बेटे की मौत के बाद बीमा कंपनी से अकेले भिड़े पिता, अब मिला 1 करोड़ 21 लाख

Aishwarya Dwivedi | May 29, 2026, 12:56 IST
father-fights-insurance-company-after-son-death
रायपुर के अरविंद सेलारका ने फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर क्लेम खारिज करने वाली बीमा कंपनी के खिलाफ 16 साल कानूनी लड़ाई लड़ी। राष्ट्रीय आयोग ने कंपनी को 1 करोड़ 21 लाख भुगतान का आदेश दिया।

रायपुर के एक परिवार ने बेटे को खोने के दर्द के साथ 16 साल लंबी कानूनी लड़ाई भी लड़ी। इस लड़ाई में आखिरकार परिवार को जीत मिली। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बिरला सन लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को बड़ा आदेश दिया है। कंपनी को मृतक सौरभ सेलारका के परिवार को ब्याज सहित 1 करोड़ 21 लाख 72 हजार रुपए देने होंगे। फैसले के बाद कंपनी ने परिवार के खाते में 98 लाख 46 हजार रुपए जमा भी करा दिए हैं।



2009 में ली थी ड्रीम प्लान पॉलिसी

रायपुर निवासी सौरभ सेलारका ने साल 2009 में बिरला सन लाइफ इंश्योरेंस कंपनी से “ड्रीम प्लान” पॉलिसी खरीदी थी। पॉलिसी 48 लाख 92 हजार रुपए की थी। 8 महीने तक किस्त भी जमा किए गए। लेकिन 2 दिसंबर 2009 को हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई। बेटे की मौत के बाद परिवार ने बीमा क्लेम के लिए आवेदन किया, लेकिन यहीं से संघर्ष शुरू हो गया।



आरोप लगाकर ठुकराया क्लेम

मार्च 2010 में बीमा कंपनी ने दावा खारिज कर दिया। कंपनी का कहना था कि सौरभ ने पॉलिसी लेते समय अपनी बीमारी की जानकारी छिपाई थी। कंपनी ने आरोप लगाया कि सौरभ हाई ब्लड प्रेशर और वर्टिगो जैसी बीमारी का इलाज करा रहे थे। साथ ही आय को लेकर भी गलत जानकारी देने की बात कही गई।



पेश किया गया फर्जी सर्टिफिकेट

मामले में सबसे बड़ा खुलासा राष्ट्रीय आयोग की सुनवाई के दौरान हुआ। जिस डॉक्टर के सर्टिफिकेट के आधार पर कंपनी ने क्लेम खारिज किया था, उसी डॉक्टर ने शपथ पत्र देकर कहा कि उन्होंने कभी सौरभ सेलारका का इलाज नहीं किया था। डॉक्टर ने बताया कि बीमा कंपनी का जांचकर्ता खुद को सौरभ बताकर उनके पास पहुंचा था और फर्जी तरीके से मेडिकल सर्टिफिकेट हासिल किया गया था।



फिर दिल्ली में शुरू हुई नई लड़ाई

बीमा कंपनी के दस्तावेजों के आधार पर छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 2014 में परिवार की शिकायत खारिज कर दी थी। आयोग ने माना था कि सौरभ ने बीमारी छिपाई थी। लेकिन पिता अरविंद सेलारका ने हार नहीं मानी। उन्होंने दिल्ली स्थित राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में अपील की।



13 साल तक दिल्ली में लड़ते रहे केस

अरविंद सेलारका ने बताया कि राज्य आयोग से हार मिलने के बाद उन्होंने दिल्ली में अपील की। वहां करीब 13 साल तक कानूनी लड़ाई चली। इस दौरान उन्होंने लगातार दस्तावेज और सबूत जुटाए। आखिरकार राष्ट्रीय आयोग ने पूरे मामले की दोबारा सुनवाई की और बीमा कंपनी की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए।



कंपनी ने अपनाए अनैतिक तरीकेः आयोग

राष्ट्रीय आयोग ने अपने फैसले में कहा कि बीमा कंपनी ने क्लेम खारिज करने के लिए संदिग्ध और अविश्वसनीय तरीकों का इस्तेमाल किया। आयोग ने इसे अनैतिक आचरण माना। आयोग ने साफ कहा कि कंपनी यह साबित नहीं कर पाई कि मृतक को पहले से कोई गंभीर बीमारी थी। केवल बीमा राशि अधिक होने के आधार पर संदेह करना उचित नहीं था।



2010 से ब्याज जोड़कर देने होंगे पैसे

राष्ट्रीय आयोग ने 11 मार्च 2026 को दिए फैसले में बीमा कंपनी को पूरी बीमा राशि के साथ 4 मार्च 2010 से भुगतान की तारीख तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया। इसके बाद कुल राशि 1 करोड़ 21 लाख 72 हजार रुपए पहुंच गई। कंपनी ने अब तक परिवार को 98 लाख 46 हजार रुपए का भुगतान कर दिया है।



नहीं टूटा पिता का हौसला

अरविंद सेलारका ने कहा कि बेटे को खोने का दुख सबसे बड़ा था। लेकिन उसके बाद बीमा कंपनी के रवैये ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया। उन्होंने कहा कि अगर वे हार मान लेते तो शायद कभी न्याय नहीं मिल पाता। उन्होंने लोगों से अपील की कि बड़ी कंपनियों के दबाव में आकर समझौता न करें।



अगर सही हैं तो अंत तक लड़िए

अरविंद सेलारका ने कहा, “अगर आप सही हैं तो अंत तक लड़िए। बड़ी कंपनियों के सामने झुकिए मत। अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाइए। न्याय देर से मिला, लेकिन मिला जरूर।”



उपभोक्ता अधिकारों की लड़ाई बनी मिसाल

यह मामला अब उपभोक्ता अधिकारों और बीमा कंपनियों की जवाबदेही से जुड़ा बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। फैसले ने साफ संदेश दिया है कि गलत तरीके से क्लेम खारिज करने वाली कंपनियों पर कार्रवाई हो सकती है और पीड़ित परिवार लंबी लड़ाई के बाद भी न्याय हासिल कर सकता है।



TIMELINE

  • 2009: सौरभ सेलारका ने बिरला सन लाइफ से 48 लाख 92 हजार की "ड्रीम प्लान" पॉलिसी ली।
  • 2 दिसंबर 2009: हार्ट अटैक से सौरभ की दुखद मौत।
  • मार्च 2010: बीमा कंपनी ने बीमारी छिपाने का आरोप लगाकर क्लेम खारिज किया।
  • 2014: छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग ने कंपनी के दस्तावेजों के आधार पर परिवार की शिकायत खारिज की।
  • 2014–2026: पिता अरविंद सेलारका ने हार नहीं मानी; दिल्ली राष्ट्रीय आयोग में अपील की और 13 साल केस लड़ा।
  • सुनवाई के दौरान: खुलासा हुआ कि बीमा कंपनी ने फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया था।
  • 11 मार्च 2026: राष्ट्रीय आयोग ने कंपनी के तरीके को अनैतिक माना और ब्याज सहित भुगतान का ऐतिहासिक आदेश दिया।
  • नतीजा: परिवार को 1 करोड़ 21 लाख का इंसाफ मिला

निष्कर्ष

यह मामला साबित करता है कि कॉर्पोरेट जगत के अन्याय के खिलाफ अगर सच्चाई और दृढ़ संकल्प के साथ लड़ा जाए, तो जीत निश्चित है। 16 साल लंबा संघर्ष और 1 करोड़ 21 लाख का ऐतिहासिक फैसला बीमा कंपनियों की मनमानी पर बड़ा प्रहार है। यह उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों



यह खबरें भी पढ़ें...

विधवा को 9 साल 4 महीने दर‑दर भटकाया, अब उपभोक्ता आयोग ने LIC पर लगाया जुर्माना



क्रेडिट कार्ड और लोन वसूली के दौरान धमकी मिले तो उपभोक्ता के पास हैं ये अधिकार



LIC ग्राहकों के लिए बड़ी खबर, क्लेम खारिज करने पर उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला



रायपुर के मॉल्स में अब नहीं देने पड़ेंगे पार्किंग के पैसे, उपभोक्ता फोरम ने लगाई रोक



Tags:
  • छत्तीसगढ़
  • रायपुर
  • उपभोक्ता
  • मेडिकल
  • बीमा कंपनी