28 सितंबर को क्यों मनाते हैं विश्व रेबीज दिवस, भारत में रेबीज से हर साल 20 हजार मौतें

Kaushiki | Sept 28, 2026, 08:00 IST
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28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। भारत में हर साल करीब 20 हजार लोग रेबीज से जान गंवाते हैं। जानें लक्षण, बचाव और कुत्ते के काटने पर क्या करना चाहिए।

World Rabies Day: हर साल 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। यह दिन रेबीज के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है। रेबीज कुत्ते के काटने से फैलने वाली एक जानलेवा बीमारी है। भारत में हर साल करीब 20 हजार लोग इस बीमारी से मरते हैं।



लक्षण दिखने के बाद यह बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा साबित होती है। रेबीज एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में हर घर को जानना जरूरी है। यह बीमारी अक्सर कुत्तों के काटने से फैलती है। समय पर इलाज मिले तो जान बचाई जा सकती है। लेकिन लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।



आज हम इसी विषय पर पूरी जानकारी देंगे। रेबीज एक वायरस से होने वाली बीमारी है। यह वायरस संक्रमित जानवर के काटने या खरोंच से फैलता है। ज्यादातर मामलों में कुत्ता ही इसका कारण बनता है।



एक बार लक्षण दिखने के बाद इस बीमारी का कोई इलाज नहीं बचता। इसीलिए बचाव और समय पर वैक्सीन लगवाना सबसे जरूरी माना जाता है। आइए जानें कि इस बीमारी से खुद को और अपने परिवार को कैसे सुरक्षित रखें।



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विश्व रेबीज दिवस क्यों मनाते हैं

28 सितंबर की तारीख खास वजह से चुनी गई है। यह तारीख लुई पाश्चर की पुण्यतिथि है, जिन्होंने पहली रेबीज वैक्सीन बनाई थी। इस दिन को साल 2007 में ग्लोबल एलायंस फॉर रेबीज कंट्रोल और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मिलकर शुरू किया था।



तब से हर साल यह दिन मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को रेबीज के प्रति जागरूक करना है। साथ ही इस बीमारी से बचाव के तरीके भी बताए जाते हैं। सरकार और स्वास्थ्य संगठन मिलकर जागरूकता कार्यक्रम चलाते हैं।



इस साल की थीम स्ट्रॉन्गर टुगेदर

इस साल विश्व रेबीज दिवस की थीम स्ट्रॉन्गर टुगेदर है। इसका सीधा मतलब है कि मिलकर काम करने से ही रेबीज खत्म हो सकता है। इसमें स्थानीय समुदाय, पशु चिकित्सक, सरकार और स्वास्थ्य कर्मी सभी की भूमिका अहम मानी गई है।



यह थीम बताती है कि अकेले कोई भी संगठन यह लड़ाई नहीं जीत सकता। सभी को मिलकर काम करना होगा। तभी रेबीज मुक्त भविष्य की कल्पना पूरी हो सकेगी।



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भारत में रेबीज का बड़ा खतरा

भारत में रेबीज की स्थिति काफी गंभीर है। दुनियाभर में हर साल करीब 59 हजार लोग रेबीज से मरते हैं और इनमें से एक तिहाई मौतें अकेले भारत में होती हैं। यानी भारत में हर साल करीब 20 हजार लोग जान गंवाते हैं।



भारत में हर साल करीब 20 लाख से भी ज्यादा यानी लगभग दो करोड़ कुत्ते के काटने के मामले सामने आते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लोग समय पर पूरा इलाज नहीं करा पाते। इससे जान जाने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।



बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा

रेबीज का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। करीब 40 प्रतिशत रेबीज के मामले 15 साल से कम उम्र के बच्चों में सामने आते हैं। इसकी वजह यह है कि बच्चे अक्सर कुत्ते के काटने की बात घर पर नहीं बताते।



कई बार छोटी खरोंच को भी बच्चे नजरअंदाज कर देते हैं। इससे समय पर इलाज नहीं हो पाता। माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को कुत्ते या बिल्ली के पास जाने पर सावधान रखें। किसी भी चोट या खरोंच को हल्के में न लें।



विश्व रेबीज दिवस 2025 - PAHO/WHO | पैन अमेरिकन स्वास्थ्य संगठन


लक्षण दिखने के बाद इलाज मुश्किल

रेबीज की सबसे डरावनी बात यह है कि लक्षण दिखने के बाद बचना लगभग नामुमकिन हो जाता है। शरीर में वायरस पहुंचने के बाद यह नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। इसके बाद मरीज को पानी और हवा से भी डर लगने लगता है।



यही वजह है कि डॉक्टर हमेशा कहते हैं कि लक्षण आने का इंतजार न करें। कुत्ते के काटते ही तुरंत अस्पताल जाना चाहिए। देरी करना जान के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।



कुत्ता काटे तो तुरंत क्या करें

कुत्ता या कोई भी जानवर काट ले तो सबसे पहले घाव को साबुन और पानी से धोएं। कम से कम 15 मिनट तक धोना जरूरी माना जाता है। इसके बाद तुरंत नजदीकी अस्पताल जाएं।



डॉक्टर की सलाह पर एंटी रेबीज वैक्सीन जरूर लगवाएं। कई बार रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन की भी जरूरत पड़ती है। वैक्सीन का पूरा कोर्स बीच में न छोड़ें। आधा-अधूरा इलाज जानलेवा साबित हो सकता है।



वैक्सीन में क्यों होती है दिक्कत

कई बार गरीब और ग्रामीण इलाकों में सही समय पर वैक्सीन नहीं मिल पाती। करीब 20 प्रतिशत मरीजों को वैक्सीन ही नहीं मिल पाती, जबकि लगभग आधे मरीज पूरा कोर्स भी नहीं ले पाते।



रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन महंगा और सरकारी अस्पतालों में अक्सर उपलब्ध नहीं होता। इससे गरीब तबके के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। यही वजह है कि रेबीज को गरीबी से जुड़ी बीमारी भी कहा जाता है।



2024 विश्व रेबीज दिवस - रेबीज की रोकथाम के बारे में जागरूकता बढ़ाना


पालतू जानवरों का टीकाकरण जरूरी

घर में कुत्ता या बिल्ली पाल रखी है तो उनका टीकाकरण जरूर कराएं। समय-समय पर पशु चिकित्सक से जांच कराते रहें। आवारा कुत्तों के टीकाकरण अभियान में भी सहयोग करें।



इससे समाज में रेबीज फैलने का खतरा काफी कम हो जाता है। नगर निगम और पशु पालन विभाग समय-समय पर मुफ्त टीकाकरण कैंप लगाते हैं। ऐसे कैंप में अपने पालतू जानवर जरूर ले जाएं। यह छोटा सा कदम बड़ी जान बचा सकता है।



2030 तक रेबीज मुक्त बनने का लक्ष्य

दुनियाभर के देशों ने साल 2030 तक कुत्तों से फैलने वाले रेबीज को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए वैक्सीनेशन बढ़ाने और जागरूकता फैलाने पर जोर दिया जा रहा है।



भारत में भी सरकार इस दिशा में कई कदम उठा रही है। लेकिन आम लोगों की सतर्कता के बिना यह लक्ष्य पूरा करना मुश्किल है। हर नागरिक को अपनी भूमिका समझनी होगी। ग्रामीण इलाकों में आवारा कुत्तों की संख्या ज्यादा है। इससे कुत्ते के काटने के मामले भी अधिक सामने आते हैं।



सरकारी अस्पतालों में एंटी रेबीज वैक्सीन ज्यादातर मुफ्त में उपलब्ध रहती है। फिर भी दूरदराज गांवों में समय पर अस्पताल पहुंचना बड़ी चुनौती बना रहता है। इसलिए स्थानीय प्रशासन को जागरूकता अभियान और तेज करने की जरूरत है। ग्रामीणों को भी वैक्सीन के महत्व की जानकारी देना जरूरी है। रेबीज का टीका | रेबीज के इंजेक्शन |



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