News Strike: महिला आरक्षण पर मप्र में विधानसभा का विशेष सत्र क्यों बनेगा ऐतिहासिक राजनीतिक घटना?
News In Short
- मध्यप्रदेश में महिला आरक्षण बिल पर 27 अप्रैल को विशेष सत्र।
- विशेष सत्र के लिए राज्यपाल से प्रस्ताव भेजने की प्रक्रिया।
- महिला आरक्षण बिल पर चर्चा को इतिहास के रूप में दर्ज करना।
- बीजेपी और विपक्ष के बीच राजनीति का नया मोड़।
- विधानसभा के एक मिनट का खर्च दो लाख से ज्यादा।
News In Detail
News Strike | न्यूज स्ट्राइक :मध्यप्रदेश विधानसभा में ऐसे मुद्दे पर विशेष सत्र होने वाला है। जिस मुद्दे पर चर्चा का कोई स्कोप नहीं बचा है उस पर सदन में 27 अप्रैल को चर्चा होगी। प्रदेश ही नहीं देश के सियासी इतिहास में ये संभवतः पहली बार होगा जब खत्म हो चुके मुद्दे पर विशेष सत्र आयोजित होगा। क्या ये नियमों के अनुसार सही है या गलत है। अगर सही है तो कांग्रेस इस राजनीतिक चक्रव्यूह से कैसे बाहर निकलेगी। और अगर गलत है तो बीजेपी इसे कैसे जस्टिफाई करेगी। सदन की कार्यवाही से जुड़े नियम इस बारे में क्या कहते हैं। चलिए आज उसी पर चर्चा करते हैं।
महिला आरक्षण बिल: एक और अवसर चूक गया
पिछले दिनों देश की संसद में महिला आरक्षण बिल पर संशोधन विधेयक पेश किया गया। इस बिल को लेकर संसद में जो कुछ भी घटा वो अपने आप में एक तारीख बन गया।
सदन में ये संशोधन विधेयक आया और गिर गया। इस राजनीतिक घटना को यकीनन देश की महिलाएं नहीं भूल सकतीं। राजनीति में उन्हें 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मौका एक बार फिर हाथ से निकल चुका है।
एक इतिहास तो यही हो गया। एक इतिहास ये है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद पहली बार कोई बिल पास नहीं हो सका। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूरे कॉन्फिडेंस से कहा कि अगले कुछ मिनट में हम ये बिल गिरा देंगे।
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महिला आरक्षण बिल, जीत-हार का सियासी खेल
मोदी सरकार के राजनीतिक युग में ये भी एक इतिहास के तौर पर ही दर्ज होगा कि जिस सदन में कोई बिल नहीं गिरा। वहां भी महिलाओं के आरक्षण से जुड़े मामले पर ही सत्ता पक्ष से जुड़े जनप्रतिनिधियों की ताकत कमजोर पड़ गई, लेकिन सियासी हलकों में इस घटनाक्रम के लिए ये जुमला उछाला जा रहा है कि मोदी सरकार हार कर भी जीत गई। जिस तरह से सड़कों पर भीड़ उमड़ी है।
बीजेपी के तमाम नेता राज्य से लेकर शहर और गांवों तक उतर गए हैं। ये जता रहे हैं कि कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने महिलाओं के साथ अन्याय किया है। उसे देखकर यही लगता है कि सदन में भले ही विपक्ष की जीत हुई हो, लेकिन मतदाताओं के बीच विपक्ष को फिर मात झेलनी पड़ी है। अब इस बिल पर एक और इतिहास रचने की तैयारी है।
बीजेपी शासित प्रदेशों में बिल पर विशेष सत्र
वो इतिहास ये है कि अब प्रदेशों में भी इस मुद्दे पर विशेष सत्र आयोजित होगा। अब समझिए पहले संसद का विशेष सत्र आयोजित हुआ। जिसमें अलग-अलग संशोधन पेश किए गए। ये संशोधन संसद में ही धराशाई भी हो गए। अब बीजेपी शासित राज्यों में जो बिल पास नहीं हुए उन पर विशेष सत्र बुलाया जाएगा। उत्तरप्रदेश में इस मुद्दे पर विशेष सत्र बुलाने की डेट का भी ऐलान कर दिया है। तीस अप्रैल को यूपी विधानसभा में विशेष सत्र आहूत होने वाला है। और मध्यप्रदेश में की तारीख भी तय हो चुकी है। प्रदेश में 27 अप्रैल को विशेष सत्र होगा।
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महिला आरक्षण बिल: अब तक का सबसे बड़ा इतिहास
अब तक हमने आपको महिला आरक्षण बिल के संशोधन से जुड़े कितने इतिहास गिनाए। अब सबसे बड़ा इतिहास इसे ही मान लीजिए। यूं तो विधानसभाओं में विशेष सत्र आयोजित होते हैं।
ऐसा पहली बार होने जा रहा है कि कोई बिल जो संसद में गिर चुका हो। उस पर चर्चा के लिए मध्यप्रदेश में विशेष सत्र बुलाया जाने वाला हो। जिस पर राजनीतिक और विधायी प्रतिक्रिया दी जाएंगी। इतना ही नहीं सरकार प्रदेशभर की नगर निगम और नगर पालिकाओं में भी महिला आरक्षण के पक्ष में संकल्प पारित कराने वाली है।
अब सवाल ये उठता है कि क्या ऐसे मुद्दों पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है। ये जानने के लिए आपको ये समझना होगा कि विशेष सत्र कब कब बुलाया जाता है। आमतौर पर विशेष सत्र तब बुलाया जाता है-
- जब सरकार को किसी बड़े मुद्दे पर चर्चा करनी हो।
- जब दो सत्रों के बीच फासला ज्यादा हो और मुद्दा गंभीर हो तो भी विशेष सत्र बुलाया जा सकता है।
- किसी ऐतिहासिक अवसर को यादगार बनाना हो तब भी विशेष सत्र आहूत किया जा सकता है।
- कोई महत्वपूर्ण बिल सदन में पेश करना हो।
- किसी मुद्दे पर निंदा प्रस्ताव लाना हो।
- राज्य के विकास से जुड़े किसी मुद्दे का विशेष नीति पर सदन में चर्चा जरूरी हो।
- सरकार के खिलाफ राजनीतिक अनिश्चितता हो या सरकार को बहुमत साबित करना जरूरी हो तब या, कोई ऐसा मामला जो राज्य हित में जल्दी ध्यान देने लायक हो।
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विशेष सत्र: प्रक्रिया और संविधान की भूमिका
तब किसी भी राज्य की विधानसभा में विशेष सत्र आयोजित किया जाता है। विशेष सत्र बुलाने की भी एक अलग प्रक्रिया है। किसी भी प्रदेश का मंत्रिमंडल ये फैसला करता है कि किसी भी मुददे पर विशेष सत्र बुलाया जाए या नहीं।
कैबिनेट के एक राय होने पर विशेष सत्र का प्रस्ताव राज्यपाल को भेजा जाता है। इसके बाद विशेष सत्र की अधिसूचना जारी होती है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 174 के तहत राज्यपाल को विधानसभा सत्र बुलाने की शक्तियां दी गई हैं। शर्त ये होती है कि जिस विषय पर विशेष सत्र बुलाया जाता है उसी पर चर्चा होगी।
बीजेपी की रणनीति और विशेष सत्र की अहमियत
इन नियमों को समझने के बाद हम ये कह सकते हैं कि बीजेपी महिला आरक्षण से जुड़े बिल के गिरने को एक बड़े और यादगार घटनाक्रम के तौर पर दर्ज करवाना चाहती है। जिसके लिए सड़क पर आक्रोश तो दिखाया ही जा रहा है, लेकिन इस आक्रोश को और प्रदर्शनों को लोग भूल भी सकते हैं।
ये घटना अगर विशेष सत्र के रूप में हर प्रदेश के विधायी दस्तावेजों में दर्ज हो गई तो इसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। शायद इसलिए इस महत्वपूर्ण मुद्दा मानकर विशेष सत्र बुलाने की तैयारी है। जिसे नियमों के विपरीत भी नहीं कहा जा सकता।
इस फैसले को आप किस नजर से देखते हैं। कमेंट सेक्शन में हमें जरूर बताएं और जब राय पूछी ही है तो ये भी बता देते हैं कि विधानसभा की कार्यवाही का एक एक मिनट बेहद कीमती होता है। वो चाहें मुद्दे के लिहाज से हो या फिर खर्च के हिसाब से।
एक मोटे अनुमान के मुताबिक विधानसभा के एक मिनट पर ढाई लाख से ज्यादा का खर्च आता है। हर घंटे का खर्चा चालीस लाख से ज्यादा है और अगर विधानसभा नियम से पूरे दिन चलती है तो उस पर प्रतिदिन दो करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।
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राजनीति से परे, देश की विकास की नई दिशा
तो जरा तोलमोल कर सोचिए और अपनी राय साझा जरूर कीजिए। हम चलते-चलते सिर्फ इतना ही कहना चाहेंगे कि महिलाओं से जुड़े आरक्षण का मामला पूरे देश के विकास की इबारत को नए ढंग से लिख सकता है। इसलिए दल कोई भी हो राजनीति से परे रख कर इस पर विचार किया जाना चाहिए।