छत्तीसगढ़ में ई-ऑफिस का हालः समाधान के बजाय पार्क कर रहे फाइल

VINAY VERMA | Jun 24, 2026, 13:36 IST
छत्तीसगढ़ में ई-ऑफिस फाइल विवाद
ई-ऑफिस से फाइलों की पेंडेंसी खत्म करने का दावा करने वाली सरकार अब पेंडिंग फाइलों को पार्क करने की व्यवस्था लेकर आई है। सवाल यह है कि फाइलें निपटेंगी या सिर्फ आंकड़ों से गायब कर दी जाएंगी?

समझें क्या है पूरा मामला

  • पेंडिंग फाइलें छिपाने के लिए पार्क सिस्टम
  • निपटारा नहीं, फाइलों की नई पार्किंग व्यवस्था
  • पेंडेंसी घटेगी, लेकिन फाइलें वहीं अटकी रहेंगी
  • विभागों की रैंकिंग और इनाम पर पड़ेगा असर
  • ई-ऑफिस की पारदर्शिता पर उठे नए सवाल

छत्तीसगढ़ सरकार ने कभी ई-ऑफिस को प्रशासनिक क्रांति बताया था। दावा किया गया था कि अब फाइलें दबेंगी नहीं, हर स्तर पर जवाबदेही तय होगी और पेंडेंसी पर लगाम लगेगी। लेकिन अब जो आदेश सामने आया है, उसने पूरे सिस्टम की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। फाइलों का निपटारा करने के बजाय उन्हें पार्क करने का रास्ता निकाल लिया गया है। यानी समस्या खत्म नहीं होगी, सिर्फ दिखाई नहीं देगी।



पेंडिंग नहीं दिखेगी, सब अच्छा दिखेगा!

सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने नया आदेश जारी कर ई-ऑफिस में "पार्क" विकल्प के उपयोग की व्यवस्था बनाई है। इसका मतलब यह है कि जिन फाइलों पर तत्काल निर्णय नहीं लेना है या जिन्हें किसी कारण से रोका गया है, उन्हें पेंडिंग सूची में रखने के बजाय पार्क फोल्डर में डाल दिया जाएगा।



अवर सचिव और उससे ऊपर के अधिकारी तीन दिन तक फाइल पार्क कर सकेंगे। अन्य कर्मचारी दो दिन तक ऐसा कर सकेंगे। इससे ज्यादा समय तक फाइल रोकनी हो तो वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति लेनी होगी। सवाल यह है कि यदि फाइल पर कार्रवाई नहीं हो रही तो उसे पेंडिंग कहने में दिक्कत क्या है?



पेंडेंसी कम करने का तरीका?

सरकारी दफ्तरों में कई फाइलें नीतिगत निर्णय, प्रशासनिक प्राथमिकता या अधिकारियों की अनिच्छा के कारण लंबे समय तक अटकी रहती हैं। ई-ऑफिस लागू होने के बाद ऐसी फाइलें सिस्टम में पेंडिंग दिखाई देने लगी थीं। इससे यह भी स्पष्ट होने लगा था कि फाइल निपटारे की रफ्तार उतनी तेज नहीं है, जितनी बताई जाती है।



अब पार्क व्यवस्था के जरिए वही फाइलें पेंडिंग सूची से बाहर दिखाई देंगी। यानी बीमारी जस की तस रहेगी, लेकिन रिपोर्ट कार्ड स्वस्थ दिखेगा।



ई-ऑफिस का दावा था पारदर्शिता

जब ई-ऑफिस लागू किया गया था, तब सबसे बड़ा तर्क यही दिया गया था कि कोई भी अधिकारी फाइल दबाकर नहीं रख सकेगा। यदि फाइल लंबित रहेगी तो कारण दर्ज करना होगा। पूरी प्रक्रिया ट्रैक होगी और जवाबदेही तय होगी।





लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि जब फाइल रोकने का कारण वैध है तो उसे दर्ज क्यों नहीं किया जाता? अलग फोल्डर बनाकर उसे सिस्टम की नजरों से दूर करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है? क्या पारदर्शिता का दावा अब खुद सरकारी आदेशों के बोझ तले दबने लगा है?



इनाम की राह में पेंडेंसी थी बाधा!

ई-ऑफिस व्यवस्था (E-office system) लागू होने के साथ मुख्य सचिव स्तर पर प्रोत्साहन योजना भी शुरू की गई थी। हर महीने उन विभागों को सम्मानित किया जाता है जो फाइलों का तेजी से निपटारा करते हैं और बेहतर प्रदर्शन करते हैं।



लेकिन कई विभागों में नीतिगत या प्रशासनिक कारणों से फाइलें लंबित रहती थीं। यही पेंडिंग फाइलें पुरस्कार की दौड़ में रोड़ा बन रही थीं। अब पार्क व्यवस्था आने के बाद पेंडेंसी का आंकड़ा कम दिखाई देगा और विभागों की रैंकिंग भी सुधर सकती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि व्यवस्था फाइल निपटाने के लिए बनी है या आंकड़े चमकाने के लिए?



फाइल एडिट और क्लोजर भी आसान

नए आदेश में फाइलों के विषय में संशोधन और क्लोजर की प्रक्रिया भी सरल की गई है। जिस आईडी से फाइल शुरू होगी, वह उसे एडिट कर सकेगी। अनुभाग अधिकारी और अधीनस्थ कर्मचारी भी विषय को संशोधित कर सकेंगे।



वहीं, जिन फाइलों पर आगे कार्रवाई अपेक्षित नहीं होगी, उन्हें क्लोज किया जा सकेगा। हालांकि जरूरत पड़ने पर ऐसी फाइलों को दोबारा खोला भी जा सकेगा।



असली सवाल अभी भी बाकी

सरकार कह सकती है कि यह सिर्फ प्रशासनिक सुविधा का उपाय है। लेकिन विपक्ष, कर्मचारी संगठनों और प्रशासनिक जानकारों के लिए सवाल अलग है। यदि फाइलों का निपटारा नहीं हो रहा और उन्हें केवल दूसरी श्रेणी में डाल दिया जा रहा है, तो क्या इससे शासन की कार्यक्षमता बढ़ जाएगी? या फिर यह सिर्फ पेंडेंसी के आंकड़ों को सुंदर बनाने का नया प्रयोग है?



ई-ऑफिस का उद्देश्य फाइलों को ट्रैक करना था, छिपाना नहीं। अब देखना यह है कि "पार्क" व्यवस्था प्रशासनिक सुधार साबित होती है या फिर पेंडेंसी की नई पार्किंग।



निष्कर्ष

ई-ऑफिस को पारदर्शिता और जवाबदेही का हथियार बताया गया था, लेकिन "पार्क" व्यवस्था ने यह बहस छेड़ दी है कि सरकार फाइलें निपटाना चाहती है या पेंडेंसी के आंकड़े छिपाना। यदि समस्या का समाधान फाइलों को दूसरे फोल्डर में डालना है, तो फिर ई-गवर्नेंस के बड़े दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना तय है।





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