छत्तीसगढ़ में 100 करोड़ की गिरदावरी परियोजना पर सवाल, कंपनी ने अधूरा छोड़ा काम, एप डाउनलोड करने पर सुरक्षा चेतावनी
Umeshwari Baghel | Oct 20, 2026, 11:24 IST
धान के रकबे पर डिजिटल संकट
Girdawari Project Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ में फसलों की डिजिटल गिरदावरी परियोजना विवादों में घिर गई है। करीब 100 करोड़ रुपए की परियोजना लेने वाली कंपनी पर काम अधूरा छोड़ने का आरोप है। अब फसलों के सर्वे की जिम्मेदारी पटवारियों को सौंपी गई है। दूसरी ओर सर्वे के लिए इस्तेमाल होने वाले एप की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं।
एप डाउनलोड करने पर हानिकारक सॉफ्टवेयर की चेतावनी मिलने की शिकायत है। सर्वर की खराबी से फसलों का सत्यापन भी प्रभावित हो रहा है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने फसलों के भौतिक सत्यापन के लिए डिजिटल व्यवस्था तैयार करने की योजना बनाई थी। इसके तहत राजस्व विभाग ने करीब दो साल पहले निविदा जारी की थी।
यह काम रामटेक सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस को सौंपा गया था। परियोजना की लागत करीब 100 करोड़ रुपए बताई गई है।इस व्यवस्था से खेतों में बोई गई फसलों का सही आंकड़ा जुटाया जाना था। खासकर धान की खेती के वास्तविक रकबे का पता लगाना इसका प्रमुख उद्देश्य था।
हालांकि परियोजना शुरू होने के बाद से ही इसके संचालन पर सवाल उठने लगे। आरोप है कि संबंधित कंपनी एक साल भी काम पूरा नहीं कर सकी। इसके बाद कंपनी ने परियोजना अधूरी छोड़ दी।
डिजिटल गिरदावरी के लिए पहले कंपनी के माध्यम से सर्वे कराया जा रहा था। अब यही जिम्मेदारी राजस्व विभाग के पटवारियों को दी गई है। पटवारियों और सर्वेयरों को पीबीएफ (फिजिकल वेरिफिकेशन) एप से फसलों का सत्यापन करना है। इसके लिए खेतों में जाकर जरूरी जानकारी दर्ज करनी होगी।
लेकिन एप से जुड़ी तकनीकी परेशानियां सामने आ रही हैं। इससे मैदानी कर्मचारियों के लिए सर्वे पूरा करना मुश्किल हो रहा है।
गिरदावरी परियोजना में सबसे गंभीर सवाल एप की सुरक्षा को लेकर उठ रहे हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि एप गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध नहीं है। इसके बजाय पटवारियों को निजी लिंक से एप डाउनलोड करने के निर्देश दिए जा रहे हैं।
शिकायतों के मुताबिक एप डाउनलोड करते समय हानिकारक सॉफ्टवेयर की चेतावनी दिखाई देती है। इससे एप की सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ गई है। हालांकि केवल ऐसी चेतावनी मिलने से एप का वास्तव में हानिकारक होना साबित नहीं होता। इसके लिए तकनीकी सुरक्षा जांच जरूरी है।
पीबीएफ एप के संचालन में लगातार तकनीकी दिक्कतें सामने आने की शिकायतें हैं। कर्मचारियों के मुताबिक सर्वर बार-बार काम करना बंद कर देता है। कई बार खेतों की तस्वीरें अपलोड नहीं हो पाती हैं। इसके अलावा खेत की लोकेशन दर्ज करने में भी परेशानी होती है।
इन समस्याओं से सर्वे के काम में देरी हो रही है। कर्मचारियों को एक ही जानकारी दर्ज करने के लिए बार-बार प्रयास करना पड़ता है। इससे डिजिटल गिरदावरी के आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
डिजिटल सर्वे के दौरान कर्मचारियों को खेत की सटीक भौगोलिक स्थिति दर्ज करनी है। इसके लिए खेत की चारों दिशाओं के अक्षांश और देशांतर की जानकारी मांगी गई है।
सर्वे में किसान की फसल से जुड़ी दूसरी जानकारियां भी दर्ज करनी होंगी। इसमें धान की किस्म और बीज की खरीद का विवरण शामिल है। किसान ने धान का बीज कहां से खरीदा है, इसकी जानकारी भी देनी होगी। बीज के बोरे पर एक रेफरेंस नंबर दर्ज करने का निर्देश है।
इसी नंबर के आधार पर बीज से जुड़ी जानकारी का सत्यापन किया जाना है।
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी के लिए खेती के वास्तविक रकबे की जानकारी महत्वपूर्ण है। खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 में डिजिटल सर्वे के आंकड़ों का इस्तेमाल होना है।
इस प्रक्रिया से पता लगाया जाना है कि किस खेत में कितने क्षेत्रफल पर धान लगाया गया है।लेकिन एप की तकनीकी समस्याओं से सर्वे के आंकड़ों की सटीकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में सर्वे पूरा करने के साथ दर्ज जानकारी का सही सत्यापन भी जरूरी होगा।
राजस्व पटवारी संघ के अध्यक्ष भागवत साहू ने परियोजना को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पहले रामटेक कंपनी पीबीएफ एप के माध्यम से सर्वे कर रही थी। अब यही जिम्मेदारी पटवारियों को सौंप दी गई है।
उन्होंने कंपनी के काम अधूरा छोड़ने की जांच की मांग की है। साहू ने एप के प्ले स्टोर पर उपलब्ध नहीं होने पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि कर्मचारियों से असुरक्षित एप के जरिए काम कराया जा रहा है।
इस मामले में राजस्व विभाग का पक्ष अलग है। राजस्व विभाग के संचालक विनीत नंदनवार ने लगाए जा रहे आरोपों को गलत बताया है। उनका कहना है कि पटवारियों को सौंपे गए दायित्व पूरे करने चाहिए। इससे शासन का काम सुचारू रूप से संचालित हो सकेगा। हालांकि एप की सुरक्षा और कंपनी के अधूरे काम को लेकर विवाद बना हुआ है।
करीब 100 करोड़ रुपए की इस परियोजना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल कंपनी के अधूरे काम को लेकर है। इसके अलावा एप की तकनीकी समस्याएं भी कर्मचारियों की परेशानी बढ़ा रही हैं।
परियोजना के लिए तय शर्तों और कंपनी की जिम्मेदारियों की जांच की मांग उठ रही है। साथ ही एप की सुरक्षा जांच और सर्वर की समस्याएं दूर करना भी जरूरी माना जा रहा है।
अब देखना होगा कि राजस्व विभाग इन शिकायतों पर क्या कदम उठाता है। डिजिटल गिरदावरी की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना विभाग के सामने बड़ी चुनौती है।
दो साल पहले शुरू हुई थी परियोजना
यह काम रामटेक सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस को सौंपा गया था। परियोजना की लागत करीब 100 करोड़ रुपए बताई गई है।इस व्यवस्था से खेतों में बोई गई फसलों का सही आंकड़ा जुटाया जाना था। खासकर धान की खेती के वास्तविक रकबे का पता लगाना इसका प्रमुख उद्देश्य था।
हालांकि परियोजना शुरू होने के बाद से ही इसके संचालन पर सवाल उठने लगे। आरोप है कि संबंधित कंपनी एक साल भी काम पूरा नहीं कर सकी। इसके बाद कंपनी ने परियोजना अधूरी छोड़ दी।
कंपनी का काम अब पटवारियों के जिम्मे
लेकिन एप से जुड़ी तकनीकी परेशानियां सामने आ रही हैं। इससे मैदानी कर्मचारियों के लिए सर्वे पूरा करना मुश्किल हो रहा है।
एप डाउनलोड करने पर सुरक्षा चेतावनी
शिकायतों के मुताबिक एप डाउनलोड करते समय हानिकारक सॉफ्टवेयर की चेतावनी दिखाई देती है। इससे एप की सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ गई है। हालांकि केवल ऐसी चेतावनी मिलने से एप का वास्तव में हानिकारक होना साबित नहीं होता। इसके लिए तकनीकी सुरक्षा जांच जरूरी है।
सर्वर और फोटो अपलोड की परेशानी
इन समस्याओं से सर्वे के काम में देरी हो रही है। कर्मचारियों को एक ही जानकारी दर्ज करने के लिए बार-बार प्रयास करना पड़ता है। इससे डिजिटल गिरदावरी के आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
खेत की चारों दिशाओं की जानकारी जरूरी
सर्वे में किसान की फसल से जुड़ी दूसरी जानकारियां भी दर्ज करनी होंगी। इसमें धान की किस्म और बीज की खरीद का विवरण शामिल है। किसान ने धान का बीज कहां से खरीदा है, इसकी जानकारी भी देनी होगी। बीज के बोरे पर एक रेफरेंस नंबर दर्ज करने का निर्देश है।
इसी नंबर के आधार पर बीज से जुड़ी जानकारी का सत्यापन किया जाना है।
धान के वास्तविक रकबे का होना है आकलन
इस प्रक्रिया से पता लगाया जाना है कि किस खेत में कितने क्षेत्रफल पर धान लगाया गया है।लेकिन एप की तकनीकी समस्याओं से सर्वे के आंकड़ों की सटीकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में सर्वे पूरा करने के साथ दर्ज जानकारी का सही सत्यापन भी जरूरी होगा।
पटवारी संघ ने उठाए गंभीर सवाल
उन्होंने कंपनी के काम अधूरा छोड़ने की जांच की मांग की है। साहू ने एप के प्ले स्टोर पर उपलब्ध नहीं होने पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि कर्मचारियों से असुरक्षित एप के जरिए काम कराया जा रहा है।
राजस्व विभाग ने आरोपों को नकारा
अब परियोजना की जवाबदेही पर सवाल
परियोजना के लिए तय शर्तों और कंपनी की जिम्मेदारियों की जांच की मांग उठ रही है। साथ ही एप की सुरक्षा जांच और सर्वर की समस्याएं दूर करना भी जरूरी माना जा रहा है।
अब देखना होगा कि राजस्व विभाग इन शिकायतों पर क्या कदम उठाता है। डिजिटल गिरदावरी की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना विभाग के सामने बड़ी चुनौती है।
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