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Raipur. लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में भाजपा ने एक ऐसा दांव चला है, जिसने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। राज्यसभा के लिए लक्ष्मी वर्मा का नाम सामने आते ही यह साफ हो गया कि पार्टी सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक गणित को साधने की कोशिश में है। साथ ही यह मैसेज भी दे दिया है कि अब पुराने खिलाड़ियों की जरूरत नहीं है।
यह है जातिगत गणित
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आदिवासी चेहरे के रूप में पहले से मौजूद हैं। अब कुर्मी समाज से लक्ष्मी वर्मा को आगे कर भाजपा ने ओबीसी समीकरण को नई धार दी है। पार्टी के पास साहू समाज से अरुण साव पहले से बड़ा चेहरा हैं। सामान्य वर्ग में डॉ. रमन सिंह, किरणदेव और विजय शर्मा सक्रिय भूमिका में हैं।
सियासी आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में एसटी और एससी के अलावा ओबीसी वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है। जो दल ओबीसी को साथ रखता है, वही सत्ता तक पहुंचता है। कांग्रेस के राजनीतिक छत्तीसगढ़ियावाद को सबसे अधिक समर्थन कुर्मी समाज से मिलने की चर्चा रही है। ऐसे में भाजपा ने सीधे उसी सामाजिक आधार में सेंध लगाने की रणनीति बनाई है।
लंबा इंतजार, दिल्ली का साथ
लक्ष्मी वर्मा 2008 से लगातार विधानसभा टिकट की दावेदारी करती आ रही हैं। उनकी नजर बलौदाबाजार और भाटापारा विधानसभा पर रही है। भाटापारा में शिवरतन शर्मा का मजबूत प्रभाव होने से उनके लिए जगह नहीं बन सकी। बलौदाबाजार में भी समीकरण हर बार बदलते रहे।
2008 और 2013 में लक्ष्मी बघेल
2018 में तेसूलाल धुरंधर
2023 में टंकराम वर्मा को मौका मिला।
राजनीतिक गलियारों में यह भी माना जाता है कि बलौदाबाजार सीट के चयन में रमेश बैस का प्रभाव रहा। लक्ष्मी वर्मा रमेश बैस की सांसद प्रतिनिधि भी रह चुकी हैं, लेकिन इन्हें फिर भी मौका नहीं मिला।
महिला चेहरा, संघ पृष्ठभूमि
लक्ष्मी वर्मा महिला चेहरा हैं, निर्विवाद और किसी के भी गुट में नहीं मानी जाती हैं। संवेदनशील और विचारवान छवि के साथ संघ से जुड़ाव उन्हें संगठनात्मक मजबूती देता है। महिला आरक्षण और महतारी वंदन योजना जैसे मुद्दों पर वे भाजपा के एजेंडे को धार दे सकती हैं।
दिल्ली का फैसला, बड़ा मैसेज
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार राज्यसभा भेजने का निर्णय केंद्रीय नेतृत्व स्तर पर हुआ। चर्चा है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उनके नाम को आगे बढ़ाया है। एक तरह से विधानसभा की राजनीति में बार-बार समीकरणों में फिट न बैठ पाने वाली लक्ष्मी वर्मा के लिए अब दिल्ली के दरवाजे खुल गए हैं।
लक्ष्मी वर्मा के लिए यह लॉटरी हो सकती है, लेकिन भाजपा की सोची-समझी सामाजिक इंजीनियरिंग है, जिसमें स्थानीय समीकरण, महिला प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय संतुलन तीनों को साधने की कोशिश दिखती है।
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