HLL को जांच का टेंडर, 18 करोड़ की मशीन कबाड़, नई मशीन खरीदी की तैयारी

VINAY VERMA | Jul 31, 2026, 19:53 IST
अंबेडकर हॉस्पिटल मशीन खरीदी विवाद
छत्तीसगढ़ सरकार कैंसर मरीजों के लिए नई पेट-सीटी स्कैन मशीन खरीदने की तैयारी कर रही है, जबकि रायपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में 18 करोड़ रुपए की मशीन पिछले छह साल से बंद पड़ी है। जांच का जिम्मा HLL कंपनी को सौंप दिया गया है।

कैंसर मरीजों के नाम पर फिर करोड़ों की खरीदी की तैयारी है। लेकिन स्वास्थ्य विभाग अपने ही पुराने फैसलों का जवाब नहीं दे पा रहा। रायपुर के डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल में करीब 17 से 18 करोड़ रुपए की पेट-सीटी स्कैन मशीन पिछले छह साल से बंद पड़ी है।



मशीन कभी मरीजों के काम ही नहीं आई। अब सरकार लगभग 20 करोड़ रुपए खर्च कर नई मशीन खरीदने की तैयारी कर रही है। इससे सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि पुरानी मशीन का हिसाब कौन देगा।



स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल का कहना है कि जनता की सुविधा को देखते हुए नई पेट-सीटी स्कैन मशीन लाई जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पुरानी मशीन की स्थिति की जांच कराई जाएगी



HLL को जिम्मा, फिर नई खरीदी क्यों?

सरकार ने प्रदेश की जांच सेवाओं का जिम्मा एचएलएल कंपनी को सौंप दिया है। इसके लिए हर साल करीब 210 करोड़ रुपए दिए जाने हैं। जब जांच की व्यवस्था निजी एजेंसी के जिम्मे है तो फिर अलग से नई पेट-सीटी स्कैन मशीन खरीदने की क्या जरूरत है।



क्या यह दोहरी व्यवस्था है या फिर नई खरीदी की नई पटकथा लिखी जा रही है। विभाग के सामने यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा है।



रोज मरीज, लेकिन जांच निजी अस्पताल में

प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अंबेडकर अस्पताल की कैंसर यूनिट में रोज करीब 500 से 550 मरीज पहुंचते हैं। इनमें से औसतन 30 से 40 मरीजों को पेट-सीटी स्कैन की जरूरत पड़ती है। सरकारी अस्पताल में मशीन बंद होने के कारण मरीजों को निजी सेंटर भेजा जाता है। एक जांच पर 25 से 30 हजार रुपए तक खर्च करना पड़ता है। यानी हर दिन मरीजों की जेब से करीब 8 से 9 लाख रुपए अतिरिक्त निकल रहे हैं। गरीब मरीज इलाज से पहले जांच के खर्च में ही टूट रहे हैं।



मरम्मत नहीं, फाइलें चलती रहीं

हैरानी की बात यह है कि मशीन किसी बड़े तकनीकी हादसे की वजह से बंद नहीं है। प्रशासनिक मंजूरी नहीं मिली। छोटी मरम्मत की फाइलें अटक गईं। विशेषज्ञ तकनीकी स्टाफ की नियुक्ति नहीं हुई। छह साल तक फाइलें विभागों में घूमती रहीं और मशीन धूल खाती रही। मेडिकल कॉलेज और अस्पताल प्रबंधन ने कई बार प्रस्ताव भेजे, लेकिन वित्त और शासन स्तर पर मामला आगे नहीं बढ़ा। इलाज की जगह फाइलों का इलाज चलता रहा।



1.71 लाख की मरम्मत भी मंजूर नहीं

अब मशीन बनाने वाली कंपनी सिमंस ने इसे दोबारा चालू करने पर सहमति दे दी है। पूरी सर्विसिंग और मरम्मत पर केवल करीब 1.71 लाख रुपए खर्च आने का अनुमान है। इसके लिए प्रस्ताव भी शासन को भेजा जा चुका है। लेकिन फाइल अब भी लंबित है। सवाल यह है कि जिस मशीन पर 18 करोड़ रुपए खर्च किए गए, उसे चालू करने के लिए डेढ़-दो लाख रुपए भी सरकार जारी नहीं कर पा रही, जबकि नई मशीन खरीदने की तैयारी तेज है।



बिना प्रस्ताव खरीद ली गई मशीन

पड़ताल में यह भी सामने आया कि इस मशीन की खरीदी की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में रही। चिकित्सा शिक्षा विभाग या अंबेडकर अस्पताल की ओर से औपचारिक प्रस्ताव नहीं भेजा गया था। मशीन निर्माता कंपनी ने इसकी उपयोगिता बताई। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री ने अस्पताल प्रशासन से राय मांगी। उपयोगी बताए जाने के बाद सीजीएमएससी को कार्रवाई के निर्देश दिए गए और मशीन खरीद ली गई। लेकिन खरीदी के बाद संचालन की तैयारी ही नहीं की गई। न स्टाफ मिला, न व्यवस्था बनी और करोड़ों की मशीन शोपीस बन गई।



5 बड़े सवाल

  • 18 करोड़ की मशीन छह साल से बंद क्यों?
  • नई मशीन खरीदने की जरूरत आखिर क्यों?
  • एचएलएल को 210 करोड़ देने के बाद भी अलग खरीदी क्यों?
  • रोज 30-40 मरीज निजी अस्पताल क्यों भेजे जा रहे?
  • जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई कब होगी?

पेट-सीटी और गामा मशीन क्यों जरूरी?

पेट-सीटी स्कैन कैंसर की शुरुआती पहचान, बीमारी के फैलाव और इलाज के असर का सबसे सटीक आकलन करता है। ब्रेन, फेफड़े, लिवर, ब्रेस्ट और बोन कैंसर में इसकी अहम भूमिका होती है। वहीं गामा कैमरा हार्ट, किडनी, थायराइड, बोन और लिवर की कार्यप्रणाली की जांच करता है। दोनों मशीनें आधुनिक इलाज की रीढ़ मानी जाती हैं। यही वजह है कि इनके बंद रहने का सीधा नुकसान मरीजों को उठाना पड़ रहा है।



अब मंत्री बोले- जांच होगी

बड़ा सवाल अब भी कायम है। पहले 18 करोड़ की मशीन छह साल तक क्यों बंद रही? जिम्मेदार कौन है? और अगर पुरानी मशीन चालू हो सकती है तो नई खरीद पर करोड़ों रुपए खर्च करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है? कैंसर मरीज जवाब नहीं, इलाज चाहते हैं। सरकार को अब फाइल नहीं, फैसला करना होगा।



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