News Strike: परिसीमन के बाद कितनी होंगी मप्र की लोकसभा सीटें, 2028 के चुनाव में लागू होगी नई सीट संख्या? समझिए विस्तार से
News In Short
- परिसीमन से मध्यप्रदेश की लोकसभा सीटें 40-45 हो सकती हैं।
- 2001 के बाद परिसीमन में सीटों की संख्या नहीं बढ़ी थी।
- 2011 के बाद जनगणना नहीं हुई, विपक्ष ने परिसीमन की मांग की।
- विधानसभा सीटों का दायरा बढ़कर 230 से 280 हो सकता है।
- केंद्र सरकार ने जनगणना के आधार पर परिसीमन करने का प्रस्ताव दिया।
News In Detail
News Strike | न्यूज स्ट्राइक:परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर देशभर में हल्ला हो रहा है। परिसीमन के बाद मध्यप्रदेश पर क्या असर पड़ेगा। क्या मध्यप्रदेश की विधानसभा सीटों का गणित बदल जाएगा। परिसीमन हुआ तो मप्र में कितनी लोकसभा सीटें होंगी।
ऐसे बहुत से सवाल होंगे जिनके जवाब आप खोज रहे होंगे या जानना चाहते होंगे। लेकिन कंफ्यूजन बरकरार है पर आपके ऐसे हर सवाल का जवाब हम लेकर आए हैं। बिलकुल सीधे और स्पष्ट शब्दों में।
पिछले दो दिनों से विशेष सत्र के नाम पर संसद में जो बहस चल रही है हम उसे बहुत आसान तरीके से आपको समझाते हैं। और ये भी बताते हैं कि मध्यप्रदेश पर इसका क्या असर पड़ेगा।
परिसीमन: चुनावों का नया दांव
परिसीमन को लेकर चर्चा कई दिनों से या सालों से जारी है। बीजेपी के नेता बार बार ये दावा करते रहे हैं कि आने वाले चुनाव परिसीमन के बाद होंगे। हालांकि, कौन से चुनाव होंगे लोकसभा चुनाव या विधानसभा चुनाव ये कोई क्लियरली नहीं बताता है। इस मामले पर लंबी चौड़ी बात करने से पहले सबसे पहले समझिए कि परिसीमन होता क्या है।
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जनसंख्या से तय होगा परिसीमन
परिसीमन को इंग्लिश में कहते हैं डिलिमिटेशन। आप जब भी कोई जमीन खरीदते हैं या जमीनों का बंटवारा होता है तब जमीन को नापा जाता है। परिसीमन भी इसी तरह की प्रक्रिया है, लेकिन अंतर ये है कि परिसीमन में जमीन के एरिया के हिसाब से जमीन तय नहीं होती है।
बल्कि जनसंख्या के आधार पर सीमाओं का निर्धारण होता है। और सिर्फ इसलिए इस शब्द का उपयोग लोकसभा सीट और विधानसभा सीटों का दायरा तय करने के लिए किया जाता है।
मोटे तौर पर हम ये कह सके हैं कि कितने लोगों पर सांसद या विधायक की जरूरत है या क्षेत्र में बांटने की जरूरत है। इसका फैसला परिसीमन से ही होता है। इसके बाद ही ये देखा जाता है कि किसी क्षेत्र में किस तबके के वोटर्स ज्यादा हैं। उसके हिसाब से आरक्षण की बात आगे बढ़ती है।
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परिसीमन से सीटों का नया गणित
परिसीमन एक आम संवैधानिक प्रक्रिया है। जो समय-समय पर होती रहती है। आखिरी परिसीमन 2001 में हुआ था, लेकिन तब सीटों की संख्या नहीं बढ़ी थी। अब जब परिसीमन होगा तो सीटों में भी बदलाव आएगा।
परिसीमन के लिए एक नियम ये भी है कि ये ताजी जनगणना के आधार पर होना चाहिए, लेकिन 2011 के बाद से जनगणना नहीं हुई है। विपक्षी दल पहले जनगणना के बाद ही परिसीमन की मांग पर अड़े हैं।
केंद्र सरकार के नए मसौदे के मुताबिक संसद की सीटें 545 से बढ़ कर 850 हो जाएंगी। जिसमें राज्यों की सीटें 815 होंगी और 35 सीटें केंद्र शासित राज्यों की होंगी। जो फिलहाल बीस ही हैं।
जीत के जादुई आंकड़े पर भी इसका असर पड़ेगा। अभी किसी भी पार्टी को केंद्र में सरकार बनाने के लिए 272 सीटों की जरूरत होती है। अब 426 सीटें जीतने के बाद ही कोई भी पार्टी सरकार बना पाएगी।
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मध्यप्रदेश में परिसीमन का असर
ये तो हुई पूरे देश की बात। परिसीमन का मध्यप्रदेश पर क्या असर पड़ेगा ये भी समझ लेते हैं। मध्यप्रदेश में अभी लोकसभा की 29 सीटे हैं। परिसीमन के बाद प्रदेश में लोकसभा सीटों का आंकड़ा 40 से 45 के बीच हो सकता है। सीटों का ये नंबर पूरे देश की राजनीति पर बड़ा असर डालेगा और किसी भी प्रदेश की आवाज संसद में बुलंद हो सकेगी।
इससे पहले मध्यप्रदेश में परिसीमन 1976 में हुआ था। उसके बाद से अब तक जनसंख्या कितनी बदली होगी ये आप अंदाजा लगा ही सकते हैं। उस समय प्रदेश में 37 लोकसभा सीटें थीं।
ये आंकड़ा मौजूदा सीटों से ज्यादा इसलिए है क्योंकि तब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का विभाजन नहीं हुआ था। विभाजन के बाद दोनों प्रदेशों की लोकसभा सीटों में ज्यादा फर्क नहीं आया था जितनी लोकसभा सीटें छत्तीसगढ़ अंचल में थीं। वो राज्य बनने के बाद उसके खाते में ही चली गईं थीं।
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विधानसभा चुनाव पर कितना असर
लोकसभा के लिए परिसीमन होने का असर विधानसभा पर भी पड़ेगा। इसलिए ये भी तय मान लीजिए कि विधानसभा चुनाव के लिए भी परिसीमन होगा। जिसके बाद प्रदेश की 230 विधानसभा सीटें बढ़कर 280 तक हो सकती हैं।
अब एक सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या आने वाले चुनाव नए परिसीमन के बाद होंगे या नहीं। इसी पॉइंट पर सारा चुनावी रायता बिखरा हुआ है। क्योंकि ये बहुत पेंचिंदा मामला हो चुका है। नियम ये कहते हैं कि जनगणना के बाद ही परिसीमन की प्रक्रिया होगी।
अब केंद्र का कहना है कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन हो जाना चाहिए। लेकिन विपक्ष जनगणना की मांग पर अड़ा हुआ है। किस जनगणना के आधार पर परिसीमन होगा ये तय करने की जिम्मेदारी भी संसद की ही होगी।
फिलहाल हम ये मान सकते हैं कि बिल पर फैसले के बाद संसद में फिर चर्चा होगी। ताकि वो इस नतीजे पर पहुंच सके कि आगे क्या करना है, लेकिन इससे पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ये ऐलान कर चुके हैं कि प्रदेश में आने वाले चुनाव परिसीमन के बाद ही होंगे।
परिसीमन... चुनावों की नई राह
इससे हम ये अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकार अगला चुनाव परिसीमन के बाद ही कराने के मूड में है, लेकिन नियम और कानून की बात हुई तो ये मुश्किल होगा। 2023 में ये कानून बना कि परिसीमन जनगणना के बाद ही होगा।
अगर यही पहली शर्त बना तो किसी भी सूरत में 2028 और 2029 तक जनगणना का काम पूरा होना आसान नहीं है। ऐसे में आने वाले चुनाव परिसीमन के अनुसार करवाना मुश्किल ही है।
संसद के विशेष सत्र का अंत और अंजाम ये तय करेगा कि क्या परिसीमन में जनगणना की शर्त पर संशोधन हो सकेगा। अगर ऐसा हुआ तो समझिए कि देश की राजनीति एक नई दिशा में जाती हुई नजर आएगी।