ब्रिटेन की गलियों में डीजल से नहीं इंसानी पॉटी से दौड़ रही बसें, ये है टेक्नोलॉजी
समझें क्या है पूरा मामला
- ब्रिटेन के ब्रिस्टोल शहर में इंसान की पॉटी से बसें चलाई जा रही है।
- इस बस का नाम 'बायो-बस' रखा गया है जो बायोगैस से चलती है।
- यह गैस सीवेज और खाने के कचरे को सड़ाकर बनाई जाती है।
- बायो-बस से होने वाला वायु प्रदूषण डीजल बसों से बहुत कम है।
- यह तकनीक भविष्य में पेट्रोल और डीजल का बढ़िया विकल्प बन सकती है।
आज के समय में जहां पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं दुनिया के एक कोने से बहुत ही रोचक खबर सामने आई है। महंगाई की इस मार के बीच वैज्ञानिकों ने ईंधन का एक ऐसा अनोखा तरीका ढूंढ निकाला है, जिसके बारे में सुनकर आप हैरान रह जाएंगे।
ब्रिटेन के ब्रिस्टोल शहर में अब बसें पेट्रोल या डीजल से नहीं, बल्कि इंसानी मल यानी पॉटी से दौड़ रही हैं। ये इन्वेंशन न सिर्फ जेब का बोझ कम करेगा, बल्कि हमारे पर्यावरण को भी साफ रखने में मदद करेगा। आइए जानें इस वंडरफुल बायो-बस की रोचक किस्से…
क्या है इंसानी मल से बस चलने की तकनीक
ब्रिटेन की GENeco कंपनी ने एक ऐसी बसें तैयार की है जो बायो-मीथेन गैस पर चलती है। इस बस को खास तौर पर बायो-बस का नाम दिया गया है। आप सोच रहे होंगे कि पॉटी से बस कैसे चल सकती है? दरअसल, इसके पीछे एक वैज्ञानिक प्रक्रिया काम करती है।
शहर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में इंसानी मल और बचा हुआ खाना इकट्ठा किया जाता है। फिर इस कचरे को बड़े टैंकों में डालकर सड़ाया जाता है। इस प्रक्रिया से जो गैस निकलती है, उसे बायो-मीथेन कहते हैं।
इसी गैस को साफ करके बस के इंजन में ईंधन की तरह यूज किया जाता है। यह बस पूरी तरह से इको-फ्रेंडली यानी पर्यावरण के अनुकूल है।
कंपनी का कहना है कि यह डीजल बसों की तुलना में बहुत कम धुआं छोड़ती है। इससे शहरों की हवा साफ बनी रहेगी और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से भी निपटने में मदद मिलेगी।
बायो-बस चलाने के बड़े फायदे
इंसानी मल से चलने वाली यह बस प्रदूषण को काफी हद तक कम कर देती है। आंकड़ों के मुताबिक, इससे निकलने वाला नाइट्रोजन ऑक्साइड करीब 80 प्रतिशत कम होता है।
साथ ही, कार्बन इजेक्शन में भी 20 से 30 प्रतिशत की कमी आती है। यह बस एक बार गैस भरवाने के बाद करीब 300 किलोमीटर तक का सफर तय कर सकती है। सबसे अच्छी बात ये है कि इसके लिए हमें किसी बाहरी ईंधन पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
हमारे घर का कचरा ही इस बस के लिए पावर का काम करता है। इतना ही नहीं, GENeco कंपनी के पास मौजूद सीवेज प्लांट से इतनी गैस बन रही है, जिससे 83 सौ घरों में चूल्हे भी जलाए जा सकते हैं। यानी गंदा सीवेज अब हमारे शहरों के लिए एक बेशकीमती संसाधन बन चुका है।
क्या हैं इस राह में आने वाली सबसे बड़ी मुश्किलें
इतनी खूबियों के बाद भी बायो-बस को बड़े पैमाने पर चलाना थोड़ा मुश्किल है। इसका सबसे बड़ा कारण गैस भरने वाले स्टेशनों की कमी होना है।
फिलहाल बस को गैस के लिए शहर से दूर सीवेज प्लांट तक जाना पड़ता है। बार-बार लंबी दूरी तय करके प्लांट तक जाना काफी खर्चीला काम है। इसी वजह से अभी और ज्यादा बसें सड़क पर नहीं उतारी जा पा रही हैं।
जब तक शहरों में गैस भरने की सुविधा नहीं होगी, तब तक यह महंगा सौदा रहेगा। वैज्ञानिक अब ऐसी पाइपलाइन बिछाने पर काम कर रहे हैं, जिससे शहर में ही गैस मिल सके। अगर ऐसा मुमकिन हुआ, तो भविष्य में हम कचरे से चलने वाली और भी बसें देख सकेंगे। यह कदम वाकई भविष्य (पेट्रोल-डीजल की कीमत) की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था को बदलकर रख देगा।
FAQ
- बायो-बस किस ईंधन से चलती है और इसे कैसे बनाया जाता है?
बायो-बस 'बायो-मीथेन' नामक गैस से चलती है। इसे बनाने के लिए इंसानी मल (सीवेज) और खराब हो चुके खाने के कचरे का इस्तेमाल किया जाता है। एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में इस कचरे को 'एनएरोबिक डाइजेशन' प्रक्रिया के तहत सड़ाया जाता है, जिससे मीथेन गैस पैदा होती है। फिर इस गैस को फिल्टर करके इतना शुद्ध किया जाता है कि वह बस के इंजन को पावर दे सके। - क्या यह बस डीजल बस के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित और पर्यावरण के लिए अच्छी है?
जी हां, यह बस पर्यावरण के लिए काफी सुरक्षित है। डीजल बसों की तुलना में बायो-बस नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन 80% तक कम कर देती है। साथ ही, कार्बन डाइऑक्साइड में भी भारी कमी आती है। यह कचरे का सही उपयोग करती है और जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल) पर हमारी निर्भरता कम करती है। इसकी गंध को लेकर भी चिंता की जरूरत नहीं है क्योंकि गैस बनाने की प्रक्रिया में बदबू को पूरी तरह हटा दिया जाता है। - एक आम इंसान का वेस्ट कितनी दूरी तक बस चलाने में मदद कर सकता है?
एक रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग पांच लोगों का सालाना वेस्ट (मल) बस को इतनी गैस दे सकता है कि वह 30 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर सके। अगर पूरे शहर के कचरे को इकट्ठा किया जाए, तो यह बसें बिना रुके लंबे समय तक चल सकती हैं। हालांकि, मुख्य समस्या गैस स्टेशन की दूरी है, जिसे दूर करने के लिए तकनीक पर अभी काम चल रहा है।
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