बालको के 122 करोड़ की वसूली पर रहस्य, आरआरसी के बाद भी स्थिति साफ नहीं
Rajesh Lahoti | Jul 22, 2026, 17:26 IST
बालको से 122 करोड़ की वसूली 2026
छत्तीसगढ़ के कोरबा में BALCO से जुड़ी करीब 122 करोड़ 14 लाख रुपए की वन देयता वसूली का मामला फिर चर्चा में है। आरोप है कि करीब 20 साल पुराने इस मामले में अब तक वसूली की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
भारत एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड यानी बालको से जुड़ा करीब 122 करोड़ रुपए की वन देयता की वसूली का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब 20 साल पुराने इस मामले में लगातार ढीलपोल चलती रही।
कोरबा वन मंडल के 23 फरवरी 2023 के पत्र और इसके बाद कलेक्टर कार्यालय की ओर से शुरू की गई राजस्व वसूली प्रक्रिया के बावजूद अब इस रकम की वास्तविक वसूली और सरकारी खाते में जमा होने की स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। मामले में वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों और कोरबा कलेक्टर से शिकायत कर पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच, जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की मांग की गई है।
दस्तावेज के मुताबिक वन राजस्व के मामले में कोरबा के तत्कालीन वन विभागीय रिकॉर्ड में बालको से 54 करोड़ 82 लाख रुपए नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) और 67 करोड़ 31 लाख रुपए क्षतिपूरक वनीकरण के मद में वसूली योग्य बताए गए थे। दोनों को मिलाकर कुल रकम ₹1,22,14,27,395 यानी करीब 122 करोड़ 14 लाख रुपए बैठती है। वन विभाग ने यह मामला वसूली के लिए कलेक्टर को भेजा था।
इसके बाद 19 अप्रैल 2023 को कलेक्टर की ओर से संबंधित तहसीलदार को रेवेन्यू रिकवरी सर्टिफिकेट यानी आरआरसी के जरिए रकम वसूलने के निर्देश दिए गए, लेकिन तहसीलदार ने कुछ कारण बताकर इसे टाल दिया। तत्कालीन कलेक्टर की तरफ से भी इस मामले में कोई फ़ॉलोअप नहीं लिया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वसूली प्रक्रिया के तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बाद आखिर इस मामले में हुआ क्या। आरटीआई एक्टिविस्ट लक्ष्मी चौहान ने माइनिंग सेक्रेटरी, चीफ सेक्रेटरी और पीसीसीएफ को शिकायत में कहा है कि उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में अब तक ऐसी कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है जिससे यह प्रमाणित हो कि पूरी रकम सरकारी खाते में जमा हो चुकी है। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने वन विभाग और जिला प्रशासन से एक्शन रिपोर्ट और आरआरसी की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है।
रिकॉर्ड के मुताबिक, बालको से संबंधित कुल 1,22,14,27,395 रुपए यानी करीब 122 करोड़ 14 लाख रुपए की वन देयता बताई गई है। इस रकम में दो प्रमुख मद शामिल हैं। पहली राशि 54 करोड़ 82 लाख रुपए एनपीवी यानी नेट प्रजेंट वैल्यू के रूप में बताई गई है। आसान भाषा में कहें तो वन भूमि का गैर वानिकी उपयोग होगा तो पर्यावरण और जंगल पर असर पड़ेगा।
इस सूरत में आर्थिक भरपाई के लिए यह राशि निर्धारित की जाती है। दूसरी राशि 67.31 करोड़ रुपए क्षतिपूरक वनीकरण के मद में बताई गई है। इसका संबंध वन भूमि के उपयोग के बदले निर्धारित नियमों के तहत वन क्षेत्र विकसित करने और पौधरोपण जैसी गतिविधियों के लिए होने वाली भरपाई से है।
इस तरह दोनों मदों को मिलाकर कुल रकम करीब 122 करोड़ 14 लाख रुपए बनती है। यानी इस मामले में 122 करोड़ रुपए की रकम कोई एक सामान्य टैक्स नहीं है, बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार वन भूमि के उपयोग से जुड़ी अलग-अलग वन देयताओं का कुल योग है।
मामला सिर्फ सरकारी बकाया की वसूली तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बालको के कब्जे और वन भूमि के उपयोग का एक पुराना विवाद भी जुड़ा हुआ है। दस्तावेज में केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति यानी सीईसी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि बालको के कब्जे में लगभग 1,751 एकड़ जमीन थी, जिसे राजस्व रिकॉर्ड में बड़े झाड़ का जंगल/छोटे झाड़ का जंगल के रूप में दर्ज बताया गया।
सीईसी के अनुसार इसमें करीब 947.95 एकड़ में 1971 में खड़े पेड़ों का मुआवजा दिए जाने का उल्लेख है, जबकि लगभग 803 एकड़ जमीन को लेकर अलग सवाल उठे थे।
सीईसी के निष्कर्षों के अनुसार, करीब 803 एकड़ जमीन राजस्व वन के रूप में दर्ज थी और उसके गैर-वानिकी उपयोग, आवंटन या लीज के लिए वन संरक्षण कानून के तहत केंद्र की पूर्व स्वीकृति जरूरी थी। शिकायत में इसी पुराने विवाद को मौजूदा ₹122 करोड़ की देनदारी और वसूली के सवाल से जोड़ते हुए पूरे मामले की दोबारा समीक्षा की मांग की गई है।
अब इस मामले में असली मुद्दा यह है कि 2023 में आरआरसी की कार्रवाई शुरू होने के बाद भी 122 करोड़ रुपए की वसूली का वर्तमान स्टेटस क्या है? क्या बालको ने पूरी या आंशिक राशि जमा की? यदि राशि जमा हुई है तो उसकी रसीद और सरकारी खाते में जमा होने का रिकॉर्ड क्या है? यदि नहीं हुई तो आरआरसी के बावजूद तीन साल से अधिक समय में वसूली क्यों नहीं हो सकी? और इस देरी के लिए जिम्मेदार कौन है?
इस संबंध में प्रधान मुख्य वन सरंक्षक अरुण पांडे का कहना है कि 20 साल पुराने इस मामले की फाइल तालाब की है और इसकी पूरी जांच के लिए कहा गया है। कुछ ही दिनों में इस मामले में ठोस निर्णय लिया जाएगा। वहीं, इस पूरे मामले में बालको के अधिकारियों से जब यह पूछा गया कि 122 करोड़ 14 लाख रुपए की देनदारी के संबंध में उसका क्या पक्ष है, क्या रकम जमा की जा चुकी है, क्या इस मामले में कोई अपील या न्यायिक विवाद लंबित है? लेकिन इस संबंध बालको प्रबंधन चुप्पी साधे बैठा है।
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कोरबा वन मंडल के 23 फरवरी 2023 के पत्र और इसके बाद कलेक्टर कार्यालय की ओर से शुरू की गई राजस्व वसूली प्रक्रिया के बावजूद अब इस रकम की वास्तविक वसूली और सरकारी खाते में जमा होने की स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। मामले में वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों और कोरबा कलेक्टर से शिकायत कर पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच, जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की मांग की गई है।
दस्तावेज के मुताबिक वन राजस्व के मामले में कोरबा के तत्कालीन वन विभागीय रिकॉर्ड में बालको से 54 करोड़ 82 लाख रुपए नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) और 67 करोड़ 31 लाख रुपए क्षतिपूरक वनीकरण के मद में वसूली योग्य बताए गए थे। दोनों को मिलाकर कुल रकम ₹1,22,14,27,395 यानी करीब 122 करोड़ 14 लाख रुपए बैठती है। वन विभाग ने यह मामला वसूली के लिए कलेक्टर को भेजा था।
इसके बाद 19 अप्रैल 2023 को कलेक्टर की ओर से संबंधित तहसीलदार को रेवेन्यू रिकवरी सर्टिफिकेट यानी आरआरसी के जरिए रकम वसूलने के निर्देश दिए गए, लेकिन तहसीलदार ने कुछ कारण बताकर इसे टाल दिया। तत्कालीन कलेक्टर की तरफ से भी इस मामले में कोई फ़ॉलोअप नहीं लिया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वसूली प्रक्रिया के तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बाद आखिर इस मामले में हुआ क्या। आरटीआई एक्टिविस्ट लक्ष्मी चौहान ने माइनिंग सेक्रेटरी, चीफ सेक्रेटरी और पीसीसीएफ को शिकायत में कहा है कि उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में अब तक ऐसी कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है जिससे यह प्रमाणित हो कि पूरी रकम सरकारी खाते में जमा हो चुकी है। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने वन विभाग और जिला प्रशासन से एक्शन रिपोर्ट और आरआरसी की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है।
122 करोड़ की रकम आखिर किस बात की है
इस सूरत में आर्थिक भरपाई के लिए यह राशि निर्धारित की जाती है। दूसरी राशि 67.31 करोड़ रुपए क्षतिपूरक वनीकरण के मद में बताई गई है। इसका संबंध वन भूमि के उपयोग के बदले निर्धारित नियमों के तहत वन क्षेत्र विकसित करने और पौधरोपण जैसी गतिविधियों के लिए होने वाली भरपाई से है।
इस तरह दोनों मदों को मिलाकर कुल रकम करीब 122 करोड़ 14 लाख रुपए बनती है। यानी इस मामले में 122 करोड़ रुपए की रकम कोई एक सामान्य टैक्स नहीं है, बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार वन भूमि के उपयोग से जुड़ी अलग-अलग वन देयताओं का कुल योग है।
मामला सिर्फ सरकारी बकाया की वसूली तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बालको के कब्जे और वन भूमि के उपयोग का एक पुराना विवाद भी जुड़ा हुआ है। दस्तावेज में केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति यानी सीईसी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि बालको के कब्जे में लगभग 1,751 एकड़ जमीन थी, जिसे राजस्व रिकॉर्ड में बड़े झाड़ का जंगल/छोटे झाड़ का जंगल के रूप में दर्ज बताया गया।
सीईसी के अनुसार इसमें करीब 947.95 एकड़ में 1971 में खड़े पेड़ों का मुआवजा दिए जाने का उल्लेख है, जबकि लगभग 803 एकड़ जमीन को लेकर अलग सवाल उठे थे।
सीईसी के निष्कर्षों के अनुसार, करीब 803 एकड़ जमीन राजस्व वन के रूप में दर्ज थी और उसके गैर-वानिकी उपयोग, आवंटन या लीज के लिए वन संरक्षण कानून के तहत केंद्र की पूर्व स्वीकृति जरूरी थी। शिकायत में इसी पुराने विवाद को मौजूदा ₹122 करोड़ की देनदारी और वसूली के सवाल से जोड़ते हुए पूरे मामले की दोबारा समीक्षा की मांग की गई है।
आखिर कौन है जिम्मेदार
इस संबंध में प्रधान मुख्य वन सरंक्षक अरुण पांडे का कहना है कि 20 साल पुराने इस मामले की फाइल तालाब की है और इसकी पूरी जांच के लिए कहा गया है। कुछ ही दिनों में इस मामले में ठोस निर्णय लिया जाएगा। वहीं, इस पूरे मामले में बालको के अधिकारियों से जब यह पूछा गया कि 122 करोड़ 14 लाख रुपए की देनदारी के संबंध में उसका क्या पक्ष है, क्या रकम जमा की जा चुकी है, क्या इस मामले में कोई अपील या न्यायिक विवाद लंबित है? लेकिन इस संबंध बालको प्रबंधन चुप्पी साधे बैठा है।
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