मंदिर में भगवान की परिक्रमा क्यों करते हैं, जानें इसके पीछे का धार्मिक रहस्य
Kaushiki | Sept 22, 2026, 16:23 IST
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हिंदू धर्म में मंदिर दर्शन के बाद भगवान की परिक्रमा या प्रदक्षिणा करने की पुरानी परंपरा है। शास्त्रों के अनुसार, परिक्रमा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट होते हैं। जानिए किस देवता की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए और इसका सही धार्मिक तरीका क्या है।
जब भी हम किसी मंदिर में जाते हैं, तो भगवान के दर्शन करते हैं। दर्शन के बाद हम गर्भगृह या मूर्ति के चारों तरफ घूमकर चक्कर लगाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हम ऐसा क्यों करते हैं? कई लोग इसे केवल एक सामान्य रस्म मानकर पूरा कर देते हैं।
लेकिन हमारे ऋषि-मुनियों ने इसके पीछे बहुत गहरे नियम बनाए हैं। शास्त्रों में इसे केवल चक्कर लगाना नहीं, बल्कि प्रदक्षिणा कहा गया है। यह हमारी भक्ति और श्रद्धा प्रकट करने का एक सुंदर माध्यम है।
मंदिर के गर्भगृह में हमेशा एक खास तरह की पॉजिटिव एनर्जी होती है। सही नियम से परिक्रमा करने से मन को शांति मिलती है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा आती है। आइए जानते हैं प्रदक्षिणा का असली मतलब और किस देवी-देवता की कितनी बार परिक्रमा करनी चाहिए।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, ईश्वर इस पूरे संसार के मुख्य केंद्र बिंदु हैं। जिस तरह सूर्य के चारों ओर सभी ग्रह घूमते हैं, ठीक वैसे ही हम भगवान को अपना केंद्र मानते हैं। उनके चक्कर लगाकर हम ये स्वीकार करते हैं कि हमारी जिंदगी उन्हीं के आसपास घूमती है।
जब हम शांत मन से भगवान का ध्यान करते हुए चलते हैं, तो मन को एक अनोखी शांति मिलती है। मंदिर का माहौल हमेशा सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है। वहां परिक्रमा करने से हमारे अंदर की नकारात्मकता दूर होने लगती है।
प्रदक्षिणा शब्द दो मुख्य शब्दों से मिलकर बना हुआ है। इसमें 'प्र' का मतलब मुख्य और 'दक्षिणा' का मतलब दाहिनी दिशा होता है। इसका सीधा नियम ये है कि परिक्रमा हमेशा दाईं ओर से ही शुरू करनी चाहिए।
जब आप चलते हैं, तो भगवान हमेशा आपके दाईं ओर होने चाहिए। ऋग्वेद के मुताबिक, हमारी दाईं तरफ हमेशा सकारात्मक ऊर्जा अधिक एक्टिव रहती है। इसलिए दाईं ओर से चलना बहुत शुभ माना जाता है। इससे आपका आभामंडल शुद्ध होता है और मन में अच्छे विचार आते हैं।
शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि हर देवी-देवता की परिक्रमा की संख्या अलग होती है। सभी देवताओं के चक्कर एक समान नहीं लगाए जाते हैं।
अगर आप गलत संख्या में चक्कर लगाते हैं, तो पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए किस देवता की कितनी बार परिक्रमा करनी है, यह जानना बेहद जरूरी है। नारद पुराण और अन्य ग्रंथों में इसके स्पष्ट नियम दिए गए हैं।
देवी चंडी यानी मां दुर्गा की केवल एक परिक्रमा करने का विधान है। सूर्य देव की सात परिक्रमा करने से जीवन में तेज और आरोग्य मिलता है। भगवान गणेश जी की तीन परिक्रमा करना बहुत शुभ और फलदायी माना जाता है। भगवान विष्णु और उनके अवतारों की चार बार परिक्रमा करनी चाहिए।
भगवान शिव की हमेशा आधी परिक्रमा करने का ही धार्मिक नियम बनाया गया है। शिवलिंग की जलहरी या सोमसूत्र को कभी भी लांघा नहीं जाना चाहिए। जलहरी तक पहुंचकर आपको वापस घूमकर अपनी जगह पर आना होता है। इसे ही भगवान शिव की आधी परिक्रमा कहा और माना जाता है।
स्कंद पुराण में परिक्रमा के महत्व को बहुत विस्तार से समझाया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंदिर में पूरी निष्ठा के साथ की गई प्रदक्षिणा का हर एक कदम अश्वमेध यज्ञ करने जितना पुण्य फल प्रदान करता है।
जब हम सच्चे और शुद्ध मन से भगवान का ध्यान करते हुए परिक्रमा करते हैं, तो हमारे जाने-अनजाने में हुए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही इंसान के पुराने बुरे कर्मों का नकारात्मक असर भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है, जिससे जीवन में आत्मिक शांति और खुशहाली आती है।
परिक्रमा केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर से "मैं" की भावना यानी अहंकार को पूरी तरह खत्म कर देती है। यह इंसान को स्वभाव से विनम्र, सहिष्णु और शांत बनाती है, जिससे भगवान के प्रति सच्ची भक्ति और समर्पण का भाव मन में जागृत होता है।
परिक्रमा करते समय आपका मन पूरी तरह शांत और एकाग्र होना चाहिए। मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर चक्कर लगाते समय कभी भी जल्दबाजी या भागदौड़ बिल्कुल न करें।
चलते समय अपने दोनों हाथों को जोड़कर रखें और मन ही मन भगवान के मंत्रों या नाम का जाप करते रहें। परिक्रमा के दौरान किसी दूसरे व्यक्ति से बेफिजूल की बातें करने या इधर-उधर देखने से बचें क्योंकि इससे आपका ध्यान भटकता है।
ईश्वर में पूरा ध्यान लगाकर बहुत ही सहज और धीरे-धीरे कदम बढ़ाना ही परिक्रमा का सबसे सही तरीका माना गया है। ऐसा करने से आप मंदिर के पवित्र वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा को गहराई से महसूस कर पाते हैं।
शांत मन से की गई परिक्रमा ही ईश्वर से आपका सच्चा जुड़ाव बनाती है और आपको मानसिक सुकून देती है। मंदिर के वातावरण से मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा को महसूस करने की कोशिश करें।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। नित्य पूजा पाठ
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लेकिन हमारे ऋषि-मुनियों ने इसके पीछे बहुत गहरे नियम बनाए हैं। शास्त्रों में इसे केवल चक्कर लगाना नहीं, बल्कि प्रदक्षिणा कहा गया है। यह हमारी भक्ति और श्रद्धा प्रकट करने का एक सुंदर माध्यम है।
मंदिर के गर्भगृह में हमेशा एक खास तरह की पॉजिटिव एनर्जी होती है। सही नियम से परिक्रमा करने से मन को शांति मिलती है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा आती है। आइए जानते हैं प्रदक्षिणा का असली मतलब और किस देवी-देवता की कितनी बार परिक्रमा करनी चाहिए।
परिक्रमा की पौराणिक मान्यता
जब हम शांत मन से भगवान का ध्यान करते हुए चलते हैं, तो मन को एक अनोखी शांति मिलती है। मंदिर का माहौल हमेशा सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है। वहां परिक्रमा करने से हमारे अंदर की नकारात्मकता दूर होने लगती है।
प्रदक्षिणा शब्द का मतलब
जब आप चलते हैं, तो भगवान हमेशा आपके दाईं ओर होने चाहिए। ऋग्वेद के मुताबिक, हमारी दाईं तरफ हमेशा सकारात्मक ऊर्जा अधिक एक्टिव रहती है। इसलिए दाईं ओर से चलना बहुत शुभ माना जाता है। इससे आपका आभामंडल शुद्ध होता है और मन में अच्छे विचार आते हैं।
शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि हर देवी-देवता की परिक्रमा की संख्या अलग होती है। सभी देवताओं के चक्कर एक समान नहीं लगाए जाते हैं।
अगर आप गलत संख्या में चक्कर लगाते हैं, तो पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए किस देवता की कितनी बार परिक्रमा करनी है, यह जानना बेहद जरूरी है। नारद पुराण और अन्य ग्रंथों में इसके स्पष्ट नियम दिए गए हैं।
किस देवता की कितनी परिक्रमा करें
भगवान शिव की हमेशा आधी परिक्रमा करने का ही धार्मिक नियम बनाया गया है। शिवलिंग की जलहरी या सोमसूत्र को कभी भी लांघा नहीं जाना चाहिए। जलहरी तक पहुंचकर आपको वापस घूमकर अपनी जगह पर आना होता है। इसे ही भगवान शिव की आधी परिक्रमा कहा और माना जाता है।
परिक्रमा करने का क्या है धार्मिक महत्व
जब हम सच्चे और शुद्ध मन से भगवान का ध्यान करते हुए परिक्रमा करते हैं, तो हमारे जाने-अनजाने में हुए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही इंसान के पुराने बुरे कर्मों का नकारात्मक असर भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है, जिससे जीवन में आत्मिक शांति और खुशहाली आती है।
परिक्रमा केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर से "मैं" की भावना यानी अहंकार को पूरी तरह खत्म कर देती है। यह इंसान को स्वभाव से विनम्र, सहिष्णु और शांत बनाती है, जिससे भगवान के प्रति सच्ची भक्ति और समर्पण का भाव मन में जागृत होता है।
परिक्रमा करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
चलते समय अपने दोनों हाथों को जोड़कर रखें और मन ही मन भगवान के मंत्रों या नाम का जाप करते रहें। परिक्रमा के दौरान किसी दूसरे व्यक्ति से बेफिजूल की बातें करने या इधर-उधर देखने से बचें क्योंकि इससे आपका ध्यान भटकता है।
ईश्वर में पूरा ध्यान लगाकर बहुत ही सहज और धीरे-धीरे कदम बढ़ाना ही परिक्रमा का सबसे सही तरीका माना गया है। ऐसा करने से आप मंदिर के पवित्र वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा को गहराई से महसूस कर पाते हैं।
शांत मन से की गई परिक्रमा ही ईश्वर से आपका सच्चा जुड़ाव बनाती है और आपको मानसिक सुकून देती है। मंदिर के वातावरण से मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा को महसूस करने की कोशिश करें।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। नित्य पूजा पाठ
ये खबरें भी पढ़ें...
क्यों भगवान शिव जैसा लाइफ पार्टनर चाहती हैं आज की लड़कियां
भगवान शिव को क्यों लेना पड़ा अर्धनारीश्वर अवतार, बेहद अनोखी है यह कथा
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