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सिंहस्थ महापर्व का रहस्य
सिंहस्थ कुंभ मेला एक अत्यंत पावन और महान पर्व है जो हर बारह वर्ष में एक बार मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, इसकी तिथि का निर्धारण देवगुरु बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा की विशेष राशिगत स्थितियों से किया जाता है।
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ज्योतिषीय गणना का आधार
इस महापर्व का निर्धारण मुख्य रूप से देवगुरु बृहस्पति के राशि परिवर्तन पर निर्भर करता है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, बृहस्पति को एक राशिचक्र पूरा करने में लगभग बारह वर्ष लगते हैं।
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उज्जैन के सिंहस्थ का योग
सिंहस्थ नाम बृहस्पति के सिंह राशि में प्रवेश करने के कारण पड़ता है। उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ तब लगता है जब बृहस्पति सिंह राशि में और सूर्य मेष राशि में होते हैं।
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नासिक के कुंभ का निर्धारण
ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, नासिक (त्र्यंबकेश्वर) में भी कुंभ पर्व तब आयोजित होता है जब देवगुरु बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करते हैं। गोदावरी नदी के तट पर होने वाले इस कुंभ का बहुत बड़ा धार्मिक महत्त्व है।
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सूर्य और चंद्र की भूमिका
ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, कुंभ पर्व के स्नान की शुभ तिथियां सूर्य, चंद्र और बृहस्पति के गोचर पर निर्भर करती हैं। शाही स्नान के दिन इन तीनों ग्रहों की स्थिति विशेष रूप से पवित्र योग बनाती है।
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ग्रहों की शक्ति और अमृत योग
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, अमृत कलश से बूंदें चार स्थानों पर छलकी थीं। इन चारों स्थानों पर अमृत योग तभी बनता है जब ग्रह विशेष शुभ स्थिति में आते हैं।
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सिंहस्थ 2028 की तैयारी
अगला सिंहस्थ कुंभ मेला 2028 मध्य प्रदेश के उज्जैन में वर्ष 2028 में आयोजित होगा। इस महापर्व के लिए प्रशासन और सरकार ने अभी से भव्य तैयारियां शुरू कर दी हैं।
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धार्मिक मान्यता और फल
ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, उज्जैन सिंहस्थ पर्व के दौरान शिप्रा नदी में स्नान करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इस शुभ योग में किया गया स्नान व्यक्ति को मोक्ष और पुण्य प्रदान करता है।
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