रीएजेंट घोटाले में तीन कंपनियों ने मिलकर बनाया कार्टेल, 27 दिन में एक ही कंपनी को मिले 750 करोड़ के ऑर्डर
Raipur : CGMSC Scam :छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित हमर लैब योजना से जुड़े सीजीएमएससी (छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन) घोटाले में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने जांच का दायरा और बढ़ाते हुए सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश की है।
इस नई चार्जशीट में चार और आरोपियों को शामिल किया गया है। जिससे अब तक इस मामले में कुल आरोपियों की संख्या 10 हो गई है। जांच एजेंसी ने अदालत को बताया है कि इस कथित घोटाले में राज्य के खजाने को लगभग 550 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।
यह घोटाला राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी हमर लैब योजना से जुड़ा है। जिसके तहत सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सस्ती और सुलभ जांच सुविधाएं उपलब्ध कराना था।
लेकिन जांच में सामने आया है कि इस योजना के तहत मेडिकल उपकरण, रिएजेंट्स और अन्य मेडिकल एक्यूपमेंट की खरीद में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गईं।
टेंडर प्रक्रिया में मिलीभगत
ACB की जांच में खुलासा हुआ है कि उपकरणों और सामग्रियों की खरीद के लिए जारी किए गए टेंडर में प्रतिस्पर्धा को खत्म करने के लिए कार्टेल जैसी व्यवस्था बनाई गई थी।
जांच एजेंसी के अनुसार तीन कंपनियों ने आपस में मिलकर बोली लगाई और एक जैसे उत्पाद विवरण, पैक साइज और दरें पेश कीं। इतना ही नहीं इन कंपनियों ने अपनी पात्रता साबित करने के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया।
इससे वास्तविक प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई और टेंडर प्रक्रिया प्रभावित हुई। जांच में सामने आया है कि तीन प्रमुख कंपनियों मोक्षित कॉर्पोरेशन, रिकॉर्डर्स एंड मेडिकेयर सिस्टम्स और श्री शारदा इंडस्ट्रीज ने मिलकर एक सिंडिकेट बनाया था।
इन कंपनियों ने मिलीभगत कर एक जैसे रेट और पैटर्न के साथ टेंडर भरे ताकि प्रतिस्पर्धा को खत्म किया जा सके और ठेके हासिल किए जा सकें। चिकित्सा उपकरणों और रिएजेंट्स को उनकी वास्तविक बाजार दर से तीन गुना या उससे भी अधिक कीमतों पर खरीदा गया।
एक जैसी जानकारी
जांच में यह भी सामने आया है कि जिन उत्पादों का स्पष्ट विवरण टेंडर दस्तावेजों में नहीं दिया गया था, उन्हें भी इन कंपनियों ने लगभग एक ही पैटर्न में प्रस्तुत किया। इससे यह संकेत मिलता है कि पूरी प्रक्रिया पूर्व नियोजित तरीके से
संचालित की गई थी। ACB का कहना है कि इस तरह की गतिविधियों से यह साफ होता है कि टेंडर प्रक्रिया को निष्पक्ष रखने के बजाय कुछ चुनिंदा कंपनियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई।
तीन गुना तक बढ़ी कीमतें
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन रिएजेंट्स और उपभोग सामग्रियों की आपूर्ति की गई उनकी कीमतें वास्तविक बाजार मूल्य से दो से तीन गुना तक अधिक बताई गई हैं।
उदाहरण के लिए, 8 रुपए में मिलने वाली EDTA ट्यूब 352 रुपए में और 5 लाख की CBS मशीन 1 लाख से भी अधिक के अंतर पर खरीदी गई।
ACB के मुताबिक इसी वजह से राज्य सरकार को करीब 550 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ। इस मामले में यह भी आरोप है कि करीब 750 करोड़ रुपए के ऑर्डर बेहद कम समय सिर्फ 27 दिनों के भीतर एक ही कंपनी को दे दिए गए। जांच में यह भी सामने आया है
कि उस समय इन किट्स और उपकरणों की तत्काल आवश्यकता भी स्पष्ट नहीं थी फिर भी इतनी बड़ी मात्रा में खरीद की गई। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ऐसे रिएजेंट भेजे गए जहां उनका उपयोग करने वाली मशीनें ही उपलब्ध नहीं थीं।
शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
यह मामला दिसंबर 2024 में तब सुर्खियों में आया, जब पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), केंद्रीय गृह मंत्रालय, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को इस घोटाले की शिकायत भेजी थी।
शिकायत के बाद आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) को जांच के निर्देश दिए गए थे। ACB ने स्पष्ट किया है कि हमर लैब योजना के तहत सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के सभी पहलुओं की जांच अभी जारी है।
एजेंसी का कहना है कि जैसे-जैसे नए साक्ष्य सामने आएंगे, वैसे-वैसे और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। जांच एजेंसी ने 3,500 पन्नों का पूरक चालान पेश किया है।
जिसमें अभिषेक कौशल, राकेश जैन, प्रिंस जैन और कुंजल शर्मा जैसे आरोपियों के नाम शामिल हैं। इस पूरे मामले ने राज्य की स्वास्थ्य योजनाओं और सरकारी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले समय में इस घोटाले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
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