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पर्यावरण के प्रति प्रेम और समर्पण की मिसाल है मध्यप्रदेश के अमृत पाटीदार। अमृत ने पर्यावरण की बचाने की मुहीम में पूरे धार जिले में सार्वजनिक जगहों पर 6 लाख पौधे लगाए। 1984 में उन्होंने पौधों की नर्सरी का काम शुरू किया और आज उन्हें 'पर्यावरण के अमृत' के तौर पर जाना जाता है। अमृत कहते हैं कि स्कूल के दिनों में जब भी भूख लगती तो मैं और मेरे दोस्त किसी पेड़ के नीचे या बागीचे में बैठकर अपना लंच किया करते थे। तब मैं हमेशा सोचता था कि ये पेड़ न होते तो हमे कड़ी धूप में बैठना पड़ता। यही कारण है कि बचपन से पेड़-पौधों के प्रति उनका विशेष लगाव बन गया। वह हमेशा सोचते कि कैसे ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाए जाएं।
गटर का पानी फिल्टर किया
अमृत जब पौधे लगाते तो पहले कई लोग उन्हें उखाड़ कर फेंक देते थे। जिसके कारण कई लोगों से उनका झगड़ा भी हुआ। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और पर्यावरण की सेवा में खुद को झोंक दिया। पौधों में पानी देने के लिए उनके पास पानी की भी कमी थी। जिसके लिए उन्होंने अपने गांव के गटर के पानी को फिल्टर करके उपयोग करना शुरू किया। उन्होंने गटर के पानी को फिल्टर करने के लिए तीन अलग-अलग गढ्ढे बनाए, जिनमें पानी फिल्टर होता और बाद में वह उसका इस्तेमाल पौधों में पानी देने के लिए करते।
बदली इलाके की तस्वीर
अमृत की इस मुहीम से इलाके के कई गांवों की तस्वीर बदली है। उनके गांव के किसान बताते हैं कि हमारे गांव में पहले लोगों में पौधों और पौधरोपण के प्रति इतनी जागरूकता नहीं थी। लेकिन अमृत ने जिस तरह से गांव भर में अलग-अलग जगह पौधे लगाए। इससे गांव का नजारा ही बदल गया। हमारे गांव की हर सड़क आज हरी-भरी बन गई। साथ ही मेरे जैसे गांव के कई और लोग पौधे लगाने और उसकी देखभाल करने के प्रति ज्यादा जिम्मेदार बन गए हैं।
कई सम्मान मिले
अमृत को 2014 में राज्य सरकार की ओर से फिलीपींस और ताइवान में जैविक खेती और पर्यावरण संरक्षण की ट्रेनिंग के लिए भेजा गया था। इसके साथ ही उन्हें 2017 में दिल्ली में आयोजित विश्व स्वच्छ पर्यावरण शिखर सम्मेलन में राष्ट्रिय पर्यावरण जाग्रति पुरस्कार से सम्मनित किया गया था। वहीं 2017 में ही मुंबई में वर्ल्ड एग्रीकल्चर एक्सीलेंस अवॉर्ड समारोह में भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा अमृत को जून 2017 में उनके काम के लिए कोलकाता यूनिवर्सिटी की ओर से डॉक्टरेट की मानक उपाधि से भी नवाजा जा चुका है।
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