नक्सल एडीजी की चेतावनी पर पीसीसीएफ का जवाब-कोई घर नहीं टूटा
समझें क्या है पूरा मामला
Raipur। बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ वर्षों तक चली लड़ाई के बाद जब विस्थापित आदिवासी अपने गांव लौटने लगे, तभी वन विभाग की कार्रवाई ने नया विवाद खड़ा कर दिया। मामला इतना गंभीर हो गया कि नक्सल मामलों के एडीजी विवेकानंद को खुद गृह विभाग को पत्र लिखकर चेतावनी देनी पड़ी कि वन विभाग की कार्यवाही नक्सल प्रभावित इलाकों में नया असंतोष पैदा कर सकती है और हालात बिगड़ने का खतरा है। अब इस चेतावनी पर पहली बार प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) अरुण पांडे जवाब देते हुए कहा कि किसी का घर नहीं तोड़ा, लेकिन अतिक्रमण पर कार्रवाई होगी।
पीसीसीएफ ने गृह विभाग को भेजी अपनी रिपोर्ट में पुलिस मुख्यालय की आशंकाओं से पूरी तरह सहमति नहीं जताई। उन्होंने दावा किया है कि अब तक की जांच में किसी भी नक्सल पीड़ित परिवार का घर तोड़े जाने या उन्हें बेदखल किए जाने की पुष्टि नहीं हुई है। साथ ही यह भी साफ कर दिया कि अबूझमाड़ और बीजापुर के कई इलाकों में वन भूमि पर अतिक्रमण की शिकायतें लगातार मिल रही हैं और उन पर कार्रवाई जारी रहेगी।
पुलिस ने कहा-हालात बिगड़ सकते हैं, वन विभाग बोला-तथ्य नहीं मिले
24 जून को एडीजी विवेकानंद ने गृह विभाग को भेजे पत्र में कहा था कि नक्सलवाद कमजोर पड़ने के बाद बड़ी संख्या में विस्थापित आदिवासी अपने गांव लौट रहे हैं, लेकिन वन विभाग की कार्रवाई से उनमें असंतोष बढ़ रहा है। पत्र में चेतावनी दी गई थी
कि यदि इस मुद्दे को संवेदनशीलता से नहीं संभाला गया तो वर्षों की मेहनत से स्थापित शांति प्रभावित हो सकती है। इसके जवाब में पीसीसीएफ अरुण पांडे ने खुद मैदान में उतरने का फैसला किया। उन्होंने 27 से 29 जून के बीच बीजापुर और अबूझमाड़ के संवेदनशील इलाकों का दौरा किया और अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की।
छह गांवों की जांच, नहीं मिला घर तोड़ने का मामला
पीसीसीएफ के मुताबिक सेन्ड्रा, काकलेर, नीलामड़गु, कोरचौली, तोड़का और टेकमेटला गांवों की विस्तृत जांच कराई गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी भी नक्सल पीड़ित परिवार का घर तोड़े जाने की पुष्टि नहीं हुई। वन विभाग का कहना है कि कार्रवाई केवल वहां की जा रही है, जहां नए सिरे से वन भूमि पर कब्जे की कोशिश हो रही है।
सबको जमीन चाहिए, लेकिन कानून से ऊपर कोई नहीं
अपनी रिपोर्ट में पीसीसीएफ ने साफ लिखा है कि हर व्यक्ति जमीन चाहता है, लेकिन आरक्षित वन भूमि का आवंटन वन विभाग अपने स्तर पर नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि विभाग इस पूरे मामले को बेहद संवेदनशील तरीके से संभाल रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वन भूमि पर नए अतिक्रमण को नजरअंदाज कर दिया जाएगा। वन विभाग ने यह भी स्वीकार किया है कि अबूझमाड़ के कुछ हिस्सों में लगातार नए अतिक्रमण की सूचनाएं मिल रही हैं और ऐसे मामलों में नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस का इनपुट गलत या जमीनी हकीकत अलग
अब इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो गया है कि आखिर दोनों विभागों की तस्वीर अलग-अलग क्यों दिख रही है? एक ओर पुलिस मुख्यालय यह कह रहा है कि वन विभाग की कार्रवाई से लौट रहे आदिवासियों में नाराजगी बढ़ रही है और इससे कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर वन विभाग का दावा है कि किसी भी नक्सल पीड़ित का घर नहीं तोड़ा गया। यदि पुलिस का आकलन सही था, तो वन विभाग की जांच में ऐसे मामले क्यों नहीं मिले? और यदि वन विभाग का दावा सही है, तो फिर पुलिस मुख्यालय को इतनी गंभीर चेतावनी जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार के पाले में गेंद
यह विवाद अब केवल वन विभाग और पुलिस के बीच का नहीं रह गया है। मामला सीधे सरकार के सामने पहुंच चुका है। एक तरफ जंगल संरक्षण का कानून है तो दूसरी ओर नक्सल हिंसा झेल चुके आदिवासियों के पुनर्वास का सवाल। अब सरकार को तय करना है
कि बस्तर में लौट रहे ग्रामीणों का भरोसा कैसे कायम रखा जाए और वन संरक्षण के नियमों का पालन भी कैसे सुनिश्चित किया जाए। यदि दोनों विभागों के दावों में यही विरोधाभास बना रहा, तो केवल जंगल या जमीन का नहीं बल्कि उस पुनर्वास मॉडल पर भी प्रश्नचिह्न लगेगा, जिसे सरकार नक्सलवाद के बाद बस्तर की सबसे बड़ी उपलब्धि बता रही है।
IMP FACTS
मामला: बस्तर में वन विभाग की कार्रवाई को लेकर विवाद
स्थान: बीजापुर और अबूझमाड़ के नक्सल प्रभावित इलाके, छत्तीसगढ़
पुलिस अधिकारी: नक्सल मामलों के एडीजी विवेकानंद
पत्र की तारीख: 24 जून
चिंता: वन विभाग की कार्रवाई से लौट रहे आदिवासियों में असंतोष बढ़ने और शांति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका
वन विभाग अधिकारी: प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) अरुण पांडे
जांच दौरा: 27 से 29 जून तक बीजापुर और अबूझमाड़ के संवेदनशील क्षेत्रों का दौरा
जांच किए गए गांव: सेन्ड्रा, काकलेर, नीलामड़गु, कोरचौली, तोड़का, टेकमेटला
वन विभाग का दावा: जांच में किसी नक्सल पीड़ित परिवार का घर तोड़े जाने या बेदखली की पुष्टि नहीं हुई।
वन विभाग की स्थिति: आरक्षित वन भूमि पर नए अतिक्रमण के मामलों में कार्रवाई जारी रहेगी।
मुख्य विवाद: पुलिस का दावा है कि कार्रवाई से असंतोष बढ़ सकता है, जबकि वन विभाग का कहना है कि कार्रवाई कानून के अनुसार हो रही है।
सरकार के सामने चुनौती: नक्सल प्रभावित आदिवासियों का पुनर्वास और वन संरक्षण नियमों के बीच संतुलन बनाना।
FAQ
- बस्तर में वन विभाग की कार्रवाई को लेकर विवाद क्यों हुआ?
नक्सल प्रभावित इलाकों में लौट रहे आदिवासियों पर कार्रवाई को लेकर पुलिस ने असंतोष बढ़ने की आशंका जताई थी। - PCCF अरुण पांडे ने वन विभाग की कार्रवाई पर क्या कहा?
PCCF ने कहा कि किसी नक्सल पीड़ित परिवार का घर नहीं तोड़ा गया है। केवल वन भूमि अतिक्रमण पर नियमानुसार कार्रवाई हो रही है। - पुलिस और वन विभाग के दावों में अंतर क्यों दिख रहा है?
पुलिस ने कानून-व्यवस्था और आदिवासियों की नाराजगी की चिंता जताई है, जबकि वन विभाग ने जांच में घर तोड़ने की बात से इनकार किया है।
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