आज मनेगी गणगौर, अखंड सौभाग्य के लिए सुहागिनें ऐसे करें माता गौरी का पूजन
खुशियों और सौभाग्य का प्रतीक गणगौर का पावन पर्व आने वाला है। हिंदू कैलेंडर के मुताबिक, आज (21 मार्च) चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन ये उत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। इसे गौरी तृतीया के नाम से भी जाना जाता है।
यह त्योहार मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए बेहद खास है। सुहागिनें अपने पति की लंबी उम्र के लिए और कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए शिव-पार्वती (ईसर-गौर) की पूजा करती हैं। आइए जानें गणगौर पूजा का धार्मिक महत्व और पूजा विधि।
गणगौर तीज का धार्मिक महत्व
इस साल गणगौर का पावन पर्व आज (21 मार्च) मनाया जा रहा है। पंचांग के मुताबिक, यह चैत्र शुक्ल तृतीया को पड़ता है। गण का अर्थ भगवान शिव और गौर माता पार्वती हैं। इन दोनों की पूजा से वैवाहिक सुख बढ़ता है।
शास्त्रों में देवी पार्वती ने कठिन तप किया था। तप के बाद उन्हें शिवजी पति रूप में मिले। नारद पुराण में इस दिन का विशेष महत्व बताया है। स्कंद पुराण में भी गौरी तृतीया को शुभ माना गया है।
मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन ही उनकी यह मनोकामना पूरी हुई थी। सुहागिन महिलाएं इस दिन मिट्टी के ईसर-गौर बनाकर उनकी विधिवत पूजा करती हैं।
ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं। कुंवारी कन्याओं को मनचाहा और सुयोग्य वर प्राप्त होता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति और अखंड सौभाग्य का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
गणगौर तीज की पूजा विधि
गणगौर की पूजा विधि और श्रृंगार का महत्व बहुत ही निराला है। राजस्थान में यह उत्सव 18 दिनों तक चलता है। होली के अगले दिन से ही इसकी शुरुआत होती है।
- मिट्टी की मूर्तियां:
महिलाएं पवित्र मिट्टी से भगवान शिव (ईसर) और माता पार्वती (गौर) की सुंदर मूर्तियां बनाती हैं। - 18 दिनों का उत्सव:
राजस्थान में यह पर्व होली के अगले दिन से शुरू होकर कुल 18 दिनों तक चलता है। - सोलह श्रृंगार:
सुहागिन महिलाएं इस खास दिन पर पूर्ण सोलह श्रृंगार करती हैं, जो अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। - मेहंदी और महावर:
सुहाग की लंबी उम्र के लिए हाथों में मेहंदी और पैरों में लाल महावर लगाना अनिवार्य माना जाता है। - कुंवारी कन्याओं का उत्साह:
मनचाहा और सुयोग्य वर पाने के लिए कन्याएं भी सज-धजकर पूरे विधि-विधान से गौरी माता की सेवा करती हैं। - पारंपरिक विसर्जन:
पूजा के अंतिम दिन गीत गाते हुए मूर्तियों को नदी या तालाब में आदरपूर्वक विसर्जित किया जाता है।
शिव-पार्वती को प्रसन्न करने के उपाय
शिव-पार्वती की असीम कृपा पाने के लिए गणगौर का दिन बेहद फलदायी है। इस पावन दिन पूजा में भगवान शिव को शुद्ध जल और ताजा दूध अर्पित किया जाता है। महादेव को चंदन और बिल्वपत्र बहुत प्रिय हैं, इसलिए इनका भोग अवश्य लगाएं।
वहीं, माता गौरी को अखंड सौभाग्य की प्रतीक सुहाग सामग्री भेंट की जाती है। इसमें मुख्य रूप से कुमकुम, हल्दी और मेहंदी का विशेष महत्व होता है। पूजा के दौरान सुहागिन महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाते हुए ईसर-गौर की भव्य सवारी निकालती हैं।
अंत में, भक्ति भाव के साथ प्रतिमाओं को पवित्र जलाशयों में विसर्जित किया जाता है। यह व्रत न केवल पति की रक्षा और लंबी उम्र (दीर्घायु) सुनिश्चित करता है, बल्कि घर में सुख-शांति और समृद्धि का वास भी लाता है।
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