भीष्म पितामह ने 58 दिनों तक मृत्यु को क्यों रोके रखा था, जानें असली सच
Latest Religious News: भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति का पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का प्रतीक नहीं माना जाता है। यह पर्व आध्यात्मिक चेतना और जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति का एक बड़ा मार्ग है।
पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक मकर संक्रांति का संबंध महाभारत काल के भीष्म पितामह से है। जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब उत्तरायण होता है।
धार्मिक मान्यताओं में उत्तरायण का समय देवताओं का दिन और मोक्ष का द्वार कहलाता है। 2026 में मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को है। इसी पावन समय की प्रतीक्षा महान योद्धा भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या पर की थी।
पितामह की प्रतिज्ञा
महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की सेना के प्रधान सेनापति के रूप में लड़े थे। अर्जुन के बाणों से छलनी होकर जब वे गिरे, तो उन्होंने तुरंत प्राण नहीं त्यागे। उनके पिता शांतनु ने उन्हें अपनी इच्छा से मृत्यु चुनने का एक दुर्लभ वरदान दिया था।
पितामह जानते थे कि दक्षिणायन में मृत्यु होने पर जीव को पुनर्जन्म लेना पड़ता है। इसलिए उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने तक अपने प्राणों को शरीर के भीतर रोक कर रखा। यह उनकी योग शक्ति और दृढ़ संकल्प का एक बहुत ही बड़ा प्रमाण माना जाता है।
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पितामह ने मकर संक्रांति का दिन ही क्यों चुना
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, भीष्म ने देह त्याग के लिए मकर संक्रांति यानी उत्तरायण का दिन चुना था। मान्यता के मुताबिक, ऐसा इसलिए क्योंकि इस समय स्वर्ग के द्वार खुले माने जाते हैं।
शास्त्रों के मुताबिक जो व्यक्ति सूर्य के उत्तरायण रहने के दौरान प्राण त्यागता है, उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। दक्षिणायन के समय को अंधकार का प्रतीक माना जाता है।
दक्षिणायन में मृत्यु होने पर जीव को वापस लौटकर संसार में आना पड़ता है। पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए उन्होंने अपनी शक्ति से प्राणों को रोककर रखा। वे चाहते थे कि उनकी विदाई पवित्र प्रकाश के मार्ग से हो जो केवल इसी दिन संभव थी।
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बाणों की शय्या पर 58 दिनों का कठिन इंतजार
पितामह कुरुक्षेत्र के मैदान में बाणों की शय्या पर लगभग 58 दिनों तक लेटे रहे। उन्होंने भीषण कष्ट सहते हुए भी सूर्य देव के मकर राशि में आने की राह देखी। जैसे ही माघ मास में सूर्य उत्तरायण हुए, उन्होंने अपनी अंतिम सांसें ईश्वर को सौंप दीं।
इसी कारण हिंदू धर्म में मकर संक्रांति को मोक्ष पर्व के रूप में पूजा जाता है। भगवान कृष्ण ने भी गीता में उत्तरायण के प्रकाशमय मार्ग की बड़ी महिमा बताई है।
भीष्म पितामह के अंतिम शब्द
जब सूर्य उत्तरायण हुए और पितामह ने देह त्यागने का निर्णय लिया। भगवान कृष्ण और पांडवों की उपस्थिति में उन्होंने कहा कि,
- भगवान कृष्ण की स्तुति (भीष्म स्तुति): पितामह के अंतिम शब्द भगवान श्री कृष्ण को समर्पित थे। उन्होंने कहा, "हे गोविंद! मैंने आपके दर्शन मात्र से परम शांति पा ली है। अब मैं अपनी आत्मा को आपमें विलीन करता हूं।" उन्होंने भगवान की दिव्य स्तुति की, जिसे आज भी बहुत पवित्र माना जाता है।
- सत्य की विजय का संदेश: उन्होंने पांडवों से कहा, "जहां धर्म है, वहीं लक्ष्मी है और जहां श्री है, वहीं विजय है।" उन्होंने युधिष्ठिर को याद दिलाया कि हमेशा सत्य के मार्ग पर चलना ही राजा का धर्म है।
- पछतावा और सीख: उन्होंने द्रौपदी के चीर-हरण के समय चुप रहने पर ग्लानि व्यक्त की। उन्होंने कहा, "इंसान को कभी भी अधर्म के सामने मौन नहीं रहना चाहिए, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।"
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मकर संक्रांति का महत्व
इस दिन (Makar Sankranti)श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान करके सूर्य देव की विशेष आराधना करते हैं। मकर संक्रांति के दिन दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति और पापों का नाश होता है। पितामह की याद में लोग तर्पण करके पितरों की शांति की कामना भी करते हैं।
तिल और गुड़ का सेवन शरीर को शुद्धि और मन को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। पूरे भारत में यह पर्व अलग-अलग नामों से खुशहाली और नई फसल के साथ मनाते हैं। यह त्योहार हमें धैर्य रखने और सही समय की प्रतीक्षा करने की शिक्षा देता है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। Importance of Makar Sankranti
FAQ
- भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन ही प्राण क्यों त्यागे थे?
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, उत्तरायण में मृत्यु होने पर व्यक्ति को जन्म-मरण से मुक्ति मिलती है। भीष्म पितामह मोक्ष चाहते थे, इसलिए उन्होंने सूर्य के मकर राशि में आने का इंतजार किया। - उत्तरायण और दक्षिणायन में आध्यात्मिक रूप से क्या बड़ा अंतर होता है?
उत्तरायण को देवताओं का दिन और प्रकाश का समय माना जाता है जिसमें स्वर्ग खुलता है। इसके विपरीत दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि और अंधकार का समय माना जाता है। - मकर संक्रांति के दिन भीष्म पितामह की कथा सुनने का क्या लाभ है?
इस पावन कथा को सुनने से मनुष्य के भीतर धैर्य और धर्म के प्रति निष्ठा बढ़ती है। यह हमें जीवन के अंतिम समय में भी विचलित न होने की प्रेरणा देती है।
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