सरकार ने उद्योग लगाने के लिए कर दिया जंगल की जमीन का डायवर्सन, 18 इंडस्ट्री को दी 2200 एकड़ वन भूमि, 25 फीसदी जिंदल को
Raipur. छत्तीसगढ़ उन राज्यों में शुमार है जहां सबसे ज्यादा और घना फॉरेस्ट है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इन जंगलों के बीच में ही उद्योग खोल दिए हैं। सरकार ने 18 उद्योगों के लिए वन भूमि का डायवर्सन कर दिया है। पिछले 20 सालों में सरकार ने इंडस्ट्री लगाने के लिए 2200 एकड़ वन भूमि इन उद्योगपतियों के हवाले कर दी है।
इनमें सबसे ज्यादा जमीन जिंदल ग्रुप (jindal group) को दी गई है। अकेले जिंदल के पास 25 फीसदी से ज्यादा फॉरेस्ट लैंड है। एक तरफ आदिवासियों का विरोध चल रहा है तो दूसरी तरफ सरकार उद्योगपतियों को जंगल में मंगल करा रही है। यह सब काम बीजेपी सरकार के कार्यकाल में ही हुआ है। यह सारी जानकारी सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है।
बीजेपी सरकार में फॉरेस्ट लैंड का डायवर्सन:
छत्तीसगढ़ में बीते दो दशकों में औद्योगिक विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर वन भूमि का डायवर्सन किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य सरकार ने पिछले लगभग 20 वर्षों में 18 उद्योगों को 2200 एकड़ फॉरेस्ट लैंड आवंटित की है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा हिस्सा एक ही औद्योगिक समूह जिंदल को मिला है जिसे कुल जमीन का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा यानी 600 एकड़ वन भूमि दी गई। इन 18 में से 17 उद्योगों को रमन सरकार में वन भूमि दी गई। 1 उद्योग को साल 2024 में वन भूमि का डायवर्सन किया गया।
इन इंडस्ट्री की इन फॉरेस्ट एरिया में जमीन :
जिंदल पॉवर लिमिटेड - रायगढ़ - 177.542 हेक्टेयर
जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड - रायगढ़ - 3.461 हेक्टेयर
जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड - रायगढ़ - 30.62 हेक्टेयर
छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल - कटघोरा - 111.761 हेक्टेयर
छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल - कटघोरा - 83.494 हेक्टेयर
नेशनल थर्मल पॉवर कार्पोरेशन - कटघोरा - 85.514 हेक्टेयर
एसटीसीएलआई लिमिटेड - कटघोरा - 0.931 हेक्टेयर
प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड - जांजगीर चांपा - 39.25 हेक्टेयर
कोरबा वेस्ट पॉवर कंपनी - रायगढ़ - 24.352 हेक्टेयर
श्याम इस्पात प्रायवेट लिमिटेड - रायगढ़ - 0.86 हेक्टेयर
केएसके महानदी पॉवर प्रोजेक्ट - जांजगीर चांपा - 0.387 हेक्टेयर
नेशनल थर्मल पॉवर कार्पोरेशन - रायगढ़ - 151.762 हेक्टेयर
केएसके पॉवर प्रोजेक्ट - रायगढ़ - 12.938 हेक्टेयर
भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड - कोरबा - 17.245 हेक्टेयर
अथेना छत्तीसगढ़ पॉवर प्रोजेक्ट - जांजगीर चांपा - 15.71 हेक्टेयर
राष्ट्रीय खनिज विकास निगम - बस्तर - 25.72 हेक्टेयर
राष्ट्रीय खनिज विकास निगम - दंतेवाड़ा - 65.936 हेक्टेयर
राष्ट्रीय खनिज विकास निगम - दंतेवाड़ा - 33.00 हेक्टेयर
आदिवासियों का विरोध :
छत्तीसगढ़ वन भूमि को उद्योगपतियों को सौंपने पर ही सुलग रहा है। राज्य में वन क्षेत्र आदिवासी समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार रहा है। ऐसे में वन भूमि को उद्योगों के लिए देने के फैसले पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कई इलाकों में स्थानीय ग्रामीण और आदिवासी संगठन इस तरह के डायवर्सन का विरोध करते आए हैं।
उनका कहना है कि जंगलों पर उनका पारंपरिक अधिकार है और औद्योगिक परियोजनाओं के चलते उनकी जमीन, जल और जंगल पर निर्भरता प्रभावित हो रही है। रायगढ़ हो, हसदेव हो या फिर अन्य माइनिंग परियोजनाएं। सालों से इन माइनिंग प्रोजेक्ट का विरोध लगातार चल रहा है। कई जगह पर तनाव और संघर्ष के हालात बने हुए हैं।
क्या कहती है सरकार :
छत्तीसगढ़ में वन भूमि का उद्योगों के लिए डायवर्सन का नियम नहीं है। वन मंत्री केदार कश्यप कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में 2005 से अब तक औद्योगिक क्षेत्रों में वन विभाग की वन भूमि औद्योगिक संस्थानों को नहीं दी गई है। हालांकि भारत सरकार पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वन अधिनियम 1980 के तहत स्वीकृत 18 प्रकरणों में औद्योगिक प्रयोजनों के लिए वन भूमि का डायवर्सन किया गया है।
वन मंत्री का कहना है कि इन उद्योगों को पेड़ लगाने के लिए भी जमीन दी गई है और यह अनिवार्य किया गया है। सरकार का तर्क है कि राज्य के आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के लिए औद्योगिक निवेश जरूरी है। सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं से न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़े हैं, बल्कि राज्य की आय में भी इजाफा हुआ है।
विपक्ष के आरोप :
विपक्षी दल कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधती रही है। आरोप है कि वन भूमि का आवंटन बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है। जबकि स्थानीय समुदायों के हितों की अनदेखी की जा रही है। विपक्ष का यह भी कहना है कि वनाधिकार कानून के तहत आदिवासियों को मिलने वाले अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में वन भूमि के औद्योगिक उपयोग का मुद्दा अब एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक विषय बन चुका है। एक ओर विकास की जरूरत है तो दूसरी ओर पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष :
वन भूमि डायवर्सन की प्रक्रिया में पर्यावरणीय मंजूरी, ग्राम सभा की सहमति और अन्य कानूनी प्रावधानों का पालन अनिवार्य होता है। लेकिन कई मामलों में आरोप लगे हैं कि इन प्रक्रियाओं को पूरी पारदर्शिता के साथ लागू नहीं किया गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग्राम सभाओं की सहमति कई बार दबाव में ली जाती है या फिर पूरी जानकारी दिए बिना औपचारिकताएं पूरी कर दी जाती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां जैव विविधता समृद्ध है और बड़ी संख्या में लोग सीधे जंगलों पर निर्भर हैं, वहां वन भूमि के उपयोग को लेकर बेहद सावधानी बरतने की जरूरत है। अनियंत्रित औद्योगिकीकरण से पर्यावरणीय असंतुलन, जल संकट और वन्यजीवों के आवास पर खतरा बढ़ सकता है।
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