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ये कहानी है अपनी जमीन पर पुश्तैनी खेती करने वाले महाराष्ट्र के तुकाराम की। तुकाराम अपनी 12 एकड़ जमीन पर खेती करते थे। और पूरी साल मेहनत के बाद भी निराशा ही हाथ लगती थी। तुकाराम कहते हैं कि पारंपरिक खेती से हमारी कमाई और जीवन शैली में कोई प्रगति नहीं हो रही थी। इससे जुड़ी समस्याओं के बारे में बात करते हुए वह बताते हैं- हमारी कमाई का तकरीबन 70 प्रतिशत हिस्सा मजदूरों को मजदूरी देने में खर्च हो जाया करता था। हमारी कमाई कम और खर्च बहुत ज्यादा था। आज तुकाराम उसी जमीन से सालाना 35 लाख रूपए का मुनाफा कमा रहे हैं। तुकाराम ने खेती में कई नए प्रयोग किए जिसके कारण उनका खेती में खर्च भी कम हुआ है।
बाजार की जरूरत के हिसाब से खेती
तुकाराम बताते हैं कि मैं मई के महीने में अपने खेत जोतता हूं। खेत को तैयार करने के लिए मैं छह ट्रैक्टर गाय के गोबर और पोल्ट्री कचरे का इस्तेमाल करता हूं। जमीन तैयार हो जाने के बाद जून के पहले हफ्ते से लगभग 8,000 गेंदे के पौधे उगाए जाते हैं और इन्हें सितंबर में काटा जाता है। अक्टूबर की शुरुआत में अगली फसल यानी टमाटर की खेती होती है। टमाटर की फसल के तकरीबन 75% तक तैयार हो जाने के बाद, तुरई की बुवाई भी शुरू हो जाती है। तुकाराम का कहना है कि खेती में इस पैटर्न को अपनाकर, वह बाजार की मांग के अनुसार फसलें तैयार कर पाते हैं। साथ ही उन्हें फसलों की सही कीमत भी मिल जाती है।
सालाना 35 लाख की कमाई
जैविक खाद से खेती की लागत कम हुई है। जरूरत के हिसाब से फसल उगाने पर बाजार में फसलों का अच्छा दाम मिल जाता है। इसी कारण तुकाराम का मुनाफा बढ़ा है। तुकाराम का कहना है कि मल्चिंग और ड्रिप इरिगेशन के अपने खेत में एक करोड़ लीटर की क्षमता वाला एक तालाब और दो कुएं भी बनवाए हैं। जिनके कारण खेतों में पानी की सही आपूर्ति हो पाती है। फसलों के लिए उचित मात्रा में पानी मिल पाने के कारण पैदावार भी अच्छी होती हैं। खेती में नए प्रयोग से तुकाराम हर साल तुकाराम खेती से 35 लाख तक का मुनाफा कमा लेते हैं।
कीड़ों को ट्रैप
तुकाराम ने कीट नियंत्रण के लिए अपने खेतों में सोलर ट्रैप लाइटें भी लगवाई हैं। तुकाराम कहते हैं कि कुछ कीड़ें ही फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। जबकि ज्यादातर कीड़ें फसलों में परागण का काम करते हैं। जिससे खेतों में उत्पादकता बढ़ती है। सोलर ट्रैप लाइटें रात में नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को ट्रैप करती हैं। ये लाइट्स सुबह पांच बजे अपने आप बंद भी हो जाती हैं।
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