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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- मध्य प्रदेश में IAS-IPS अधिकारी VRS लेने के मामले बढ़े हैं।
- राजनीतिक दबाव, ट्रांसफर और जांच से अफसरों पर मानसिक तनाव बढ़ा।
- रोमन सैनी ने इस्तीफा देकर सिस्टम से असंतोष जताया था।
- कांग्रेस का आरोप: अफसर स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पा रहे हैं।
- VRS का ट्रेंड प्रशासनिक तंत्र के लिए खतरनाक संकेत हो सकता है।
NEWS IN DETAIL
BHOPAL. मध्य प्रदेश कैडर में IAS और IPS अधिकारियों के सेवा छोड़ने या VRS मांगने के मामलों ने प्रशासनिक तंत्र के भीतर गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। IAS रोमन सैनी का इस्तीफा, वरिष्ठ IPS पुरुषोत्तम शर्मा का VRS आवेदन (जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं) और IPS अभिषेक तिवारी का VRS प्रकरण-ये तीनों उदाहरण संकेत देते हैं कि मामला केवल व्यक्तिगत फैसलों तक सीमित नहीं है।
सवाल बड़ा है- क्या बढ़ता राजनीतिक दबाव, ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल, जांच एजेंसियों का भय, सोशल मीडिया ट्रायल और पॉलिटिकल गठजोड़ अब अफसरशाही को काम करने से रोक रहा है? यह ट्रेंड बताता है कि आज प्रशासनिक सेवा केवल फाइलों और फैसलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सत्ता, जवाबदेही और सार्वजनिक दबाव के चौराहे पर खड़ी है।
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MP कैडर में IAS–IPS अधिकारियों के VRS और इस्तीफे चर्चा में
- IAS रोमन सैनी ने सेवा छोड़ी, बड़ा संकेत
- IPS पुरुषोत्तम शर्मा ने VRS मांगा था, अब सेवानिवृत्त
- IPS अभिषेक तिवारी का VRS मामला
पॉलिटिकल प्रेशर, ट्रांसफर और जांच से बढ़ा मानसिक तनाव, राजनीति या वैकल्पिक करियर भी एक उभरता विकल्प
IAS–IPS का मोहभंग: बढ़ता ट्रेंड?
मध्य प्रदेश कैडर में यह पहला मौका नहीं है जब अधिकारी सेवा से मोहभंग का संकेत दे रहे हों। प्रशासनिक हलकों में यह आम चर्चा है कि आज अफसर केवल नियम-कानून नहीं देखता, बल्कि राजनीतिक अपेक्षाओं, सत्ता संतुलन और सार्वजनिक छवि के दबाव में भी काम करता है। यही लगातार तनाव धीरे-धीरे निर्णय क्षमता और कार्य संतोष को कमजोर कर रहा है।
पॉलिटिकल प्रेशर और गठजोड़ का असर
वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, IAS–IPS की पोस्टिंग अब पूरी तरह प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। हर बड़े फैसले में राजनीतिक सहमति का दबाव रहता है। सत्ता के समीकरण बदलते ही ट्रांसफर की आशंका बनी रहती है। पॉलिटिकल गठजोड़ के चलते ‘पसंदीदा’ और ‘असहज’ पोस्टिंग का फर्क साफ दिखाई देता है। आदेश मानो तो नियम टूटते हैं, नियम मानो तो सत्ता नाराज़ होती है—इसी दोराहे ने अधिकारियों पर मानसिक दबाव कई गुना बढ़ा दिया है।
ट्रांसफर, जांच और सोशल मीडिया ट्रायल
आज एक शिकायत भी बड़ी जांच में बदल सकती है। विजिलेंस, ऑडिट और विभागीय जांच का डर बना रहता है। सोशल मीडिया पर अधूरी जानकारी के साथ तुरंत ट्रायल शुरू हो जाता है। फैसले लेने से पहले अफसर यही सोचता है-“बाद में क्या होगा?” नतीजा यह कि कई अधिकारी जोखिम लेने से बचने लगे हैं।
कांग्रेस का आरोप: दबाव में काम नहीं कर पा रहे अफसर
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि मध्य प्रदेश में IAS और IPS अधिकारियों पर इतना अधिक राजनीतिक दबाव बना दिया गया है कि वे स्वतंत्र होकर काम ही नहीं कर पा रहे। उनका आरोप है कि लगातार दखल, ट्रांसफर का भय और राजनीतिक अपेक्षाओं के चलते कई अधिकारी मानसिक रूप से टूट रहे हैं और मजबूरी में VRS लेकर सरकारी नौकरी से पलायन कर रहे हैं। विवेक त्रिपाठी के मुताबिक, यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
रोमन सैनी: जब IAS ने सिस्टम को कहा अलविदा
IAS रोमन सैनी ने जबलपुर में SDM रहते हुए इस्तीफा देकर प्रशासनिक जगत को चौंका दिया था। युवा, चर्चित और सक्षम अधिकारी का यह फैसला लंबे समय तक बहस का विषय बना रहा। इसे सिस्टम से असंतोष और भविष्य की नई दिशा के संकेत के रूप में देखा गया।
पुरुषोत्तम शर्मा:VRS से रिटायरमेंट तक
मध्य प्रदेश कैडर के वरिष्ठ IPS अधिकारी पुरुषोत्तम शर्मा ने अपने कार्यकाल के दौरान VRS के लिए आवेदन किया था। उस समय विभागीय प्रक्रियाएं चलने के कारण उनका आवेदन स्वीकार नहीं हुआ। हालांकि पुरुषोत्तम शर्मा अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं और उनका मामला वर्तमान घटनाक्रम से अलग संदर्भ में देखा जाना चाहिए। पुरुषोत्तम शर्मा से जुड़ा विवाद और कानूनी प्रक्रिया अपने समय में पूरी हो चुकी है। यह मामला अब इतिहास का हिस्सा है।
अभिषेक तिवारी:ट्रेंड की शुरुआती कड़ी
IPS अभिषेक तिवारी का VRS आवेदन इस समय चर्चा में है। अभिषेक तिवारी के बीआरएस लिए जाने की पहल करने के बाद प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई की आखिर अफसर वीआरएस क्यों ले रहे हैं।
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राजनीति या वैकल्पिक करियर की ओर रुख
कई अफसर मानते हैं कि सेवा में रहते हुए उनकी भूमिका सीमित होती जा रही है। इसी कारण कुछ अधिकारी राजनीति में सक्रिय भूमिका तलाशते हैं या रिटायरमेंट के बाद सार्वजनिक जीवन में उतरते हैं। यह संकेत है कि प्रशासनिक सेवा अब कई अफसरों के लिए अंतिम मंजिल नहीं रह गई।
IAS–IPS का मोहभंग केवल व्यक्तिगत फैसलों की कहानी नहीं है। इसके पीछे पॉलिटिकल प्रेशर, गठजोड़, बढ़ती जांच, ट्रांसफर अस्थिरता और सार्वजनिक अपेक्षाओं का भारी बोझ साफ दिखाई देता है। बड़ा सवाल यही है-क्या सिस्टम अपने अफसरों को मानसिक रूप से सुरक्षित और स्वतंत्र माहौल दे पाएगा, या यह ट्रेंड आने वाले समय में और गहराएगा?
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