शनिश्चरी अमावस्या पर शनि मंदिर में जूते-चप्पल छोड़ने की परंपरा, जानें क्या है मान्यता

Kaushiki | Mar 29, 2025, 12:30 IST
शनि नवग्रह मंदिर
आज शनिश्चरी अमावस्या के दिन उज्जैन के त्रिवेणी घाट पर जूते-चप्पल और कपड़े छोड़कर शनि देव की पूजा करते हैं। इस दिन के साथ विशेष दान और पूजन से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है।

शनिश्चरी अमावस्या: आज शनिश्चरी अमावस्या है। ऐसे में उज्जैन के त्रिवेणी घाट पर स्थित नवग्रह शनि मंदिर में शनिश्चरी अमावस्या के दिन एक खास परंपरा है, जो कई वर्षों से चली आ रही है। इस दिन भक्तों का तांता लगता है और वे शनि देव की पूजा अर्चना के साथ-साथ कुछ खास काम भी करते हैं। इस परंपरा के मुताबिक, श्रद्धालु स्नान करने के बाद जूते-चप्पल और कपड़े छोड़ जाते हैं, जिन्हें पनौती के रूप में छोड़ा जाता है।



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घाट पर भक्तों का तांता

जिला प्रशासन शक्त

श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए, जिला प्रशासन ने शनि मंदिर, त्रिवेणी घाट और शिप्रा तट पर स्नान और सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। नर्मदापुरम में सुबह 5 बजे से ब्रह्म मुहूर्त में स्नान का सिलसिला शुरू हो गया था। शहर के सेठानी घाट, विवेकानंद घाट, गोंदरी घाट, पोस्ट ऑफिस घाट, पर्यटन घाट, कोरी घाट और बांद्राभान घाट पर हजारों श्रद्धालु मौजूद हैं, जहां वे पूजन, पाठ और दान कर रहे हैं। मान्यताओं के मुताबिक, इसे भूतड़ी अमावस्या भी कहा जाता है, जिसके चलते तंत्र साधक भी घाटों पर पूजन करने आए हैं।



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जूते-चप्पल क्यों छोड़े जाते हैं

मान्यताओं के मुताबिक, शनि अमावस्या पर भक्त शिप्रा नदी के त्रिवेणी संगम में स्नान करते हैं, जो पुण्य और मोक्ष देने वाली मान्यता रखता है। विशेष रूप से, इस दिन जूते, चप्पल और कपड़े छोड़ने की परंपरा का संबंध शनि देव की साढ़े साती और ढैय्या से है। मान्यता है कि जूते, चप्पल और कपड़े छोड़ने से व्यक्ति को शनि की साढ़े साती और ढैय्या का असर कम होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।



पुजारी बताते हैं कि पनौती को छोड़कर जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। भक्त इन वस्त्रों और जूतों को छोड़ कर शनि देव की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन में बदलाव की उम्मीद रखते हैं।



शनि अमावस्या पर विशेष दान

ज्योतिषशास्त्र के मुताबिक, शनिश्चरी अमावस्या पर लोहा, तिल, नमक, काला कपड़ा और तेल का दान करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, भक्तों को गण गौरी पूजा का महत्व भी बताया गया है, जो विशेष रूप से 1 अप्रैल 2025 को सुबह 9:28 बजे के बाद की जाएगी। यह समय शनि देव की कृपा पाने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उत्तम माना जाता है।



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शनि अमावस्या पर श्रद्धालुओं की भीड़

शनि अमावस्या के दिन श्रद्धालु पहले से ही शिप्रा नदी के किनारे भजन-कीर्तन करते हुए पहुंच जाते हैं। इस दिन की महत्वता को देखते हुए प्रशासन ने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को संभालने के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। लाखों श्रद्धालु शनि देव की पूजा, स्नान और दान करने के बाद सुख-समृद्धि और शांति की कामना करते हैं।



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