सुशासन की फाइलों में कैद जनता की आवाज, पूरा होने की राह ताक रहीं 36 हजार अर्जियां, हर छटवें आदमी का आवेदन लंबित

Arun Tiwari | Feb 09, 2026, 16:53 IST
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छत्तीसगढ़ में सुशासन के दावे जितने ऊंचे हैं, जन शिकायत निवारण की जमीनी हकीकत उतनी ही भारी-भरकम फाइलों में दबी नजर आ रही है। हालात ऐसे हैं कि शिकायतकर्ता समाधान नहीं, बल्कि अपने आवेदन की खैर-खबर पूछता घूम रहा है। 36 हजार अर्जियां लंबित पड़ी हुई हैं।

News in Short:

  • फाइलों में बंद सुशासन
  • लंबित पड़ीं जनता की अर्जियां
  • 36 हजार आवेदन पेंडिंग
  • जन शिकायत निवारण पोर्टल पर आ रहीं शिकायतें

News in Detail:

हर छटवें आदमी की शिकायत लंबित:

छत्तीसगढ़ में सुशासन के दावों के बीच जनशिकायतों के निराकरण की रफ्तार सुस्त होती नजर आ रही है। लगातार प्रशासनिक कवायद के बावजूद आम लोगों की शिकायतें समय पर हल नहीं हो पा रही हैं।



जिससे जन शिकायत निवारण पोर्टल में लंबित आवेदनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि अब तक सरकार को 2 लाख 15 हजार 615 जनशिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से चौंकाने वाली बात यह है कि अब भी 36 हजार 314 शिकायतें समाधान के इंतज़ार में लंबित पड़ी हैं।



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यानी हर छठा शिकायतकर्ता आज भी जवाब की घड़ी ताक रहा है। जबकि जनशिकायत पोर्टल ही इसलिए बनाया गया था ताकि समस्या का समाधान तत्काल हो। वहीं डाक से आने वाले आवेदनों को भी प्राथमिकता पर रखने के निर्देश हैं।



सरकार भले ही सुशासन का दम भरे लेकिन हकीकत यह है कि शिकायतों के निपटारे की रफ्तार जनता की उम्मीदों से काफी पीछे चल रही है। शिकायत दर्ज कराना तो आसान हो गया, मगर उसका हल मिलना आज भी उतना ही मुश्किल बना हुआ है। कई मामलों में तो शिकायतकर्ता को यह भी पता नहीं कि उसकी अर्ज़ी किस टेबल पर धूल खा रही है।



ऑनलाइन से ज्यादा कागजी शिकायतें:

सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि डाक से आई शिकायतें प्रशासन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई हैं। आंकड़ों के अनुसार, लंबित शिकायतों में से 30,369 आवेदन डाक के माध्यम से प्राप्त हुए हैं। जबकि ऑनलाइन पोर्टल से आई लंबित शिकायतों की संख्या 6,099 है।



यानी डिजिटल युग में भी कागज़ी शिकायतें सिस्टम पर भारी पड़ रही हैं। जिलों की स्थिति भी कम चौंकाने वाली नहीं है। जहां नारायणपुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे जिलों में लंबित शिकायतों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, वहीं बेमेतरा, बिलासपुर, दुर्ग और सरगुजा जैसे जिलों में सैकड़ों शिकायतें अब भी लंबित हैं।



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इन जिलों में इतनी शिकायतें पेंडिंग:

सक्ती – 70


सूरजपुर – 71


धमतरी – 75


बलौदाबाजार-भाटापारा – 79


जशपुर – 84


सारंगढ़-बिलाईगढ़ – 93


बालोद – 98


जांजगीर-चांपा – 108


कबीरधाम – 110


रायगढ़ – 120


कोरबा – 143


महासमुंद – 132


सरगुजा – 443


दुर्ग – 517


बिलासपुर – 563


बेमेतरा – 737



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यहां सबसे कम शिकायतें लंबित:

नारायणपुर – 19


दंतेवाड़ा – 21


कोरिया – 25


सुकमा – 25


गौरेला-पेंड्रा-मरवाही – 29


गरियाबंद – 34



Knowledge:

जन शिकायत निवारण पोर्टल का मकसद जनता को त्वरित न्याय और राहत देना था, लेकिन मौजूदा हालात में यह पोर्टल खुद सुधार की मांग कर रहा है।



अगर शिकायतें समय पर हल नहीं हुईं, तो भरोसे का यह तंत्र धीरे-धीरे जनता की नजरों में कमजोर पड़ सकता है। यह पोर्टल समस्याओं के तत्काल समाधान के लिए बनाया था।



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important points:

  • जन शिकायत निवारण पोर्टल पर 36 हजार से ज्यादा आवेदन आज भी समाधान के इंतज़ार में।
  • सुशासन के दावों के बावजूद शिकायतों के निराकरण की रफ्तार सुस्त, हर छठा शिकायतकर्ता जवाब की राह देख रहा।
  • डाक से आई शिकायतें सिस्टम पर भारी—30 हजार से ज्यादा आवेदन लंबित, ऑनलाइन पोर्टल भी पीछे।
  • बेमेतरा, बिलासपुर, दुर्ग और सरगुजा जैसे जिलों में सैकड़ों शिकायतें अटकी, प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल।
  • पोर्टल बनाने से उम्मीद जगी, लेकिन समय पर समाधान न मिलने से जनता का भरोसा डगमगाने लगा।

अब आगे क्या:

अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इन लंबित शिकायतों को प्राथमिकता देकर समाधान करता है या फिर शिकायतों की यह लंबी कतार आने वाले समय में और लंबी होती चली जाएगी। फिलहाल तो जनता की आवाज़ फाइलों में कैद है और घड़ी की रेत लगातार फिसलती जा रही है।



निष्कर्ष:

विडंबना यह है कि जिन जिलों को सुशासन का मॉडल बताया जाता है, वहीं शिकायतों का अंबार लगा हुआ है। इससे यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सुशासन सिर्फ काग़ज़ों और मंचों तक ही सीमित रह गया है? या फिर जनता की शिकायतों को निपटाने की प्रक्रिया कहीं रास्ता भटक गई है।



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