बस्तर पंडुम 2026: जनजातीय संस्कृति का महासंगम, गांव-गांव की कला को मिला मंच और सम्मान

The Sootr | Jan 31, 2026, 14:21 IST
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bastar pandum 2026 tribal culture festival chhattisgarh
Impact Feature

बस्तर पंडुम 2026 छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में जनजातीय संस्कृति, लोक नृत्य और पारंपरिक कलाओं को संरक्षित करने का एक विशाल अभियान है, जिसने बस्तर को वैश्विक पहचान दिलाई है।

Raipur.छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति से जुड़ी जीवन शैली के लिए जाना जाता रहा है। लंबे समय तक यह इलाका देश के बड़े सांस्कृतिक नक्शे पर उस पहचान के साथ सामने नहीं आ पाया, जिसका वह हकदार था। अब तस्वीर बदलती दिख रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में जनजातीय कला और संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में 'बस्तर पंडुम 2026' एक बड़े सांस्कृतिक आंदोलन की तरह सामने आया है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इस महोत्सव को बस्तर में सकारात्मक बदलाव का प्रतीक बताया है। वहीं, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आयोजन में शामिल होकर सरकार के प्रयासों की सराहना की।

आपको बता दें कि संस्कृति विभाग की पहल पर वर्ष 2026 में आयोजित यह महोत्सव केवल एक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि बस्तर की लोक परंपराओं, कला, जीवन शैली और सामुदायिक पहचान को एक मंच पर लाने का बड़ा प्रयास बना। जनपद, जिला और संभाग स्तर पर प्रतियोगिता के रूप में आयोजित इस आयोजन ने हजारों लोक कलाकारों, कला दलों और पारंपरिक कलाकार परिवारों को सीधे मंच दिया। यह आयोजन बस्तर की लोककला, नृत्य, गीत-संगीत, पारंपरिक खान-पान, वेशभूषा, आभूषण, बोली-भाषा, वाद्य यंत्र, नाट्य कला और जनजातीय जीवन पद्धति को सहेजने और आगे बढ़ाने का बड़ा माध्यम बना है।

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बस्तर के सातों जिलों में संस्कृति का उत्सव

बस्तर पंडुम का आयोजन बस्तर संभाग के सभी सात जिलों- बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, कांकेर, कोंडागांव और नारायणपुर में किया गया। इसके तहत बस्तर संभाग की 1885 ग्राम पंचायतों से जुड़े कलाकारों को 32 जनपद मुख्यालयों में आयोजित प्रतियोगिताओं से जोड़ा गया। प्रतियोगिता को 12 पारंपरिक कला विधाओं में बांटा गया, जिससे हर तरह की लोक कला को जगह मिल सके।

ग्राम स्तर से चयनित कलाकारों और दलों को जनपद स्तर की प्रतियोगिताओं में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया। यह प्रक्रिया ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से संचालित हुई, ताकि दूर-दराज के कलाकार भी भाग ले सकें।

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तीन चरणों में हुआ भव्य आयोजन

1. पहला चरण: जनपद स्तर

जनपद स्तरीय प्रतियोगिताएं 10 से 20 जनवरी 2026 के बीच आयोजित की गईं। हर कला विधा से एक विजेता दल चुना गया। प्रत्येक विजेता दल को 10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी गई। इस आयोजन को सफल बनाने के लिए हर जनपद पंचायत को 5 लाख रुपये का बजट दिया गया था।

2. दूसरा चरण: जिला स्तर

जिला स्तरीय प्रतियोगिताएं 24 से 29 जनवरी 2026 के बीच आयोजित हुईं। इस चरण में प्रत्येक विधा के विजेता दल को 20 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी गई। इस स्तर के आयोजन के लिए हर जिले को 10 लाख रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई।

3. तीसरा चरण: संभाग स्तर

आखिरी और सबसे बड़ा चरण 2 से 6 फरवरी 2026 के बीच जगदलपुर में आयोजित हुआ। इसमें सातों जिलों से चयनित 84 विजेता दलों ने भाग लिया।

संभाग स्तर पर पुरस्कार:

  • प्रथम पुरस्कार: 50 हजार रुपए
  • द्वितीय पुरस्कार: 30 हजार रुपए
  • तृतीय पुरस्कार: 20 हजार रुपए
  • शेष 48 प्रतिभागी दलों के लिए 10 हजार रुपए प्रोत्साहन राशि दी गई। साथ ही सभी विजेताओं को प्रमाण पत्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

मूल कलाकारों को प्राथमिकता

इस आयोजन की खास बात यह रही कि इसमें भाग लेने की अनुमति केवल उन्हीं कलाकारों को दी गई, जो बस्तर संभाग के मूल निवासी हैं और लोक कला परंपराओं से जुड़े हुए हैं। गांवों में वर्षों से अपनी कला को जीवित रखने वाले वरिष्ठ कलाकारों को मंच मिला। नए कलाकारों और युवा प्रतिभाओं को भी अपनी कला दिखाने का मौका मिला। इससे परंपरा और नई पीढ़ी के बीच मजबूत संबंध बना।

जनउत्सव जैसा माहौल

इस महोत्सव को केवल प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे जनउत्सव का रूप दिया गया। समाज प्रमुख, आदिवासी मुखिया, वरिष्ठ नागरिक, जनप्रतिनिधि और संस्कृति प्रेमियों को इसमें शामिल किया गया। इससे आयोजन सामुदायिक जुड़ाव का बड़ा माध्यम बना।

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क्या होता है पंडुम?

स्थानीय गोंडी सहित कई जनजातीय बोलियों में ‘पंडुम’ का मतलब होता है उत्सव या त्योहार। आदिवासी जीवन में प्रकृति का हर बदलाव उत्सव का कारण होता है। बीज बोने से लेकर नई फसल आने तक हर चरण को उत्सव की तरह मनाया जाता है। इसी परंपरा को ध्यान में रखते हुए सरकार ने इस सांस्कृतिक आयोजन को ‘बस्तर पंडुम’ नाम दिया है।

लोक संस्कृति के रंग मंच पर दिखे

इस आयोजन में 12 पारंपरिक विधाओं में प्रतियोगिताएं हुईं। इसमें नृत्य, संगीत, वाद्य यंत्र, वेशभूषा, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजन शामिल रहे।

  • नृत्य की झलक: गौर माड़िया, मुरिया और डंडारी जैसे पारंपरिक नृत्यों ने दर्शकों को आकर्षित किया।
  • पारंपरिक खान-पान: महुआ से बने व्यंजन, सल्फी, पेज और मोटे अनाज से बने खाद्य पदार्थ लोगों के बीच खास आकर्षण रहे।
  • हस्तशिल्प की पहचान: डोकरा कला, टेराकोटा और लकड़ी की नक्काशी का लाइव प्रदर्शन किया गया।

प्रधानमंत्री ने की सराहना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक समय बस्तर का नाम आते ही माओवाद, हिंसा और विकास में पिछड़ेपन की छवि उभरती थी, लेकिन आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब बस्तर शांति, विकास और स्थानीय लोगों के बढ़ते आत्मविश्वास के लिए जाना जा रहा है।"

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मुख्यमंत्री ने जताया आभार

छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और निरंतर मार्गदर्शन से बस्तर आज सांस्कृतिक गौरव और समावेशी विकास के सशक्त प्रतीक के रूप में अपनी नई पहचान गढ़ रहा है। बस्तर पंडुम जैसे आयोजन जनजातीय परंपराओं, लोक-संस्कृति और विरासत को सहेजने के साथ-साथ शांति, विश्वास और समावेशी प्रगति का प्रभावी संदेश देते हैं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों से बस्तर के जनजीवन में सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और आजीविका के अवसरों के विस्तार से क्षेत्र में भरोसे और सहभागिता का नया वातावरण बना है। राज्य सरकार प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में जनजातीय समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ बस्तर को शांति, समृद्धि और विकास की नई ऊंचाइयों तक निरंतर अग्रसर करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है।
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