राधा-कृष्ण के प्रेम का प्रतीक फुलेरा दूज, फूलों की होली से जुड़ी है अनोखी कथा
होली का हुड़दंग और रंगों का खुमार अब बस कुछ ही दिन दूर रह गया है। फाल्गुन के फिजाओं में अब अबीर और गुलाल की महक आने लगी है। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि आखिर ये फुलेरा दूज का पर्व क्या है? ब्रज में फूलों की होली के साथ ही इस दिन से फाल्गुन का रंग चढ़ने लगता है।
ज्योतिष शास्त्र में इसे साल का सबसे बड़ा और पवित्र अबूझ मुहूर्त भी माना जाता है। बिना किसी ज्योतिषीय सलाह के इस दिन शादियां और शुभ काम किया जाता है। राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम और फूलों की महक इस दिन को बेहद खास बना देती है।
ये वही दिन है जब ब्रज में कान्हा ने राधा रानी संग फूलों की होली खेली थी। पंचांग के मुताबिक, इस बार फुलेरा दूज 19 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा। आइए जानें फुलेरा दूज का महत्व, शुभ मुहूर्त और परंपराएं।
फुलेरा दूज का शुभ मुहूर्त
विवाह के लिए क्यों है ये सर्वोत्तम दिन
मान्यता है कि इस दिन विवाह करने से दांपत्य जीवन सुखमय रहता है। भगवान श्री कृष्ण और राधा जी का विशेष आशीर्वाद नवविवाहित जोड़ों को मिलता है।
इस दिन की गई शादियां जन्म-जन्मांतर के मजबूत प्रेम संबंधों में बदल जाती हैं। अबूझ मुहूर्त होने से लोग बिना पंडित की सलाह के भी शादी कर सकते हैं। यही कारण है कि उत्तर भारत में इस दिन रिकॉर्ड शादियां होती हैं।
फुलेरा दूज की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के मुताबिक, एक बार श्री कृष्ण बहुत दिनों तक वृंदावन नहीं आए। राधा रानी और गोपियां उनके विरह में अत्यंत दुखी और व्याकुल रहने लगीं।
राधा जी की उदासी के कारण प्रकृति और मधुवन के फूल मुरझाने लगे थे। जब कृष्ण को यह ज्ञात हुआ, तो वे तुरंत राधा से मिलने पहुंचे। कृष्ण के आगमन से राधा खुश हुईं और चारों ओर हरियाली छा गई।
कृष्ण ने एक फूल तोड़कर राधा जी के ऊपर प्रेम से फेंक दिया। इसके बाद वहां मौजूद गोपियों ने भी एक-दूसरे पर फूल बरसाने शुरू किए। तभी से इस तिथि को फूलों की होली या फुलेरा दूज कहा गया।
फुलेरा दूज की परंपराएं
फुलेरा दूज के दिन भगवान कृष्ण को विशेष व्यंजन चढ़ाए जाते हैं। इस दिन श्री कृष्ण को पोहा और मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। यह भोग बाद में भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
इसी दिन से होली की तैयारी भी विधिवत रूप से शुरु हो जाती है। महिलाएं गोबर से छोटी-छोटी गुलरियां बनाना आज से ही शुरू कर देती हैं। इन गुलरियों की मालाएं बनाकर होलिका दहन के दिन अग्नि में समर्पित की जाती हैं।
ब्रज मंडल में उत्सव का माहौल
मथुरा और वृंदावन के मंदिरों में इस दिन की रौनक देखते ही बनती है। मंदिरों को रंग-बिरंगे फूलों और आकर्षक रोशनी से भव्य रूप से सजाया जाता है।
भगवान की मूर्ति की कमर पर रंगीन कपड़ा बांधा जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि कान्हा होली खेलने को तैयार हैं। भक्त एक-दूसरे पर गुलाल और फूल डालकर खुशियां साझा करते हैं।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
ये खबर भी पढ़ें...
चंद्र ग्रहण के कारण इस बार बदलेगी रंगों वाली होली की तारीख, जानें सूतक काल का सही समय
होली 2026 पर भद्रा और ग्रहण का साया, भूलकर भी न करें ये बड़ी गलतियां
3 या 4 मार्च, कब मनेगी होली 2026? राधा-कृष्ण की कृपा पाने के लिए करें ये उपाय
2026 में कब है महाशिवरात्रि, 300 साल बाद बन रहा ग्रहों का अद्भुत संयोग, जानें शुभ मुहूर्त