ड्रापआउट बच्चों को वापस स्कूल लाएगी केंद्र की पायलट योजना

Aishwarya Dwivedi | May 19, 2026, 10:08 IST
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केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय छत्तीसगढ़ सहित नौ राज्यों के 10 जिलों में नई पायलट योजना शुरू कर रहा है। इसका उद्देश्य 14 से 18 वर्ष के स्कूल छोड़ चुके बच्चों को वापस मुख्यधारा से जोड़ना है।

NEWS IN SHORT

  • शिक्षा मंत्रालय ला रहा है वंचित बच्चों के लिए नई योजना।
  • शुरुआती चरण में देश के 10 जिलों में लागू होगी स्कीम।
  • 14 से 18 वर्ष के बच्चों पर रहेगा विशेष फोकस।
  • कक्षा पहली के सिर्फ 62 बच्चे ही पहुंच पाते हैं 12वीं तक।
  • योजना को सफल बनाने में जिला कलेक्टरों की होगी मुख्य भूमिका।

NEWS IN DETAIL

देश में स्कूली शिक्षा के स्तर को सुधारने और बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों को वापस शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय एक बड़ी कार्ययोजना तैयार कर रहा है। छत्तीसगढ़ समेत देश के कई राज्यों में बच्चों द्वारा स्कूल न जाने या पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए मंत्रालय जल्द ही एक विशेष स्कीम लॉन्च करने जा रहा है। इसे शुरुआती चरण में देश के उन 10 चुनिंदा जिलों में लागू किया जाएगा, जहां शिक्षा से वंचित बच्चों की संख्या सबसे अधिक है।



14 से 18 वर्ष के बच्चों पर विशेष फोकस

स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग (डीओएसईएल) के सचिव संजय कुमार की अध्यक्षता में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में इस योजना का खाका साझा किया गया। इस बैठक में छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी, जिला कलेक्टर और शिक्षा विशेषज्ञ शामिल हुए। मंत्रालय का मुख्य फोकस 14 से 18 वर्ष की उम्र के उन बच्चों पर है, जो या तो कभी स्कूल नहीं गए या फिर जिन्होंने किन्हीं कारणों से नियमित रूप से स्कूल जाना बंद कर दिया है।



इस योजना को प्रभावी बनाने के लिए केंद्र सरकार संबंधित राज्य सरकारों के साथ एक 'प्रतिबद्धता ज्ञापन' (Memorandum of Commitment - MOC) पर हस्ताक्षर करेगी। राज्यों से इस संबंध में अधिक से अधिक सटीक और प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा गया है, ताकि लक्षित बच्चों तक सीधे पहुंचा जा सके।



100 में से केवल 62 बच्चे ही पहुंच रहे 12वीं तक

बैठक के दौरान शिक्षा विभाग के सचिव संजय कुमार ने एक बेहद चिंताजनक आंकड़ा प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कक्षा पहली में प्रवेश लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 62 बच्चे ही कक्षा 12वीं तक का सफर तय कर पाते हैं। यानी लगभग 38% बच्चे बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं।



इस गिरावट के पीछे मुख्य रूप से बच्चों के परिवारों की आर्थिक मजबूरियां, घरेलू जिम्मेदारियां और आजीविका (रोजगार) से जुड़ी चुनौतियां सामने आई हैं। सरकार का लक्ष्य है कि इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हर बच्चे को कम से कम माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर की शिक्षा और साथ में कौशल विकास (Skill Development) का अवसर मिले, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके।



मिशन मोड में होगी बच्चों की पहचान

डीओएसईएल की संयुक्त सचिव श्रीमती प्राची पांडे ने बैठक में स्पष्ट किया कि स्कूल न जाने वाले बच्चों की इस गंभीर समस्या को मिशन मोड में हल किया जा रहा है। इस पहल में पूरी तरह से 'डेटा-आधारित दृष्टिकोण' (Data-driven approach) अपनाया जाएगा, जिससे समाज के अंतिम छोर पर खड़े बच्चे तक सहायता पहुंचाई जा सके।



इस अभियान की सफलता के लिए राज्य, जिला और स्थानीय स्तर पर विभिन्न सरकारी विभागों के बीच आपसी तालमेल को अनिवार्य बताया गया है। जमीनी स्तर पर इस देशव्यापी अभियान को गति देने और नेतृत्व करने की मुख्य जिम्मेदारी जिला कलेक्टरों (DM/DC) को सौंपी गई है।



जन-आंदोलन बनेगा शैक्षिक समावेशन

योजना के औपचारिक शुभारंभ से पहले आवश्यक प्रारंभिक गतिविधियों को पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के फैसिलिटेटर्स का नामांकन, बच्चों के लिए स्टार्टर किट का वितरण, प्रारंभिक सर्वेक्षण और शुरुआती दाखिले की प्रक्रिया जल्द पूरी की जाएगी।



बैठक में उपस्थित एनआईओएस (NIOS) के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती उन बच्चों को ढूंढना और उन तक पहुंचना है, जो पूरी तरह से शिक्षा प्रणाली से कट चुके हैं। उन्होंने इस मुहिम को शैक्षिक समावेशन का एक 'जन-आंदोलन' करार दिया, जो मुक्त और दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) के लचीले माध्यमों से बच्चों और युवाओं को सीखने के नए अवसर प्रदान करेगा। इस पायलट प्रोजेक्ट के परिणाम देखने के बाद, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय चरणबद्ध तरीके से देश के अन्य जिलों में भी इस योजना का विस्तार करेगा।



निष्कर्ष

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की यह पायलट योजना स्कूली शिक्षा के स्तर को सुधारने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। छत्तीसगढ़ सहित प्रभावित राज्यों में 14 से 18 वर्ष के बच्चों को कौशल विकास और दूरस्थ शिक्षा से जोड़कर, न केवल ड्रॉपआउट दर में कमी आएगी बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित होगा।



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