कुर्क होगी डीजीपी और एसपी दफ्तर की संपत्ति, मुआवजा नहीं देने पर अदालत का आदेश
Arun Tiwari | Sept 07, 2026, 17:34 IST
डीजीपी और एसपी दफ्तर की संपत्ति होगी कुर्क
डीजीपी और एसपी दफ्तर की संपत्ति होगी कुर्क
छत्तीसगढ़ में पुलिस बस से दो युवकों की मौत के मामले में मुआवजा नहीं देने पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने DGP और कोरबा SP कार्यालय की संपत्ति कुर्क करने का आदेश दिया है।
छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक बार फिर डीजीपी समेत पूरे पुलिस मुख्यालय की कार्यवाही पर सवाल खड़े हो गए हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में मौत के मामले में छत्तीसगढ़ डीजीपी को अक्षम करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद डीजीपी से जुड़ा एक और मामला सामने आया है। यह मामला कोरबा का है जहां डीजीपी के नाम से दर्ज सरकारी वाहन की टक्कर से दो लोगों की मौत हो गई थी।
अदालत ने पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया था लेकिन पीड़ित को मुआवजा नहीं दिया गया। कोरबा की मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण अदालत ने मुआवजा राशि का भुगतान नहीं किए जाने पर पुलिस महानिदेशक (DGP) और कोरबा पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय की संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी किया है। यह मामला वर्ष 2023 में पुलिस विभाग की मिनी बस से हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे से जुड़ा है।
VIP ड्यूटी में लगी बस से हुआ था
अदालत के आदेश के बाद अब सवाल यह उठ रहा है कि जब न्यायालय ने मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने का स्पष्ट निर्देश दिया था, तो निर्धारित अवधि के भीतर भुगतान क्यों नहीं किया गया। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जिस वाहन से दुर्घटना हुई, वह डीजीपी के नाम रजिस्टर्ड था और अदालत के मुताबिक हादसे के समय उसका बीमा भी समाप्त हो चुका था।
पूरा मामला 27 सितंबर 2023 की शाम का है। रायगढ़ जिले के खरसिया थाना क्षेत्र में पिपरिया-परपोड़ी मुख्य मार्ग पर पुलिस विभाग की मिनी बस ड्यूटी पर तैनात थी। इसी दौरान बस की बाइक सवार दो युवकों से जोरदार टक्कर हो गई। हादसा इतना भीषण था कि बाइक सवार बैजनाथ कंवर की मौके पर ही मौत हो गई।
वहीं दूसरे युवक रवि यादव को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसने भी दम तोड़ दिया। घटना के बाद दोनों परिवारों पर आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा हो गया। मृतकों के परिजनों ने हादसे के लिए मुआवजे की मांग करते हुए कोरबा स्थित मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण की शरण ली। दोनों मृतकों के परिवारों की ओर से अलग-अलग प्रकरण दाखिल किए गए।
मामले की सुनवाई प्रथम अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, कोरबा में हुई। पीठासीन अधिकारी गरिमा शर्मा ने 14 जनवरी 2026 को दोनों मामलों में सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाया। अदालत ने दुर्घटना के लिए मिनी बस चालक की लापरवाही को जिम्मेदार माना। मामले में सामने आए तथ्यों के मुताबिक, दुर्घटनाग्रस्त वाहन पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ के नाम पर पंजीकृत था।
इसके अलावा हादसे के समय वाहन का बीमा भी समाप्त हो चुका था। वाहन का स्वामित्व पुलिस महानिदेशक के नाम पर होने और बीमा नहीं होने के कारण DGP और कोरबा SP को भी मामले में पक्षकार बनाया गया। अदालत ने मृतक बैजनाथ कंवर के आश्रितों को 26 लाख 9 हजार 200 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
इसके अलावा इस राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भी निर्देश दिया गया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि निर्धारित मुआवजा राशि आदेश के एक महीने के भीतर पीड़ित परिवार को उपलब्ध कराई जाए। यानी न्यायालय के आदेश के बाद भुगतान के लिए निश्चित समय सीमा भी तय की गई थी। लेकिन पीड़ित पक्ष का आरोप है कि निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी उन्हें मुआवजे की राशि नहीं मिली। आदेश के बाद पांच महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद भुगतान नहीं होने पर मृतकों के परिजनों को एक बार फिर अदालत का रुख करना पड़ा।
पीड़ित पक्ष की ओर से अदालत के आदेश की जानकारी पुलिस महानिदेशक कार्यालय तक पहुंचाए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद मुआवजा राशि का भुगतान नहीं होने पर पीड़ित परिवार ने अपने अधिवक्ताओं के माध्यम से वसूली की कानूनी प्रक्रिया शुरू की। यहीं से मामला और गंभीर हो गया।
सामान्य तौर पर अदालत द्वारा तय मुआवजा राशि का भुगतान संबंधित पक्ष की जिम्मेदारी होती है। लेकिन जब तय समय सीमा में राशि नहीं मिली, तो पीड़ित पक्ष को न्यायालय से दोबारा गुहार लगानी पड़ी।
मुआवजा राशि का भुगतान नहीं होने पर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, कोरबा ने अब सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने DGP और कोरबा SP कार्यालय की संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी किया है।
अदालत की यह कार्रवाई पुलिस विभाग के लिए असहज स्थिति पैदा करने वाली है। जिस विभाग की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया के पालन को सुनिश्चित करने की होती है, उसी विभाग से जुड़ी संपत्ति पर अदालत ने कुर्की की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस विभाग की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला सवाल वाहन के बीमा को लेकर है। अगर वाहन पुलिस विभाग के नाम पर पंजीकृत था और VIP ड्यूटी में इस्तेमाल हो रहा था, तो उसके बीमा की वैधता समाप्त होने के बावजूद उसका संचालन कैसे जारी रहा। दूसरा सवाल अदालत के आदेश के अनुपालन को लेकर है।
जब न्यायालय ने मुआवजा राशि और ब्याज तय करते हुए एक महीने के भीतर भुगतान का निर्देश दिया था, तो पांच महीने से ज्यादा समय तक भुगतान क्यों लंबित रहा। तीसरा और सबसे अहम सवाल यह है कि पीड़ित परिवार को अपने हक की राशि पाने के लिए दोबारा अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा।
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हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में मौत के मामले में छत्तीसगढ़ डीजीपी को अक्षम करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद डीजीपी से जुड़ा एक और मामला सामने आया है। यह मामला कोरबा का है जहां डीजीपी के नाम से दर्ज सरकारी वाहन की टक्कर से दो लोगों की मौत हो गई थी।
अदालत ने पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया था लेकिन पीड़ित को मुआवजा नहीं दिया गया। कोरबा की मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण अदालत ने मुआवजा राशि का भुगतान नहीं किए जाने पर पुलिस महानिदेशक (DGP) और कोरबा पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय की संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी किया है। यह मामला वर्ष 2023 में पुलिस विभाग की मिनी बस से हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे से जुड़ा है।
VIP ड्यूटी में लगी बस से हुआ था हादसा :
पूरा मामला 27 सितंबर 2023 की शाम का है। रायगढ़ जिले के खरसिया थाना क्षेत्र में पिपरिया-परपोड़ी मुख्य मार्ग पर पुलिस विभाग की मिनी बस ड्यूटी पर तैनात थी। इसी दौरान बस की बाइक सवार दो युवकों से जोरदार टक्कर हो गई। हादसा इतना भीषण था कि बाइक सवार बैजनाथ कंवर की मौके पर ही मौत हो गई।
वहीं दूसरे युवक रवि यादव को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसने भी दम तोड़ दिया। घटना के बाद दोनों परिवारों पर आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा हो गया। मृतकों के परिजनों ने हादसे के लिए मुआवजे की मांग करते हुए कोरबा स्थित मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण की शरण ली। दोनों मृतकों के परिवारों की ओर से अलग-अलग प्रकरण दाखिल किए गए।
अदालत ने चालक की लापरवाही मानी :
इसके अलावा हादसे के समय वाहन का बीमा भी समाप्त हो चुका था। वाहन का स्वामित्व पुलिस महानिदेशक के नाम पर होने और बीमा नहीं होने के कारण DGP और कोरबा SP को भी मामले में पक्षकार बनाया गया। अदालत ने मृतक बैजनाथ कंवर के आश्रितों को 26 लाख 9 हजार 200 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
इसके अलावा इस राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भी निर्देश दिया गया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि निर्धारित मुआवजा राशि आदेश के एक महीने के भीतर पीड़ित परिवार को उपलब्ध कराई जाए। यानी न्यायालय के आदेश के बाद भुगतान के लिए निश्चित समय सीमा भी तय की गई थी। लेकिन पीड़ित पक्ष का आरोप है कि निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी उन्हें मुआवजे की राशि नहीं मिली। आदेश के बाद पांच महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद भुगतान नहीं होने पर मृतकों के परिजनों को एक बार फिर अदालत का रुख करना पड़ा।
आदेश की जानकारी देने के बाद भी भुगतान नहीं :
सामान्य तौर पर अदालत द्वारा तय मुआवजा राशि का भुगतान संबंधित पक्ष की जिम्मेदारी होती है। लेकिन जब तय समय सीमा में राशि नहीं मिली, तो पीड़ित पक्ष को न्यायालय से दोबारा गुहार लगानी पड़ी।
DGP-SP कार्यालय की संपत्ति कुर्क करने के निर्देश :
अदालत की यह कार्रवाई पुलिस विभाग के लिए असहज स्थिति पैदा करने वाली है। जिस विभाग की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया के पालन को सुनिश्चित करने की होती है, उसी विभाग से जुड़ी संपत्ति पर अदालत ने कुर्की की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल :
जब न्यायालय ने मुआवजा राशि और ब्याज तय करते हुए एक महीने के भीतर भुगतान का निर्देश दिया था, तो पांच महीने से ज्यादा समय तक भुगतान क्यों लंबित रहा। तीसरा और सबसे अहम सवाल यह है कि पीड़ित परिवार को अपने हक की राशि पाने के लिए दोबारा अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा।
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