को निर्देश दिया गया कि वह लागू ब्याज सहित सभी बकाया राशि तीन महीने के भीतर चुकाए। यह फैसला उन लाखों सरकारी और बैंकिंग कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है, जिन पर VRS आवेदन के बाद दबाव बनाया जाता है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह फैसला भारत के लाखों नौकरीपेशा लोगों के लिए बेहद अहम है। बैंकिंग और सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को अक्सर VRS आवेदन के बाद उत्पीड़न या जांच का सामना करना पड़ता है। यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की रक्षा करता है। यह श्रम कानून में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करता है। डिजिटल और सामाजिक नैतिकता के नजरिए से भी यह जरूरी है कि नियोक्ता अपने अधिकार का दुरुपयोग न करें। यह खबर उन सभी कर्मचारियों को जागरूक करती है जो अपने सेवानिवृत्ति के अधिकार को लेकर अनिश्चित हैं।
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FAQ
- VRS क्या होता है और इसके लिए क्या जरूरी है?
VRS यानी Voluntary Retirement Scheme एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कर्मचारी तय सालों की सेवा पूरी करने के बाद खुद नौकरी छोड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, 20 साल की सेवा पूरी होने के बाद 3 महीने का नोटिस देकर कोई भी कर्मचारी VRS ले सकता है। यह नौकरी छोड़ने से अलग है। यह एक स्वतंत्र कानूनी अधिकार है। - यदि नियोक्ता VRS नोटिस अवधि में जवाब न दे तो क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर नियोक्ता नोटिस अवधि के दौरान VRS आवेदन को रद्द नहीं करता, तो सेवानिवृत्ति अपने आप लागू हो जाती है। नोटिस अवधि समाप्त होने के बाद की गई कोई भी अस्वीकृति कानूनी रूप से अमान्य होगी। यानी नियोक्ता की चुप्पी को मंजूरी माना जाएगा।
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