बस्तर की जीवंत परंपरा का महापर्व, सेमरगांव में सजेगा करसाड़ जात्रा

thesootr Desk | Mar 21, 2026, 17:56 IST
Grand Celebration of Bastars Vibrant Tradition Karsad Jatra Semargaon
सेमरगांव में 2–4 अप्रैल को लिंगो देव का भव्य करसाड़ जात्रा मेला आयोजित होगा, जिसमें देशभर से हजारों श्रद्धालु शामिल होंगे। यह आयोजन आदिवासी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

NEWS IN SHORT

  • सेमरगांव में सजेगा आस्था का महाकुंभ, 2–4 अप्रैल को करसाड़ जात्रा मेला
  • लिंगो देव करसाड़ जात्रा: बस्तर में जुटेगी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था
  • तीन साल बाद फिर गूंजेगा मांदर, सेमरगांव में भव्य जात्रा मेला
  • परंपरा और आस्था का संगम: लिंगो देव करसाड़ जात्रा की तैयारियां तेज
  • देशभर से पहुंचेंगे श्रद्धालु, सेमरगांव बनेगा सांस्कृतिक महाकेंद्र

NEWS IN DETAIL

छत्तीसगढ़: बस्तर अंचल की सांस्कृतिक पहचान और आदिवासी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले लिंगो देव का प्रसिद्ध करसाड़ जात्रा मेला इस वर्ष 2 से 4 अप्रैल तक सेमरगांव (लिंगो धाम) में आयोजित होने जा रहा है। हर तीन वर्ष में आयोजित होने वाला यह महापर्व आदिवासी परंपराओं, आध्यात्मिक विश्वास और सामाजिक एकता का अद्वितीय संगम माना जाता है।



देव को दिया गया गुरु का दर्जा

आदिवासी समाज में पाटा गुरु के रूप में पूजनीय लिंगो देव को मार्गदर्शक, संरक्षक और संस्कृति के संवाहक के रूप में सम्मान दिया जाता है। मान्यता है कि उन्होंने समाज को संगठित कर जीवन जीने की दिशा दी और परंपराओं को संरक्षित किया। यही कारण है कि उन्हें केवल देवता ही नहीं, बल्कि गुरु का दर्जा प्राप्त है।



हर वर्ष होता है मेले का आयोजन

सेमरगांव स्थित लिंगो धाम को पवित्र पेनस्थल माना जाता है, जहां मेले के दौरान देश के विभिन्न राज्यों—छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और झारखंड से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस दौरान सैकड़ों देवी-देवताओं की डोलियां, आंगा, छतर और पारंपरिक प्रतीकों का आगमन होता है, जिससे पूरा क्षेत्र देव सम्मेलन जैसा अलौकिक स्वरूप ले लेता है। मेले में मांदर, ढोल और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज वातावरण को भक्तिमय बना देती है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालु नृत्य करते हुए अपने देवताओं के साथ पहुंचते हैं, जो सांस्कृतिक एकता और पहचान का जीवंत दृश्य प्रस्तुत करता है।



पारंपरिक रीति-रिवाज होती है पूजा

इस आयोजन की एक विशेषता यह भी है कि यहां पूजा-अर्चना पूरी तरह पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार की जाती है, जिसका संचालन 14 भाइयों की पारंपरिक समिति द्वारा किया जाता है। देवगुड़ी में प्रवेश के लिए सख्त नियम हैं—पुरुषों के लिए पारंपरिक वेशभूषा अनिवार्य है, जबकि महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है और वे दूर से ही दर्शन करती हैं। साथ ही, शराब और अन्य अनुचित गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है।



लिंगो देव से जुड़ी कई लोकमान्यता

लिंगो देव से जुड़ी लोकमान्यताओं के अनुसार, वे संकट में मार्गदर्शन देते हैं, वर्षा की कामना पूरी करते हैं और सच्चे मन से मांगी गई मन्नतों को पूर्ण करते हैं। मेले के दौरान श्रद्धालु विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं, जिसे देव उपस्थिति का संकेत माना जाता है। यह आयोजन केवल आदिवासी समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि कलार, तेली, राउत सहित कई अन्य समुदायों की सहभागिता से सामाजिक समरसता का प्रतीक बन चुका है।



जिला प्रशासन मेले में सक्रिय

इस वर्ष पहली बार जिला प्रशासन भी मेले के आयोजन में सक्रिय भागीदारी निभा रहा है, जिससे श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित की जा रही हैं। तैयारियों का जायजा लेने कांकेर लोकसभा सांसद भोजराज नाग भी सेमरगांव पहुंचे और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। साथ ही, प्रदेश के मुख्यमंत्री को भी मेले में शामिल होने का आमंत्रण दिया गया है और उनके आगमन के संकेत मिल रहे हैं।



बस्तर की जीवंत परंपरा

आधुनिकता के इस दौर में भी लिंगो देव का करसाड़ जात्रा मेला बस्तर की जीवंत परंपरा, गहरी आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बना हुआ है। यह महापर्व न केवल आदिवासी समाज की पहचान को सशक्त करता है, बल्कि दुनिया को बस्तर की अनूठी संस्कृति से परिचित कराने का माध्यम भी है।



निष्कर्ष

लिंगो देव का करसाड़ जात्रा मेला बस्तर की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यह महापर्व आदिवासी समाज की एकता और पहचान को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनता है। देशभर से श्रद्धालुओं की भागीदारी इसे एक विशाल सांस्कृतिक संगम का रूप देती है। आधुनिकता के बीच भी यह आयोजन अपनी मूल परंपराओं और पवित्रता को बनाए हुए है।



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